मंगलवार, 20 सितंबर 2016

शहादत और सियासत

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इन आंसुओं को
इन जवानों को
इन सवालों को
इन नामों को
इन तस्वीरों को
. . .
इन मातमों को
हम भूल जाएंगे ?
हमें !!!
राजनीति करनी है
शहादत पर
लाशों पर
जातियों पर
अगड़ों पर
पिछड़ों पर
बीफ और बिरयानी पर
अभी सियासत पकनी है
सुलगनी है
वोटों की हांडी
इंसानों की हड्डियों
की आंच मांगती है
इन आंसुओं से
वो हड्डियां पिघल सकती हैं 
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6 टिप्‍पणियां:

  1. वर्तमान हालातों पर एक सटीक बैठती पंक्तियाँ बहुत गजब के भाव ..अनुसरक बन कर जा रहा हूँ अब तो आता ही रहूँगा | बहुत बहुत शुभकामनायें आपको

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    1. पढ़ने, समझने और सराहने के लिए शुक्रिया अजय जी ...

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