शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

आज़ादी का अहसास

15 अगस्त 2013 . . .

सुबह जाने क्यों आज अलसाई सी थी, कमबख्त नींद को भी पता था कि आज छुट्टी का दिन है । छुट्टी का दिन...  तमाम रस्मों - रिवाज़ों , तमाम औपचारिकताओं के साथ लोगों की मानसिकता एक छुट्टी के दिन सरीखी हो गई है ।

15 अगस्त 1947 ... जाने कितनी आंखों ने इस दिन का इंतज़ार किया होगा... कितनी आंखें इस दिन के दीदार की ख्वाहिश लिए ही बंद हो गई होंगी... जाने कितनी आंखों ने इस दिन का सपना देखा होगा । और फिर कितनी ही आंखों ने इस सपने को पूरा होते हुए देखा होगा  । उस सपने को जिसे आज हम जी रहे हैं, मना रहे हैं... आज़ादी के इस दिन को।

ना ना ... घबराइए नहीं, मैं एक्सट्रा इमोशनल नहीं हूं ... इस पर मैं अपना स्टैंड पहले ही क्लीयर कर चुका हूं ।

इस राष्ट्रीय पर्व के दिन जब बाकी तमाम लोग अलसा रहे हैं, और मैं... मैं तैयार हो रहा हूं ऑफिस जाने के लिए।

जी ... मेरी छुट्टी नहीं है... मुझे ऑफिस जाना है । क्यों, ये मत पूछिए। बता नहीं पाउंगा, इसलिए कोशिश भी मत कीजिएगा और फेस टू फेस तो कतई नहीं ।  और इस वक्त घड़ी में क्या बजा है ये पूछने की भूल बिल्कुल मत कीजिएगा, क्यों !!! सर जी ,  " जाके पैर ना फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई " ।

खैर... घर से बाहर पहला कदम रखते ही कुछ बूंदों ने हौले से स्वागत किया, याद आया बचपन से ही तो सुनते आएं हैं...15 अगस्त को बारिश जरुर होती है। आज़ादी का दिन... इतनी खूबसूरत शुरुआत... और ऑफिस तक का सफर उससे भी ज्यादा खूबसूरत। साफ-सुथरी , बारिश से धुली हुई लगभग खाली सी सड़कें । जगह-जगह तैनात जवान... कहीं बैरिकेडिंग, कहीं पैदल गश्त... कहीं मोटरसाइकिल से पैट्रोलिंग, तो कहीं सायरन बजानी पुलिस की गाड़ियां। कार सिर्फ बैरिकेड्स पर रुक रही थी या फिर सिग्नल्स पर, इसके अलावा तो लगा जैसे सालों पुरानी दिल्ली वापस से लड़कों पर लौट आई हो ( सड़कें हालांकि बेहतर , लेकिन भीड़ नदारद) 

हां यमुना बाज़ार पर जरुर ब्रेक लगाने पड़े ... कुछ सज्जन वहां रोज़ की ही तरह दीन-दुनिया से बेखबर सड़क पार कर रहे थे, आप वक्त रहते देख पाएं तो आपकी किस्मत नहीं तो  ... 
आज कोई रॉन्ग साइड से गाड़ी नहीं चला रहा था... बीच फ्लाई ओवर  पर कहीं भी ट्रक-टैम्पो रोक कर कागज़ों की जांच-पड़ताल  नहीं हो रही थी ।  
आज सभी लोग ट्रैफिक सिग्नल्स को फॉलो कर रहे थे। हैरानी हुई ना सुनकर , आज़ादी का दिन औऱ लोग नियम-कायदों से चल रहे थे । 
आपने वो टैम्पो जरुर देखे होंगे ... ( रिंग रोड पर या फिर वो शहर का कोई भी हिस्सा हो सकता है) जो सुबह-सुबह तेज़ रफ्तार से आपके सामने से निकल जाते हैं , जिनमें ठूंस-ठूंसकर मुर्गे भरे होते हैं, पिंजरे में कैद मुर्गे रोज़ मिलते जरुर थे लेकिन बताते नहीं थे कि मंजिल कहां हैं ।  रुटीन में बदलाव था, आज शायद वो भी आज़ाद थे,  वो टैम्पो कहीं नहीं थे और ना ही वो स्कूल वैन्स जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी कुछ उसी तरह से ठूंसे गए होते हैं। पीले रंग वाली वो स्कूल बसें भी नहीं थी जो पूरी सड़क के किसी भी हिस्से पर उसी रफ्तार से चलती है जो ड्राइवर की मर्जी होती है और जिनके पीछे बड़े करीने से लिखा होता है कि " अगर मैं गलत या खतरनाक तरीके से गाड़ी चला रहा हूं तो इस नंबर पर फोन कर बताएं " । जाने कितने ड्राइवर सही ड्राइविंग करते होंगे, कितने लोग फोन करते होंगे और कितने नंबर सही होंगे। टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन की तरह हवा से बातें और स्टंट करते वो बाइक सवार कहीं नहीं थे ।  

आज छुट्टी होती है, लिहाजा ऑफिस में बॉस लोग अमूमन नहीं आते हैं, बाकी उनकी मर्जी , अरे बॉस हैं भई। 
आज़ादी का दिन है वो मना सकते हैं तो हम भी मना सकते हैं । कैसे और कितना ??? ये भी मत पूछिए और फेस टू फेस तो बिल्कुल नहीं । 

इन सब के बीच लाल किले पर शान से लहराता तिरंगा... और स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल हज़ारों लोग। आसमान से छलकती ओस सी बूंदों सी बारिश की फुहारें और और बादलों के पार जाते सैकड़ों-हज़ारों रंग बिरंगे गुब्बारे। चप्पे-चप्पे पर मुस्तैद जवान ... औऱ संगीनों के साए में मनाया जाता आज़ादी का ये दिन। पुरानी दिल्ली इलाके में  ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार करती हर रंग हर आकार प्रकार की पतंगें और उड़ने को बेताब बैठे मुंडेरों पर सफेद रंग के कबूतर। 

सच ! कुछ खास ही होता है आज के दिन का अहसास...
आज़ादी का अहसास... 
सुरक्षा का अहसास ... 
हवाओं में घुला खुलापन...
भीगी-भीगी सुबह की नमी का अहसास...
और हां...
दिल्ली में रहने का अहसास ...
देश की राजधानी ... 
हमारी दिल्ली, साफ-सुथरी दिल्ली, स्वच्छ दिल्ली... सुरक्षित दिल्ली

काश ये सभी अहसास एक साथ हमेशा के लिए रह पाते । किसी अहसास पर कभी कोई अलर्ट हावी हो जाता है, तो कुछ अहसास रोज़ाना की भीड़भाड़ में कहीं खो जाते हैं ... हम से ज़्यादा हमारा ये शहर इन सब का आदी हो चुका है , इन अहसासों के खो जाने का ... लेकिन आज़ादी का दिन है, और इससे बड़ा अहसास क्या आप सुझा सकते हैं... इस अहसास की कीमत हम चाहकर भी नहीं चुका सकते लेकिन हां इसे संजो कर रख सकते हैं, सहेज कर रख सकते हैं... हमेशा के लिए... हर कीमत पर ...

2 टिप्‍पणियां:

  1. आबो-हवा देश की बहुत साफ़ है
    क़ायदा है, क़ानून है, इंसाफ़ है
    अल्लाह-मियाँ जाने कोई जिए या मरे
    आदमी को खून-वून सब माफ़ है

    और क्या कहूं? ...आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है

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