शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

ये भी दिल्ली है ...

                 

दिल्ली की बारिश और जलभराव...

जनता... बकौल अखबार और समाचार, राजधानी की सड़कों पर पानी जमा होने से परेशान है लेकिन इसी शहर का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पक्की सड़कें बेशक नहीं है लेकिन जलभराव की समस्या शायद साल भर यूंही बनी रहती है, बारिश के होने या ना होने से शायद यहां के हालात पर बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है।

पहली तस्वीर को देखिए... बिजली की तारों में उलझा-छिपा एक बोर्ड, अपनी फीकी पड़ती मटमाती लिखावट के साथ आपके पधारने का धन्यवाद का धन्यवाद कर रहा है।
धन्यवाद...जी हां... ये बोर्ड कुछ यही कह रहा है, लेकिन बारिश के मौसम में इस धन्यवाद के अगले ही कदम पर आपको क्या मिल जाए, आप सोच भी नहीं सकते। और यकीन मानिए आप ऐसा करना भी नहीं चाहेंगे।

ज़रा ध्यान से देखिए... तस्वीर में आप एक आदमी को हाथ में कुदाल लिए खड़ा देख सकते हैं।
ये भाई साहब पानी की निकासी का रास्ता खोज रहे थे। किसी महकमे के इंतज़ार में तो यहां के लोग सड़ांध भरे इस पानी में यूहीं सारा मौसम बैठे रहेंगे लेकिन बारिश की हर फुहार आपके लिए राहत नहीं परेशानी का सबब बनती जाएगी।

अगली तस्वीर में पानी से लबालब भरी गली में घुसने से शायद एक मिनी ट्रक को भी सोचना पड़ रहा है, गली में ठहरा हुआ पानी बारिश के पानी की तरह मिट्टी घुला हुआ गंदला सा नहीं, बल्कि नालियों के पानी और गाद से मिलकर काले रंग का बदबूदार घोल की तरह हो जाता है।

तीसरी तस्वीर में एक बाइक सवार पूरे अनुभव के साथ पानी से भरे रास्ते में धड़ल्ले से निकल गया लेकिन पैदल जाने वाले लोग... वो क्या करते होंगे। पैदल जाने वाले लोग दीवार का सहारा लेकर इन रास्तों को पार करते हैं। यहां से गुजरने वाले लोग किसी तरह व्यवस्था और बारिश को कोसते हुए निकल जाते हैं लेकिन यहां के बाशिंदे। यहां रोज़ाना सालों से रहने वाले लोग... क्या वो इसी ज़िंदगी के हक़दार हैं।

ऐसा कमोबेश इन लोगों के साथ हर साल हर बारिश होता होगा लेकिन इस समस्या का समाधान कब निकलेगा ये कोई नहीं जानता।  मौसम की पहली बारिश ही सिविक एजेंसियों की पोल खोल देती है लेकिन यहां ये हालात पहली से आखिरी बारिश तक बने रहते हैं... और शायद बिना बारिश के भी। हम लोग राजधानी की सड़कों पर एक-दो घंटे का जलभराव नहीं झेल पाते हैं और ये सड़ांध इन लोगों के जीवन का जैसे हिस्सा बन जाती है...एक-दो नहीं बल्कि पूरे 24 घंटे... ऐसा एक-दो दिन नहीं बल्कि सालों से चला आ रहा है और शिकायतें हर साल यूंही बह जाती है इसी तरह... लोग जैसे आदी हो चले हैं . . .

पार्टी बदल जाती है, नेता बदल जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं लेकिन कुछ है जो साल दर साल यूंही बदस्तूर जारी रहता है और वो है दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में लोगों का नारकीय हालात में जीवन। यहां रहने वाले लोगों को इन कॉलोनियों को नियमित करने का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है, लेकिन ज़मीनी तौर पर ऐसा होना अभी बहुत दूर की कौड़ी लगती है। साल 2008 में तत्कालीन शीला सरकार ने 1639 अनधिकृत कॉलोनियों में से 895 कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया था, लेकिन अभी तक एक भी कॉलोनी नियमित नहीं की जा सकी है। एक तरफ इन कॉलोनियों को नियमित करने वादा है तो दूसरी तरफ इस प्रक्रिया में शामिल तमाम व्यावहारिक दिक्कतें। लेकिन ये तमाम अड़चनें एक मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के सामने कोई वजूद नहीं रखती।

दिल्ली सरकार ने हाल ही में दिल्ली शहरी विकास एजेंसी (DUDA) बनाने की घोषणा की थी, जो दिल्ली में अलग-अलग सिविक एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने और विकास के कार्यों में एकरूपता लाने के साथ-साथ इन पर नज़र रखने का भी काम करेगी। दिल्ली कैबिनेट की बैठक में इस एजेंसी के गठन को औपचारिक मंजूरी दे दी गई है।

उम्मीद है ... अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले हज़ारों-लाखों लोगों की ज़िंदगी अगली बारिश तक ऐसी ना रहे।
सभी जगह तो संभव नहीं है लेकिन अगर कुछ इलाकों में भी लोगों को रोज़ाना के इस नारकीय जीवन से छुटकारा मिल सके तो शुरुआत अच्छी ही मानी जाएगी। वर्ना लोग तो आदी हो चुके हैं, मजबूरी की ऐसी ज़िंदगी के भी औऱ हर बारिश में बह जाने वाले वाले चुनावी वादों के भी। 

12 टिप्‍पणियां:

  1. It's such a vicious circle. While the civic authorities care two hoots about people's issues, the people too have become used to living in such conditions. I doubt people from the such areas or societies ever volunteer to make things better for themselves.

    Jo karegi sarkar karegi.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. yes ragini.. they have become used to living under such conditions, they don't know whom to complain... where lies the solution... i hope they have been trying to better their life but again there are few things which the government needs to take care of ...

      हटाएं
  2. umeed hai ki ispar kaam kiya jayega aur agli baar aisa drishya nahin hoga. amen

    उत्तर देंहटाएं
  3. its a sad state...nindaniya hai bilkul esply jab tax lete waqt toh woh jhat se le lete hain.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वाकई बहुत बुरा हाल है, सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं और महंगाई आसमान पर।

      हटाएं
  4. It is the heart-breaking state but true and I have seen many such areas in Delhi...People and Govt. need to work hand in hand to improve the situation but have never seen any initiative :(
    Good Eye-opening post dear!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बिल्कुल सही कहा आपने, दिल्ली के कई इलाके इन तस्वीरों से भी बदतर हालत में हैं, और ऐसा वहां सालों से चलता आ रहा है। जनता परेशान है और शासन जैसे अनजान ...

      हटाएं
  5. barish aati nahin hai aur log uske jaane ki duaen mangne lagte hain, isliye nahin ki wo use napasand karte hain balki isliye ki usse hone wali pareshaniyon ka hal abhi tak nahin hua hai

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. जो आपने कहा ठीक यही बात इस इलाके के लोग भी कह रहे थे, मुझे तस्वीर खींचते देख मोटरसाईकिल पर जा रहा एक शख्स रूककर बोला - खींचो भाई खींचो... शायद कहीं कुछ हो जाए। ऐसा खींचना और छपना तो बहुत हो चुका है, बस बदलाव नहीं हो रहा है सलीके से।

      हटाएं