शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

हर रोज़ जीने की कोशिश करता हूं मैं...

नींद से बोझल आंखें लिए...
हर सुबह अपने शरीर को ...
किसी तरह ढोता हूं मैं...
रात किस कदर बीत जाती है...
...कभी पता ही नहीं चलता...
और कभी ...
बीत ही नहीं पाती...
दिनभर फिर जागता हूं...
दिनभर टुकड़ों में सोता हूं मैं...
... हां उस दिन ...
उसी रात के साथ हर पल...
हर लम्हा...
जीता हूं मैं...
...उस दिन शाम भी जल्दी हो जाती है...
फिर भी दिन को रोक कर रखने की...
जाने क्यों कोशिश करता हूं मैं...
घर जाते सूरज से मांगता हूं...
थोड़ी सी मोहलत ...
रात को करता हूं ...
ठहर कर आने की गुजारिश...
चांद से भी उस दिन...
ज़रा जल्दी आने को कहता हूं मैं...
कि रात की आहट से ही...
बंद कर लेता हूं मैं फिर आंखे...
जागते हुए फिर से...
सोने की कोशिश करता हूं मैं...
कुछ इस तरह...
हर रोज़ जीने की कोशिश करता हूं मैं...

2 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा रचना...मन के विचारों को अच्छी तरह पेश किया है

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  2. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .

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