गुरुवार, 30 सितंबर 2010

प्लीज़ माइंड द गैप ...

"प्लीज़ माइंड द गैप "...
कृपया खाली जगह का ध्यान रखिए ...
"प्लीज़ माइंड द गैप " ...
मेट्रो की उद्घोषणा ...
और उद्घोषक पूरी कोशिश कर चुके थे ...
लेकिन वो जैसे किसी एयर बबल में कैद था ...
अपनी सोच का पुलिंदा ढोते हुए....
सावन के मेले सी भीड़ वाले ...
प्लेटफॉर्म पर भी अकेला खड़ा था...
मेट्रो के दरवाज़े के बीचोंबीच ...
जो बंद होने की कोशिश में था...
और बोगी का हर शख्स जैसे ...
यही रिपीट कर रहा था ...
"प्लीज़ माइंड द गैप" ...
और माइंड ना जाने किस उधेड़बुन में लगा था ...
वो अभी वहीं था ...
उसी जजमेंट की मीमांसा करने में लगा था...
और मन ही मन मुस्कुरा रहा था...
ठहाके लगा रहा था ...
बीच में कनखियों से आस पास देखता था ...
और फिर शून्य में ताकने लगता था...
उसे भी 3.30 का इंतज़ार था...
वो भी फैसले के इंतजार में था ...
लेकिन जब फैसला आया ...
तो वो हंस पड़ा ...
किसी चैनल पर उसने देखा और सुना...
अदालत ने रामलला के पक्ष में 2-1 से फैसला सुनाया है ...
बस वो तब से हंस ही रहा है ...
उसे लगा रामलला भी तभी से उसी के साथ चल रहे हैं...
वो दफ्तर की सीढ़ियों पर भी थे ...
रास्ते की भीड़ में भी ...
मेट्रो स्टेशन के एस्केलेटर पर भी ...
और इस बोगी में भी ,साथ ही हैं ...
अदालत के फैसले की उसी कॉपी के साथ ...
लेकिन अब भी वही आवाज़ गूंज रही है ...
"प्लीज़ माइंड द गैप "...
"प्लीज़ माइंड द गैप "...
औऱ वो देखता है ...
उसके जैसा एक और कोई है ...
जो इस वाले स्टेशन से ...
धक्का पेल भीतर घुसने की कोशिश में हैं ...
और उसके साथ भी रामलला हैं ...
फैसले की उसी कॉपी के साथ ...

1 टिप्पणी:

  1. Arey Hemant...kaafi lambe arse baad aaj mauka laga aboojh ke zariye tumhari rachnayo ko padne ka...ya yun kaho ki inn rachnayo k zariye...mann ko padne ka....
    aaj fir wahi fresh fresh khushi ho rahi hai...inn wichaaron ka upyukt shabdo ke zariye vivaran dekh kar jaise ki kabhi 16-17 saal ki umar mai tumhari kavitaon ko padkar hoti thi...
    khushi hai ki aaj tum aur bhi bahut achcha likh rahe ho...vichaaron ko shabdo ka roop de paa rahe ho...

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