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सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

ये कैसा बहिष्कार !!!


कनॉट प्लेस के इनर सर्किल में 10-12 युवकों का एक समूह नारे लगा रहा था ...
Boycott ... Made in China !!!
. . .और ये युवक लोगों से चीन के बने सामान का बहिष्कार करने की गुजारिश अपने ही तरीके से कर रहे थे। वहीं ... चीन के बने कपड़े...जूते...बेल्ट पहने, पर्स खोंसे - बैग थामे लोग... भरपेट चाईनीज़ खाने के बाद अघाते हुए चकाचक चाईनीज़ फोन निकाल कर धड़ाधड़ बड़े मेगापिक्सल वाली तस्वीरें खींच रहे थे और HD Video बना रहे थे।
लेकिन यकीन मानिए, ऐसा करने से पहले उन्होंने यकीनन तन...मन और धन से चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर दिया था (ऐसा लगता जरूर था) ...यहां तक कि फोन में लगे चीन निर्मित अवयवों को भी शायद निकाल बाहर कर दिया होगा। 
(***और बहुत संभव है कि इन युवकों ने जो चीनी सामान के बहिष्कार के नारे वाली टी-शर्ट छपवाई हो; उसमें क्या मालूम ... बनने से छपने से लेकर पहनने तक ... किसी बेहद जरूरी या गैरजरूरी, महीन स्तर पर चीनी मिलावट की गई हो, जो आपको मालूम भी न हो...बेशक गैरइरादतन)
एक दौर था... जब आज़ादी के मतवालों ने स्वदेशी अपनाओ विदेशी भगाओ के असल मायने ब्रिटिश साम्राज्य को समझा दिए थे। देशव्यापी स्तर पर विदेशी विशेषकर अंग्रेज़ी कपड़ों की होली जलाई गई... अंग्रेज़ी सामान का बहिष्कार किया गया...एक आह्वान पर... स्वेच्छा से... अपने देश के लिए। 
आज... बेशक देवी-देवता हमारे हैं लेकिन उनकी मूर्तियां तक चीन से बनकर आ रही हैं, वो भी तरह-तरह के आकार-प्रकार में। दीपावली के दिए, जगमगाती लाईट्स, साज-सजावट... रंग-रोशनियां-उमंग सब कुछ धड़ल्ले से चाईनीज़ चल रहा है। आप किसका बहिष्कार करेंगे... किस-किस का बहिष्कार करेंगे और कैसे करेंगे ... घरों में, दफ्तरों में, आपके आस-पास... इलेक्ट्रॉनिक्स का ज़्यादातर सामान... तमाम चाइनीज़ मोबाईल ... चार्जर और एक्सेसरीज़।
इन सब का क्या करेंगे। इसके अलावा ऐसा बहुत कुछ जो शायद हमें पता भी नहीं है, ऐसा चीनी माल जो हमारे बीच चुपचाप खप रहा होगा... उसका क्या।
अब आप ही कहिए आप कैसा बहिष्कार चाहते हैं, और कैसे उसे अंजाम दिया जाएगा।
क्या आप यानी कि जनता सिर्फ सहूलियत का बहिष्कार चाहती है।
या जनता को ये समझाया जा रहा है कि वो ये चाहती है।
ये जनता आखिर चाहती क्या है।
ये जनता आखिर है क्या...
और सबसे अहम बात...
क्या ये सब जनता के सोचने भर से हो जाएगा। 
क्या फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप, ब्लॉग्स पर क्रांति करने से कोई समाधान निकलेगा !!! पता नहीं, लेकिन क्रांतिकारी जीव जुटे रहेंगे। 
या फिर इसमें किसी तरह के नीति-निर्धारण की जरूरत और गुंजाइश है ... और वो भी आखिर कितनी।
स्वदेशी आखिर कब तक और किस तरह से उस स्तर तक जा पहुंचेगा कि तमाम विदेशी संभावनाएं जड़ से ही समाप्त हो जाएं वो भी उस दौर में जब हम पूरे विश्व को स्वयं एक खुले बाज़ार की तरह देख रहे हैं। 
यह कितना स्वाभाविक... प्रासंगिक और तार्किक है...
जनता कृपया ध्यान दें ...
बाज़ार में चीनी उत्पादों की monopoly तो हमें कतई स्वीकार्य नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए ... लेकिन बंधु स्वीकार्य तो हमें वैचारिक monopoly भी नहीं है ... क्या समझे !!!


सोमवार, 26 सितंबर 2016

सबक सिखाना होगा

google image

जिस तरह
हर भ्रष्ट की सोहबत में
 सभी भ्रष्टाचारी हैं...
जिस तरह
हर दुराचारी के परिजन दुराचारी हैं
जिस तरह
हर हत्यारे की नस्लें हत्यारी हैं
जिस तरह
ये शहर जहां हम रहते हैं
जिम्मेदार है
हर अपराध के लिए
जो यहां होता है
ठीक उसी तरह
दुश्मन देश का हर नागरिक
हमारा दुश्मन है
उनका बचपन
उनके अपने
सब तबाह होने दो
पेशावर के स्कूली बच्चे
उनको वहां ऊपर से सब देखने दो
एक रोते हुए बच्चे को तब सुना था
वो आतंकियों की नस्लें...
तबाह करना चाहता था
वो काम 
अब हमें करना होगा
उनकी फसलें
उनके किसान
उनके शहर
उनके खेत-खलिहान
सब नफरतों से जला देने हैं
उनके घरों में घुस कर
उनकी किताबें
पहचान...तहज़ीब
उनकी बोली... उनके मिज़ाज
उनके गीत...ग़ज़लें
मौसिकी
सब मिटाना होगा
लाहौर...कराची
नक्शे से मिटा देने होंगे
हमें वो सब निशान
जिनसे कभी वहां इंसानियत महफूज़ रही होगी
फिर वहां सिर्फ आतंकी बचेंगे
जिन्हें हम चुन-चुनकर मार सकेंगे
हमें छोटे दुश्मनों को पहले खत्म करना होगा
जो वैसे भी वहां रोज़ मर रहे हैं
हमें उनकी मौत को...
और आसान करना होगा...
वो हमारे दुश्मन हैं
हमें कोई रहम नहीं करना है
उनको उनकी औकात दिखानी ही होगी
आखिर
वहां
बच्चा-बच्चा
तैयार हो रहा है जंग के लिए
हमें यहां भी तैयारी करनी होगी
उनकी सरकार का सबक
उनकी आवाम को
सिखाना ही होगा

बुधवार, 8 जून 2016

' उड़ता पंजाब ' के मायने


अब ये वाकई समझ से बाहर होता जा रहा है कि लोग आखिरकार सेंसर बोर्ड के पीछे हाथ-पांव-मुंह धोकर क्यों पड़े हैं। ' उड़ता पंजाब ' अब ये क्या नाम हुआ बताईए... जनाब जिस क्रिया कलाप के उपरांत उठना भी बमुश्किल होता है, आप वहां उड़ने की बातें कर रहे हैं (यही कुछ होगा ना आपकी फिल्म में)... ये तो Newton के सिद्धांतों के भी खिलाफ है। आप प्रकृति के विपरीत कैसे जा सकते हैं। Creative freedom के नाम पर कुछ भी परोस दिया जाएगा क्या ? 
फिर चुनाव भी जल्द होने वाले हैं, ऐसे में पंजाब को कैसे उड़ने दिया जा सकता है। चुनावों के बहुत दूरगामी परिणाम होते हैं जी, हैं जी... हां जी !!! ... आप समझते ही नहीं। और फिर देखिए फिल्म के नाम में जब दिल्ली हुआ तो ...'चलो दिल्ली' , उड़ो दिल्ली क्यों नहीं। गैंग्स ऑफ वासेपुर... मेरठिया गैंगस्टर, ज़िला ग़ाज़ियाबाद... मद्रास कैफे, बॉंबे वेल्वेट... वगैरह-वगैरह। Go Goa Gone भी इसी तरह बर्दाश्त की गई। गोवा में क्या वही सब होता है, लेकिन आप लोग सुधरेंगे नहीं।
 उड़ता पंजाब ... मतलब कुछ भी !!! नाम उड़ता गुलाब रख दो भाई... उड़ता जुराब रख दो। फिर जनाब शेक्सपीयर साहब भी तो कह गए थे जी ... what's in a name. "A rose by any other name would smell as sweet". अब आप क्या शेक्सपीयर से भी बड़े भारी क्रिएटिव हो गए हैं।
खैर, शेक्सपीयर तो विदेशी मामला हुआ, बात एक जांचे-परखे देसी नुस्खे की... कबूतर और बिल्ली का किस्सा तो आप सभी जानते हैं, कबूतर बिल्ली को देखकर अपनी आंखें बंद कर लेता है और मान लेता है बिल्ली अब नहीं है, वो चली गई है... और बेशक ये कलियुग है लेकिन आप यकीन मानिए... ये सिद्ध टोटका आज भी उतना ही प्रभावशाली है।
आप क्या कीजिए, उड़ता पंजाब फिल्म के नाम में से पंजाब हटा दीजिए और यकीन मानिए, जैसे ही आप ऐसा करते हैं, ये फिल्म एकदम झूठी हो जाएगी जनाब... ड्रग्स-फ्रग्स फलाणा-ढिकणा सब समस्याओं से तुरंत सबको छुटकारा मिल जाएगा... सब एकदम छूमंतर !!!

फिर समझो ना यार ...फिल्म जरूरी है या समाज ...
और ऐसी क्या क्रांति करना चाहते हो भाई, जो उड़ाने से ही हो सकती है। 

मान जाओ बुद्धिजीवी... समझो... इतनी कांट-छांट के बाद वैसे भी कौन उड़ सकता है।

मंगलवार, 31 मई 2016

कौन है असली ' विलेन '

हम लोग दिल्ली में रहते हैं, देश की राजधानी दिल्ली में। साल भर हम तरह-तरह की वर्षगांठ और खुशफहमियां मनाते हैं। देश की राजधानी, देश का आईना भी है लिहाज़ा देश भर पर चर्चा, परिचर्चा औऱ खर्चा सब यहां होता है... और फिर ये आईना एक दिन एक ऐसी सूरत आपको दिखा देता है कि आप आईने से नफरत करने लगते हैं... लेकिन उस सूरत और सीरत से नहीं । फिर वक्त के साथ-साथ वो तस्वीर धुंधली होती जाती है... धुंधली होते होते उसका वजूद खत्म हो जाता है। न कोई सीख...न कोई सबक, हम मान लेते हैं माहौल ठीक है और एक दिन फिर से आपका ये भ्रम टूट जाता है ... आईना आपको एक नई सूरत दिखाता है, आप इस सूरत से और भी ज़्यादा नफरत करते हैं... रस्म अदायगी के तौर पर आप कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हैं, फिर दिल और पक्का कर उसकी भर्त्सना करते हैं, कुछ जुलूस ...कुछ बैठकें... कुछ दिशानिर्देश, जो कुछ दिन बाद फिर से दिशाहीन हो जाते हैं।

 राजधानी दिल्ली के पॉश वसंतकुंज इलाके में कांंगो के एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। वजह ऑटोरिक्शा में बैठने को लेकर हुआ विवाद।
 पुलिस के मुताबिक ये नस्लीय आधार पर हुआ हमला नहीं है, ये कोई Hate crime नहीं है, ऑटो में बैठने को लेकर झगड़ा हुआ जिसके बाद वीभत्स तरीके से इस युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना पर विश्व भर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। राजधानी दिल्ली में सभी अफ्रीकी देशों के राजदूत ने अपना विरोध दर्ज कराया। एक तरफ अफ्रीका दिवस का आयोजन और दूसरी तरफ इस तरह का दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम। विरोधस्वरुप अफ्रीकी देशों के राजदूतों ने इस आयोजन में शामिल न होने का निर्णय लिया, जिसे बाद में बहुत समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने वापस ले लिया।
वस्तुत: अपराध से ज़्यादा अपराध के पीछे की मानसिकता आपको सोचने पर विवश करती है।
इस घटना के कई पहलू हैं... आपराधिक, सामाजिक, कूटनीतिक, आर्थिक... और इन तमाम पहलुओं की अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
अखबारों में...न्यूज़ चैनल्स में इस खबर के करीब-करीब हर पहलू को खंगाल लिया गया है, लेकिन माहौल में एक वैचारिक अवरोध जस का तस बरकरार है।
आप prejudices और bias के आधार पर किसी को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते हैं। अगर कोई एक व्यक्ति किसी अपराध में संलिप्त पाया जाता है तो उस देश, शहर, समाज, धर्म, जाति या नस्ल के सभी लोगों को अपराधी करार नहीं दे सकते। हर व्यक्ति स्वयं अपने फैसलों के लिए उत्तरदायी होता है। यदि कोई अफ्रीकी नागरिक किसी अपराध में संलिप्त पाया गया है तो सभी अफ्रीकी नागरिक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आप सभी को संदेह के दायरे में नहीं रख सकते हैं। आप सिर्फ इस आधार पर सभी से भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते हैं।
ऐसे अपराध संकुचित सोच और आपराधिक प्रवृति  का ही नतीजा हो सकते हैं। लेकिन अपराधी ये भूल जाते हैं कि इसके कितने दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। और अगर इतनी समझ इतना विवेक उनमें पहले ही होता तो ऐसी नौबत शायद कभी नहीं आती।
आप अखबार में छपी रिपोर्ट के इस हिस्से को पढ़िए। इस तरह के अपराध का ये भी एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। लोगों से...समाज से ...व्यवस्था से आपका भरोसा उठने लगता है और एक लोकतांत्रिक प्रणाली में ये कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं है। आप सिहर जाते हैं जब आपको ऐसी भावनाओं से अवगत कराया जाता है लेकिन कहीं न कहीं इसके लिए आप भी जिम्मेदार हैं , क्योंकि जब आपको इसका हरसंभव विरोध करना चाहिए था उस वक्त आप बारिशों में भीगा वीकेंड मनाने में मशगूल थे। आपके पास तमाम व्यस्तताएं थीं लेकिन फिर आप इस सब के बारे में सोचते भी क्यों... इससे आपका क्या सरोकार। आप यहां जो करते हैं उसकी प्रतिक्रिया आपको जरूर मिलती है। हिंसक घटना की अहिंसक प्रतिक्रियाएं अमूमन नहीं होती, ये खुद को ही धोखा देने जैसी बात हुई।

अतिथि देवो भव: । आप करोड़ों-अरबों रुपए विज्ञापन पर फूंक दीजिए, लेकिन सालों की मेहनत से जो छवि आप बनाते हैं... अर्जित करते हैं, ऐसी घटनाएं एक पल में उस पर सवालिया निशान लगा देती है। सांप निकल जाने के बाद आप लकीर पीटते रहिए, लेकिन सार्थकता सही समय पर उठाए गए सही कदम की ही होती है। लोगों में भरोसे का कायम रहना जरूरी है, एक व्यवस्था में भरोसा रहना जरुरी है। लेकिन आप सिर्फ इस सोच के साथ नहीं चल सकते कि किसी अन्य देश के नागरिक को मिली सुरक्षा की गारंटी उस देश में आपके अपने नागरिक के अधिकारों की रक्षा समान है, ये कोई बदले की कार्रवाई नहीं है, ये किसी का अधिकार है तो आपका कर्तव्य भी। 
मैनें कहीं किसी अखबार में डैमेज कंट्रोल शब्द को भी छपा पाया। किसी भी समाज के लिए डैमेज कंट्रोल एक बहुत ही वाहियात अवधारणा है, पहली कोशिश उस तथाकथित 'डैमेज' को होने ही न देने की होनी चाहिए। लेकिन हम इंतज़ार करते हैं, हमें मुद्दों, मसलों और मामलों की गंभीरता से फर्क नहीं पड़ता है, हमें सिर्फ उन चीज़ों से फर्क पड़ता है जिनसे सिर्फ हमें फर्क पड़ता है। 
हर विचारधारा को आत्मसात कर लेना, हर व्यक्तित्व को स्वीकार कर लेना, हर सोच को साकार होने का अवसर देना, हर जीव को जीने का अधिकार देना...हमारे समाज में सहिष्णुता के असल मायने यही थे, पिछले काफी अरसे से सहूलियत के हिसाब से सहिष्णुता और असहिष्णुता का जमकर दुरुपयोग चला आ रहा है लेकिन किसी की जान जाने से ज़्यादा असहिष्णुता किसी समाज के लिए क्या हो सकती है। ये अक्षम्य है ...