बुधवार, 14 अप्रैल 2010

कुछ बात यूं हई


तुझे जब-जब लिखना चाहा...

कुछ बात यूं हुई...

हम उलझे रहे शब्दों में...

औऱ ...बात... चली गई ...

तुझे जब-जब पढ़ना चाहा...

कुछ बात यूं हुई...

हम पढ़ ना पाए सीरत...

सूरत बदल गई...

तुझे जब-जब कहना चाहा...

कुछ बात यूं हुई...

तेरी बात कहते-सुनते...

हर राह गुजर गई...

जब-जब तुझे सुनना चाहा

कुछ बात यूं हुई...

मैं सुन ना पाया आहट...

दबे पांव तू चली गई...

तुझे जब-जब मिलना चाहा...

कुछ बात यूं हुई...

हम भूल बैठे तारीख...

औऱ मुलाक़ात हुई नहीं...

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