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बुधवार, 8 जून 2016

' उड़ता पंजाब ' के मायने


अब ये वाकई समझ से बाहर होता जा रहा है कि लोग आखिरकार सेंसर बोर्ड के पीछे हाथ-पांव-मुंह धोकर क्यों पड़े हैं। ' उड़ता पंजाब ' अब ये क्या नाम हुआ बताईए... जनाब जिस क्रिया कलाप के उपरांत उठना भी बमुश्किल होता है, आप वहां उड़ने की बातें कर रहे हैं (यही कुछ होगा ना आपकी फिल्म में)... ये तो Newton के सिद्धांतों के भी खिलाफ है। आप प्रकृति के विपरीत कैसे जा सकते हैं। Creative freedom के नाम पर कुछ भी परोस दिया जाएगा क्या ? 
फिर चुनाव भी जल्द होने वाले हैं, ऐसे में पंजाब को कैसे उड़ने दिया जा सकता है। चुनावों के बहुत दूरगामी परिणाम होते हैं जी, हैं जी... हां जी !!! ... आप समझते ही नहीं। और फिर देखिए फिल्म के नाम में जब दिल्ली हुआ तो ...'चलो दिल्ली' , उड़ो दिल्ली क्यों नहीं। गैंग्स ऑफ वासेपुर... मेरठिया गैंगस्टर, ज़िला ग़ाज़ियाबाद... मद्रास कैफे, बॉंबे वेल्वेट... वगैरह-वगैरह। Go Goa Gone भी इसी तरह बर्दाश्त की गई। गोवा में क्या वही सब होता है, लेकिन आप लोग सुधरेंगे नहीं।
 उड़ता पंजाब ... मतलब कुछ भी !!! नाम उड़ता गुलाब रख दो भाई... उड़ता जुराब रख दो। फिर जनाब शेक्सपीयर साहब भी तो कह गए थे जी ... what's in a name. "A rose by any other name would smell as sweet". अब आप क्या शेक्सपीयर से भी बड़े भारी क्रिएटिव हो गए हैं।
खैर, शेक्सपीयर तो विदेशी मामला हुआ, बात एक जांचे-परखे देसी नुस्खे की... कबूतर और बिल्ली का किस्सा तो आप सभी जानते हैं, कबूतर बिल्ली को देखकर अपनी आंखें बंद कर लेता है और मान लेता है बिल्ली अब नहीं है, वो चली गई है... और बेशक ये कलियुग है लेकिन आप यकीन मानिए... ये सिद्ध टोटका आज भी उतना ही प्रभावशाली है।
आप क्या कीजिए, उड़ता पंजाब फिल्म के नाम में से पंजाब हटा दीजिए और यकीन मानिए, जैसे ही आप ऐसा करते हैं, ये फिल्म एकदम झूठी हो जाएगी जनाब... ड्रग्स-फ्रग्स फलाणा-ढिकणा सब समस्याओं से तुरंत सबको छुटकारा मिल जाएगा... सब एकदम छूमंतर !!!

फिर समझो ना यार ...फिल्म जरूरी है या समाज ...
और ऐसी क्या क्रांति करना चाहते हो भाई, जो उड़ाने से ही हो सकती है। 

मान जाओ बुद्धिजीवी... समझो... इतनी कांट-छांट के बाद वैसे भी कौन उड़ सकता है।

रविवार, 5 जून 2016

विदेशी एप्पल बनाम स्वदेशी चप्पल




'एप्पल की चप्पल' ...
एक तरफ iPhone 8 को लेकर खबरों का बाज़ार गर्म है तो वहीं कुछ प्रतिभाशाली लोगों ने उसे खरीदने वालों के लिए फुटवियर बनाने की शुरुआत कर दी है। मतलब साफ है, ऊपर से नीचे तक ...अंदर से बाहर तक ...हर जगह एप्पल ही एप्पल... और इसके लिए एकदम ज़मीनी स्तर पर काम शुरु हो चुका है।
और हर स्तर पर ढेरों सरकारी एवं गैर-सरकारी योजनाएं हैं, प्रोत्साहन हैं ... चितेरे तैयार हैं समूची व्यवस्था को अपना बना लेने के लिए। और बनने-बनाने के इस खेल की शुरुआत की गई प्रोद्यौगिकी के इस शाहकार के नए अवतार के साथ। 
दरअसल कई लोगों ने पहले-पहल आई-फोन से ही इस महत्वाकांक्षी परियोजना का शुभारंभ किया था लेकिन हमारा तंत्र ऐसे उद्यमियों के मन की बात नहीं जान सका, इसके विपरीत कि उनके हुनर को तराशा जाए, उसे बढ़ावा दिया जाए... उनकी दुकानों को निशाना बनाया गया, उनके गोदामों पर छापे मारे गए, उन्हें गिरफ्तार कर सरेआम ज़लील किया गया। उनके गोरखधंधे की गाढ़ी काली कमाई को पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा कर दिया गया। उन लोगों का गुनाह सिर्फ इतना था कि वो सस्ते दामों पर लोगों को एप्पल के महंगे फोन मुहैया करा रहे थे। हालांकि लोगों की हैसियत को टटोलते हुए वो कई बार एप्पल के ही मार्केट रेट पर फोन मुहैया कराते थे, जिससे वो हीन-भावना के कतई शिकार न हों। एप्पल के हाथ यदि इनकी तकनीक मिल गई होती तो शायद भारत में आई-फोन का आगमन अंग्रेज़ों के साथ ही हो गया होता और हमने उनके तमाम एप्पल खरीदकर उन्हें हाथों-हाथ लौटती डाक और डोलते जहाज़ से वापिस रवाना कर दिया होता। 
लेकिन इतिहास को शायद इसी रूप में हमारे सामने आना था। इन जुझारू कुटीर उद्यमियों को बिना किसी नोटिस के कई दिनों की निगरानी के बाद धर-दबोचा गया और देसी जुगाड़ तकनीक को दरकिनार करते हुए हमारे बाज़ार ने एक बार फिर विदेशी ताकतों के आगे घुटने टेक दिए।
लिहाज़ा तकनीकी रूप से अत्यंत सक्षम और धंधे के हिसाब से बेहद घाघ इन समाजसेवियों के हश्र को देखते हुए बाकी अन्य चिंतक विचारक तुरंत दूसरे अन्य विकल्प तलाशते हुए फिर से समाजसेवा में तल्लीन हो गए। सभी ने सफलता का बेहद साधारण लेकिन परिश्रम वाला पथ अपनाते हुए, एक दूसरे नाम के साथ खुद को रजिस्टर कर, एक दूसरी पहचान को अपनाया और वो फिर से मैदान में कूद पड़े... एक नए नाम...एक नई पहचान... एक नए काम के साथ। ये तरीका ज़िंदगी में हर जगह काम करता है, बिल्कुल शाहरुख खान की फिल्मों की तरह। आप बस अपना सपना देखिए और सारी कायनात (सिस्टम) आपकी मदद को आमादा हो जाती है, लेकिन एक अदद कीमत के साथ। सपने देखने की भी एक कीमत होती है जनाब और उनके पूरे होने की कीमत अलग से अदा करनी पड़ती है। 
कई सालों पहले फोन का ये सपना हमारे देश में आना शुरु हुआ... फिर धीरे-धीरे विज्ञापन बाज़ार ने हर सपना आपके फोन से ही जोड़ दिया...
ज़र...जोरू औऱ ज़मीन से शुरु हुए सपने जन्नत तक जा पहुंचे ... सब कुछ बस एक फोन की बदौलत। ज़िंदगी आगे बढ़ने का नाम है लिहाज़ा जब फोन के सपने राशन कार्ड में लिख दिए गए तो देखते ही देखते एक पूरी की पूरी जेनरेशन ने आई-फोन के सपने पर ही अपनी ज़िंदगी जी ली।
वस्तुत: आई-फोन एक फोन से भी कहीं आगे बढ़कर एक जीवनशैली बन चुका है। ये आपकी सोच पर इस कदर हावी हो चुका है कि आप फोन भले ही किसी भी कंपनी का रखें लेकिन रिंग-टोन उसमें एप्पल की ही सुनाई देती है। 
लेकिन यहां मकसद एप्पल नहीं ... कुछ रणबांकुरों की सोच का वो अनूठा शाहकार है जो यकीनन उन्हें एक दिन स्टीव जॉब्स के समकक्ष लाकर खड़ा कर देगा। कुछ बाएं हाथ से काम करने वाले मित्रों का मानना है कि इस अत्यंत मानवापयोगी आविष्कार की उत्पत्ति पड़ोसी मित्र देश चीन की उदारवादी नीतियों की ही देन है। दरअसल वहां का खुला बाज़ार, प्रदूषण रहित ऑड-ईवन नीतियां औऱ सौम्यवादी प्रोत्साहन इस तरह के उत्पादन के लिए बिल्कुल मुफीद है। चप्पल से लेकर चिकनकारी तक... सब कुछ एप्पल मार्का एकदम संभव है, जहां चैंपियन एथलीट तक फैक्ट्री में तैयार किए जाते हैं वहां छोटे-मोटे उत्पादों की क्या बिसात। 
सिर्फ एक request है आप सभी से... जहां से भी इन हुनरमंद उद्यमियों की जानकारी मिले, इनसे इनकी प्रेरणा के बारे में जरूर पूछें कि आखिर उन्हें ये क्या सूझा। तब तक इन चप्पलों को घिसें, घिसते रहें ...एक अदद i-फोन एक दिन जरूर प्रकट होगा...

(हर सपना सच होगा) सनद रहे ...


हर हाथ में एप्पल
हर पांव में चप्पल...






( उपर्युक्त पोस्ट का किसी भी फोन या फोन कंपनी से कोई लेना-देना नहीं है। कृपया इसे संदर्भित साक्ष्यों... तथ्यात्मक एवं तार्किकता की कसौटी पर ना परखा जाए )

मंगलवार, 31 मई 2016

कौन है असली ' विलेन '

हम लोग दिल्ली में रहते हैं, देश की राजधानी दिल्ली में। साल भर हम तरह-तरह की वर्षगांठ और खुशफहमियां मनाते हैं। देश की राजधानी, देश का आईना भी है लिहाज़ा देश भर पर चर्चा, परिचर्चा औऱ खर्चा सब यहां होता है... और फिर ये आईना एक दिन एक ऐसी सूरत आपको दिखा देता है कि आप आईने से नफरत करने लगते हैं... लेकिन उस सूरत और सीरत से नहीं । फिर वक्त के साथ-साथ वो तस्वीर धुंधली होती जाती है... धुंधली होते होते उसका वजूद खत्म हो जाता है। न कोई सीख...न कोई सबक, हम मान लेते हैं माहौल ठीक है और एक दिन फिर से आपका ये भ्रम टूट जाता है ... आईना आपको एक नई सूरत दिखाता है, आप इस सूरत से और भी ज़्यादा नफरत करते हैं... रस्म अदायगी के तौर पर आप कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हैं, फिर दिल और पक्का कर उसकी भर्त्सना करते हैं, कुछ जुलूस ...कुछ बैठकें... कुछ दिशानिर्देश, जो कुछ दिन बाद फिर से दिशाहीन हो जाते हैं।

 राजधानी दिल्ली के पॉश वसंतकुंज इलाके में कांंगो के एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। वजह ऑटोरिक्शा में बैठने को लेकर हुआ विवाद।
 पुलिस के मुताबिक ये नस्लीय आधार पर हुआ हमला नहीं है, ये कोई Hate crime नहीं है, ऑटो में बैठने को लेकर झगड़ा हुआ जिसके बाद वीभत्स तरीके से इस युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना पर विश्व भर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। राजधानी दिल्ली में सभी अफ्रीकी देशों के राजदूत ने अपना विरोध दर्ज कराया। एक तरफ अफ्रीका दिवस का आयोजन और दूसरी तरफ इस तरह का दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम। विरोधस्वरुप अफ्रीकी देशों के राजदूतों ने इस आयोजन में शामिल न होने का निर्णय लिया, जिसे बाद में बहुत समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने वापस ले लिया।
वस्तुत: अपराध से ज़्यादा अपराध के पीछे की मानसिकता आपको सोचने पर विवश करती है।
इस घटना के कई पहलू हैं... आपराधिक, सामाजिक, कूटनीतिक, आर्थिक... और इन तमाम पहलुओं की अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
अखबारों में...न्यूज़ चैनल्स में इस खबर के करीब-करीब हर पहलू को खंगाल लिया गया है, लेकिन माहौल में एक वैचारिक अवरोध जस का तस बरकरार है।
आप prejudices और bias के आधार पर किसी को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते हैं। अगर कोई एक व्यक्ति किसी अपराध में संलिप्त पाया जाता है तो उस देश, शहर, समाज, धर्म, जाति या नस्ल के सभी लोगों को अपराधी करार नहीं दे सकते। हर व्यक्ति स्वयं अपने फैसलों के लिए उत्तरदायी होता है। यदि कोई अफ्रीकी नागरिक किसी अपराध में संलिप्त पाया गया है तो सभी अफ्रीकी नागरिक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आप सभी को संदेह के दायरे में नहीं रख सकते हैं। आप सिर्फ इस आधार पर सभी से भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते हैं।
ऐसे अपराध संकुचित सोच और आपराधिक प्रवृति  का ही नतीजा हो सकते हैं। लेकिन अपराधी ये भूल जाते हैं कि इसके कितने दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। और अगर इतनी समझ इतना विवेक उनमें पहले ही होता तो ऐसी नौबत शायद कभी नहीं आती।
आप अखबार में छपी रिपोर्ट के इस हिस्से को पढ़िए। इस तरह के अपराध का ये भी एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। लोगों से...समाज से ...व्यवस्था से आपका भरोसा उठने लगता है और एक लोकतांत्रिक प्रणाली में ये कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं है। आप सिहर जाते हैं जब आपको ऐसी भावनाओं से अवगत कराया जाता है लेकिन कहीं न कहीं इसके लिए आप भी जिम्मेदार हैं , क्योंकि जब आपको इसका हरसंभव विरोध करना चाहिए था उस वक्त आप बारिशों में भीगा वीकेंड मनाने में मशगूल थे। आपके पास तमाम व्यस्तताएं थीं लेकिन फिर आप इस सब के बारे में सोचते भी क्यों... इससे आपका क्या सरोकार। आप यहां जो करते हैं उसकी प्रतिक्रिया आपको जरूर मिलती है। हिंसक घटना की अहिंसक प्रतिक्रियाएं अमूमन नहीं होती, ये खुद को ही धोखा देने जैसी बात हुई।

अतिथि देवो भव: । आप करोड़ों-अरबों रुपए विज्ञापन पर फूंक दीजिए, लेकिन सालों की मेहनत से जो छवि आप बनाते हैं... अर्जित करते हैं, ऐसी घटनाएं एक पल में उस पर सवालिया निशान लगा देती है। सांप निकल जाने के बाद आप लकीर पीटते रहिए, लेकिन सार्थकता सही समय पर उठाए गए सही कदम की ही होती है। लोगों में भरोसे का कायम रहना जरूरी है, एक व्यवस्था में भरोसा रहना जरुरी है। लेकिन आप सिर्फ इस सोच के साथ नहीं चल सकते कि किसी अन्य देश के नागरिक को मिली सुरक्षा की गारंटी उस देश में आपके अपने नागरिक के अधिकारों की रक्षा समान है, ये कोई बदले की कार्रवाई नहीं है, ये किसी का अधिकार है तो आपका कर्तव्य भी। 
मैनें कहीं किसी अखबार में डैमेज कंट्रोल शब्द को भी छपा पाया। किसी भी समाज के लिए डैमेज कंट्रोल एक बहुत ही वाहियात अवधारणा है, पहली कोशिश उस तथाकथित 'डैमेज' को होने ही न देने की होनी चाहिए। लेकिन हम इंतज़ार करते हैं, हमें मुद्दों, मसलों और मामलों की गंभीरता से फर्क नहीं पड़ता है, हमें सिर्फ उन चीज़ों से फर्क पड़ता है जिनसे सिर्फ हमें फर्क पड़ता है। 
हर विचारधारा को आत्मसात कर लेना, हर व्यक्तित्व को स्वीकार कर लेना, हर सोच को साकार होने का अवसर देना, हर जीव को जीने का अधिकार देना...हमारे समाज में सहिष्णुता के असल मायने यही थे, पिछले काफी अरसे से सहूलियत के हिसाब से सहिष्णुता और असहिष्णुता का जमकर दुरुपयोग चला आ रहा है लेकिन किसी की जान जाने से ज़्यादा असहिष्णुता किसी समाज के लिए क्या हो सकती है। ये अक्षम्य है ...

रविवार, 5 जुलाई 2015

पत्रकार की ज़िंदगी और मौत


कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी है तेरी
जिस पर तू इतराता है
तेरे पत्रकार होने के वजूद पर
पत्रकार नहीं...
बल्कि कोई और ठप्पा लगाता है,
हर गली में अब पत्रकार हैं...
तू क्या एक्सक्लूज़िव बना धक्के खाता है...
बातों से दुनिया नापते हो रोज़...
और तेरा सैलरी अकाउंट ...
रोज़ तुझे तेरी औकात बताता है...
मानेगा नहीं तू पर ये सच है...
आखिर तू भी तो इंसान है...
इसमें झिझकना क्या...
किससे शर्माता है...
तुझे गुमान है ...
तुझे खबरों की समझ है...
अच्छा ...
लिख-लिख...
लिख ले खबर...
फिर तान दे...
तू जान दे या ईमान दे...
तेरी खबर कोई कितनी चलाता है...
ये खबर तय नहीं करती है...
बल्कि तू जनता को उसे कितना बेच पाता है...
सच सच बता...
कितनी बार वक्त पर खाना खा पाता है...
दो निवाले अंदर जाते है...एक फोन आता है...
और तू उठ जाता है...
ज़माने भर के सरोकार की बातें मत कर...
क्या जरूरत के वक्त तू अपने घर भी पहुंच पाता है...
अपने हक़ की आवाज़ उठाने के लिए भी सोचता है...
सोचता है... फिर सोचता है...
और सोचता रह जाता है...
फिर एक दिन तुम्हारा एक निर्भीक साथी...
किसी खबर की पड़ताल करते-करते...
ऑन ड्यूटी...
एक नैचुरल मौत मर जाता है...


रविवार, 21 जून 2015

एक पत्रकार की मौत

पत्रकार... व्यवस्था/तंत्र का एक बहुत जरूरी हिस्सा होते हैंलेकिन ये जरूरी नहीं कि व्यवस्था/तंत्र भी उन्हें उतना ही जरूरी समझे। जरूरी होना और जरूरत होना, ये दो अलग-अलग भाव हैं ...
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वैसे बात सिर्फ पत्रकारिता की नहीं है,  जिन लोगों में ये हुनर होता हैवो कहीं भी किसी भी व्यवस्था में अपने आप को जरूरी साबित कर लेते हैं। ऐसे मामलों में कई अपवाद भी देखने को मिलते हैंकुछ लोग अपनी प्रतिभा के बलबूते पर अपनी जगह बनाते हैं तो कुछ लोगों का हुनर खुद के महत्व को मनवाना और अपनी काबिलियत को स्थापित कर लेना भी होता है।

पत्रकार जगेन्द्र का इन सब बातों से सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं हैलेकिन एक पत्रकार होने के नाते वो भी स्वयं इस व्यवस्था/तंत्र का ही हिस्सा रहे। उनकी दर्दनाक मौत आम जनता और स्वयं पत्रकार बिरादरी के सामने कई अहम सवाल छोड़ गई है। आखिर उनकी मौत का सच क्या है, एक सभ्य समाज में इस तरह का अमानवीय कृत्यअक्षम्य है। क्यों किया गया, किस लिए किया गयाकैसे अंजाम दिया गया... किसके लिए किया गया... सवाल तमाम हैंलेकिन दरिंदगी की तमाम हदें पार करके ऐसे अपराध को अंजाम देने वाले लोग यकीनन इंसान तो नहीं हो सकते। कानून के साथ-साथ ये लोग इंसानियत के गुनहगार है।
कानून पर भरोसा हमारी सोचदिनचर्यापरवरिश और पेशे का हिस्सा है। भरोसा है जगेन्द्र को न्याय जरूर मिलेगा ठीक है आप जांच कराईए... तसल्लीबख्श तरीके से जांच कराईए,  आप पूरी तरह आश्वस्त हो जाइए कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष। पूरे होशोहवास में कोई नहीं चाहता कि किसी निर्दोष को सज़ा मिले लेकिन जिसने जुर्म किया है सज़ा उसे कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिएऐसी सज़ा जो एक नज़ीर साबित हो। 
जगेन्द्र सिर्फ एक पत्रकार थेएक मामूली पत्रकार ... वो भी शहर और सत्ता से दूर ... पहले तो वो खुद एक छोटी से खबर बन कर रह गए। ऐसे में एक छोटी सी खबर जगेन्द्र को जरूरत वाले भाव का पत्रकार जगह-जगह खोजता रहा... अखबारों में , टीवी पर, खबरों में , चर्चा में, लोगों में ...चेहरों में ... कहीं से खबर मिले... क्या वाकई एक पत्रकार को जिंदा जलाने की खबर में सच्चाई है, खबरों की जिंदगी जीने वाला पत्रकार मौत की इस खबर पर शायद भरोसा ही नहीं करना चाहता था, आखिर करता भी तो कैसे...
जगेन्द्र की मौत का सच जनता के सामने आना भी उतना ही जरूरी है जितना पत्रकार बिरादरी के लिए, जितना जरूरी वो कानून व्यवस्था के लिए है, उतना ही जरूरी इस व्यवस्था में आस्था और विश्वास के लिए है...
जाने से पहले जगेन्द्र कह रहे थे... मुझे पीट लेते, ज़िंदा क्यों जलाया जगेन्द्र अब जिंदा नहीं है... लेकिन उनका ये सवाल ज़िंदा है और जब तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलता ये सवाल यूहीं ज़िंदा रहेगा।



(ये सवाल उन सभी लोगों के लिए भी है, जो शरीर से ज़िंदा हैं लेकिन आत्मा, ईमान, आत्मसम्मान और सोच जैसी तमाम कसौटियों के मुताबिक एक अर्से से मृतप्राय हैं, जो जरूरत से बढ़कर शायद जरूरी... बेहद जरूरी हो गए हैं)

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

पेशेवर... एहसान-फरामोश

हर हर्फ़ चुप है
क्यूँ क़लम चुप है
नज़रें बेबस नहीं 
बेशर्म हैं...
और चुप हैं
पर्दे के पीछे विकृत से
गुनहगार हैं चेहरे 
ख़ामोश हैं
ये किन लोगों से इंसाफ़ चाहिए तुम्हें
ये कमज़र्फ हैं 
पेशे से एहसानफरामोश हैं ...

बुधवार, 6 नवंबर 2013

Delhi : You Suggest - दिल्ली समस्याएं और समाधान


एक कदम हम बढ़ाएं
एक कदम तुम
एक कदम हम बढ़ाएं
एक कदम तुम
गाएं खुशियों का तराना
गाएं खुशियों का तराना
साथी हाथ बढ़ाना ... 
साथी हाथ बढ़ाना ...


एक नुक्कड़ नाटक में इन पंक्तियों का इस्तेमाल किया था कॉलेज के दिनों में, आज भी प्रासंगिक है... हमेशा रहेंगी । क्योंकि बदलाव, सुधार या विकास तभी हो सकता है जब आपके परिवेश में एक से ज़्यादा आयाम उसे अपनाना चाहते हों। सरकार हो, विपक्ष या आम जनता ... जिम्मेदारी सभी की है। 

इससे पहले हम बात कर चुके हैं उन समस्याओं की, जिनसे आपकी दिल्ली, हमारी दिल्ली रोज़ाना जूझ रही है, हम बात कर चुके हैं उन मुद्दों की जो हमारी दिल्ली के इंटीग्रेटेड विकास के लिए अवश्यंभावी है। मुद्दे हमारे हैं तो रास्ता भी हमें ही सुझाना होगा। समस्याएं हमारी दिल्ली की हैं तो समाधान भी हमें ही सुझाना होगा ताकि इन तमाम समस्याओं से हमें जल्द से जल्द मुक्ति मिल सके।

अपराध और भयमुक्त दिल्ली
राजधानी दिल्ली को अपराध मुक्त और भयमुक्त बनाना होगा , जहां आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करें तो महिलाएं भी बिना किसी डर के जिएं।
दिल्ली पुलिस में खाली पड़े पदों को जल्द से जल्द भरा जाए, पुलिस को अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध कराए जाएं, उपयुक्त ट्रेनिंग दी जाए। 
राजधानी के बॉर्डर और महफूज़ किए जाएं। 
वीआईपी सुरक्षा में तैनात जवानों को आम लोगों की सुरक्षा में भी इस्तेमाल किया जाए। 
किसी भी देश की पुलिस का मॉडल आंख मूंदकर अपनाया ना जाए, पुलिसिंग का एक ऐसा मॉडल विकसित किया जाए जो हमारी दिल्ली की जरुरत है। 
दिल्ली जैसे शहर में जितनी विविधताएं हैं उतनी ही सुरक्षा की तरह-तरह की जरुरतें भी। 
पुलिस भले ही गृह मंत्रालय के अधीन हो या दिल्ली के , आम नागरिक का खुद को सुरक्षित महसूस करना बहुत जरुरी है।

महंगाई से मुक्ति
जिस तरह से महंगाई लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है, सरकार को ये देखना होगा कि महंगाई किसी भी तरह काबू से बाहर ना जाए। 
जमाखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, मिलावटखोरों, मुनाफाखोरों को ना बख्शा जाए।
सप्लाई और डिमांड का सामंजस्य बनाकर रखा जाए, नए नियम बनाने की शायद जरुरत ना पड़े लेकिन जो भी नियम हैं उनका कड़ाई से पालन किया जाए। 
करप्शन को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त ना किया जाए, महंगाई तभी काबू में रह पाएगी।

बिजली-पानी का अधिकार
निजीकऱण अगर समाधान है तो उसे समस्या ना बनने दिया जाए। उसे लाल-फीताशाही की भेंट ना चढ़ने दिया जाए।
निजी कंपनियों पर नज़र रखी जाए, औचक ऑडिट को प्राथमिकता दी जाए, लोगों से जुड़ा मुद्दा है, लिहाज़ा ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल किया जाए ताकि कहीं बिल ज्यादा है तो क्यों है ये पता किया जा सके। पारदर्शिता बहुत जरुरी है, इसके लिए सिस्टम में लोगों को शामिल करना बहुत जरुरी है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका उनसे सीधा सरोकार है।
साथ ही जो लोग कानून का पालन नहीं करते हैं उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, पानी-बिजली चोरों को ना बख्शा जाए।

विकास में सामंजस्य
विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है ये मैने पहले भी कहा था। सामंजस्यता के अभाव में विकास अपनी उपयोगिता खो बैठता है।
आबादी अगर 10,000 लोगों की है तो सुविधाएं भी उसी अनुपात में हो, अन्यथा विकास और सुविधाएं अपनी सार्थकता खो बैठते हैं।
या फिर दो बड़ी सड़कों को जोड़ने वाली सड़क बदहाल हो तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है।
एक फ्लाईओवर या अंडरपास बनता है तो उसके आसपास भी ध्यान देना होगा, विकास में सामंजस्य जरुरी है।

विकास की समग्रता
विकास की समग्रता होना बेहद जरुरी है, अगर आप कनॉट प्लेस को रेनोवेट करते हैं तो पुनर्वास कॉलोनियों के विकास का भी आपको ध्यान रखना होगा।
अगर नई दिल्ली की सड़कें चमचमाती हुई हों तो बाहरी दिल्ली के लोगों को भी सड़क का हक है।
बारिश में शहर तालाब ना बने ये प्लानिंग कौन करेगा।
टाउन प्लानिंग में ध्यान दिया जाए। मास्टर प्लान का विधिवत पालन किया जाए और उन चीज़ों को जगह दी जाए जो शहर की जरुरत हैं।
सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी तय की जाए।

मैंने पहले ही कहा है ... हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं !!!

प्रदूषण से निवारण
प्रदूषण शहर को धीरे-धीरे खा रहा है।
हमें सड़कों पर वाहनों की संख्या पर अंकुश लगाना होगा।
रात के वक्त दिल्ली शहर की सड़कों से गुजरने वाले भारी वाहनों की तादाद को काबू में करना होगा। हमें वैकल्पिक उपायों पर जल्द से जल्द काम करना होगा।
प्रदूषण फैलाने वाले बची-खुची फैक्ट्रियों को शहर से बाहर निकाल फेंकना होगा।
एक शहर को उसमें रहने वाले लोग ही बचा सकते हैं, लिहाज़ा हमें अपने शहर को खुद ही बचाना होगा।

बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा
शहर को एक इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है, मेट्रो को शहर के हर कोने तक पहुंचाया जाए।
जहां मेट्रो नहीं जा सकती वहां मोनो रेल या फिर कोई दूसरा उपयुक्त ट्रांसपोर्ट सिस्टम, जैसे दिल्ली परिवहन सेवा यानि डीटीसी की उपलब्धता दिन के 24 घंटों किसी ना किसी तरह बरकरार रखी जाए।
ग्रामीण सेवा , सारथी सेवा जैसी सेवाओं को रेग्युलेशंस के दायरों में चलाया जाए।
सार्वजनिक परिवहन सेवा को सस्ता रखा जाए साथ ही सुरक्षित भी।

बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात
एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम, सोचे-समझे और सिर्फ जरुरी डायवर्जन। 
वीआईपी मूवमेंट के समय बेहतर प्लानिंग।
लोगों को समय-समय पर ट्रैफिक नियमों की जानकारी देते रहना, अवेयरनेस कैंपेन चलाना। 
और साथ ही लोगों को गलती करने से रोकना प्राथमिकता रहे बजाय चालान काटने के।

शहर की हरियाली का ध्यान
पेड़ शहर को जिंदा रखते हैं। हमें जिंदा रहने के लिए अपने पेड़ों को जिंदा रखना होगा।
रिज इलाके को अतिक्रमण से बचाना होगा।
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे, और पेड़ों को कटने से बचाना होगा। कई बार पेड़ सरकारी एजेंसियों की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं तो कई बार लोग अपनी बेवकूफी के चलते जान-बूझकर भी पेड़ों को कटवा देते हैं।
जलस्तर को भी बरकरार रखना होगा।
ध्यान सरकार को भी रखना होगा, संस्थाओं को भी और हमें भी। 

साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखना जितना सरकार की जिम्मेदारी है उतनी ही यहां रहने वाले लोगों की भी।
अपने स्तर पर सभी को प्रयास करने होंगे।
हमें ध्यान रखना होगा कि हम अपने आस-पास गंदगी ना फैलाएं।
और उसके बाद सरकार को ये जिम्मेदारी लेनी होगी कि वो शहर को साफ सुथरा रखे और जिस सरकारी एजेंसी की भी जिम्मेदारी है वो पूरी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे, नहीं तो एक बार हालात काबू से बाहर जाने के बाद वापस ठीक करने में ज्यादा प्लानिंग, ज्यादा मेहनत और ज्यादा फंड्स की जरुरत होगी। शहर को कूड़ाघर बनने से रोकना होगा। 

अवैध क़ॉलोनियों का नियमन
अवैध कॉलोनियों का नियमन हो या ना हो ये भले ही बहस का मुद्दा रहा हो लेकिन अब ये इसी शहर का एक अभिन्न अंग बन चुकी हैं जहां एक शहर का आबादी का एक बड़ा हिस्सा रहता है।
अब ऐसे हालात में कोरे चुनावी वादों को छोड़कर इन कॉलोनियों के लिए एक उपयुक्त पॉलिसी की जरुरत है जो इनके अस्तित्व को विकास की समग्रता प्रदान करे। 

यमुना को बचाना होगा
एक नदी एक शहर को जीवन देती है जबकि दिल्ली एक ऐसा शहर बन गया है जो उस नदी का ही काल बन गया।
हज़ारों करोड़ों रुपए यमुना को साफ करने के नाम पर खर्च कर दिए गए लेकिन हालात जस के तस। कहां गए ये जांच का विषय है , ये बाद का विषय है... फिलहाल हमें हर हाल में यमुना हो बचाना होगा।
खादर इलाके में अतिक्रमण को रोकना होगा।
सरकारी या गैर-सरकारी हर तरीके के निर्माण पर नज़र रखनी होगी।
नदी में गिरने वाले नालों को जितना संभव हो साफ करना होगा, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की संख्या और क्षमता बढ़ानी होगी।
साथ ही नदी के बहाव को रोकने, बांधने की कोशिश करने से भी बचना होगा।

सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर के कई हिस्सों में सीवरेज सिस्टम सालों पुराना है, आउटडेटेड हो चुका है, ऐसे में हल्की सी बारिश भी झेल पाना उसके बूते से बाहर हो जाता है।
ऐसे में भुगतना वहां के लोगों को पड़ता है।
ऐसी जगहों की पहचान कर जल्द से जल्द इस सिस्टम को बदलना पड़ेगा।
साथ ही शहर के कई हिस्सों में सीवरेज सिस्टम है ही नहीं ऐसे में लोगों की इस बुनियादी जरुरत को वहां तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है, ये कोई कोरा चुनावी वायदा नहीं होना चाहिए।  

भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।
घूस लेने वालों के साथ साथ घूस देने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
हेल्पलाइन नंबर, पहचान गुप्त रखना, सही शिकायत पर कड़ी कार्रवाई और झूठी शिकायत पर सज़ा ... सिस्टम में सब कुछ है, सवाल सिर्फ मुकम्मल इस्तेमाल का है।
हमें जागरुक होना होगा, जहां जरुरत है वहां लोगों को जागरुक भी करना होगा ताकि भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली का सपना सिर्फ सपना बनकर ना रह जाए।

और अब बात सबसे जरुरी और अहम समाधान की ...

चुनावी वादों की सच्चाई
चुनावों के वक्त नेता वादे तो करते हैं
लेकिन क्या जीतने के बाद ये वादे पूरे भी किए जाते हैं,
क्या जीतने के बाद नेता पलटकर लोगों का रुख भी करते हैं।
जीतने के बाद नेता आम से खास हो जाते हैं या फिर जो खास हैं वो खास ही रहते हैं।
ऐसे में उन तक पहुंचा कैसे जाए, इस पहेली को आम जनता को ही सुलझाना होगा।
जनता और नेता के बीच के इस फासले को पारदर्शिता के उसी हथियार के जरिए मिटाना होगा जो लोकतंत्र ने हमें इस सिस्टम के हर स्तर पर प्रदान किया है। 

समस्याएं हैं तो समाधान भी है
लोग परेशान हैं तो अनजान भी हैं ...
जनता से जुड़े हर मुद्दे को उठाना होगा ...
सिस्टम में पारदर्शिता को हथियार बनाना होगा ...
दिल्ली को चलाने में बढ़े लोगों की भागीदारी
हर आवाज़ को हमें ...
जनता की आवाज़ बनाना होगा। 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

My Delhi Manifesto- क्या चाहती है दिल्ली !!!














" दिल्ली – सपनों का शहर ... खुशियों का शहर ... उम्मीदों का शहर ... आशाओं का शहर। कुछ यही सपने लिए जाने कितने लोग दिल्ली आते हैं ...और जाने कितने यहां रहते हैं। "

बात कॉलेज के दिनों की है ... जब ये चंद लाइनें अपनी एक डॉक्यूमेंट्री के लिए लिखी थी।

सपने अब भी वैसे ही हैं, खुशियां अभी भी उतनी ही प्यारी हैं, उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं... आशाएं अब भी हैं... और इन सब के बीच अपनी दिल्ली भी कितनी बदल चुकी है। दिल्ली की जरुरतें कितनी बदल चुकी हैं... दिल्ली की आबादी कितनी बढ़ चुकी है। लेकिन क्या बढ़ती आबादी, फैलती दिल्ली और बदलती दिल्ली ... जरुरतों और विकास के बीच किसी भी तरह का सामंजस्य हम स्थापित कर पाए हैं, बड़ा सवाल ये है।
सवाल किसी सरकार या पार्टी विशेष का नहीं है।
सवाल दिल्ली का है...दिल्ली की आबादी का है...दिल्ली की जरुरतों का है...दिल्ली के विकास का है। सवाल दिल्ली के लोगों का है।
अपनी उम्र के हिसाब से दिल्ली के बदलाव का करीब-करीब तीन दशकों तक का दौर अभी तक मैने भी जिया है। मुद्दे कमोबेश वही रहे हैं ...बस वक्त वक्त पर लोगों की प्राथमिकता बदलती रहती है।

अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली
दिल्ली देश की राजधानी है। अगर इसी राजधानी के लोग खुद को सुरक्षित महसूस ना करें तो हालात वाकई चिंताजनक हैं। उस पर महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ते अपराध...छीनाझपटी...छेड़छाड़ औऱ बलात्कार ... दिल्ली पुलिस केन्द्र के अधीन हो या राज्य के, दिल्लीवालों की मांग अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली की है जो उनका अधिकार है।
महंगाई – जी हां ... दिल्ली महंगाई से मुक्ति चाहती है।
देश के किसी भी हिस्से में कहीं भी कुछ भी होता है , उसका असर सीधा राजधानी दिल्ली के बाज़ारों ... घरों ... रसोईघरों पर पड़ता है। प्याज़ रसोईघरों से निकल कर चुनावी मुद्दा बन जाती है। और बात सिर्फ प्याज़ की नहीं है महंगाई की मार से आम आदमी सालों से बेहाल है । आखिर राजधानी में रहने की कीमत लोग चुकाएं ये कहां तक जायज़ है। जीना महंगा और लगातार महंगा होता जा रहा है।
बिजली-पानी का अधिकार 
 क्या निजीकरण हर समस्या का समाधान है। सवाल भी आपके सामने है और जवाब भी।  दिल्ली जैसे शहर को 24 घंटे बिजली- पानी की दरकार है। कहीं बढ़े बिल तो कहीं बिजली नहीं ... तो कहीं पानी की बूंद तक नहीं। मानो शहर का हर हिस्सा एक अलग जिंदगी जी रहा है।
विकास में सामंजस्य  
 राजधानी दिल्ली विकास चाहती है लेकिन विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है। आप एक फ्लाईओवर बनाते हैं लेकिन जहां वो फ्लाईओवर खत्म होता है वहां सड़क इतनी संकरी हो जाती है कि आपका फ्लाईओवर जाम का समाधान नहीं जाम का सबब बनता है।
शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से औऱ शहर के बढ़ते विस्तार के साथ साथ सुविधाओं का सामंजस्य बहुत जरुरी हो जाता है। 
विकास की समग्रता 
 विकास आबादी के हर हिस्से तक पहुंचे और शहर के हर कोने तक , ये भी सुनिश्चित करना होगा। एक बारिश में ही सरकारी एजेंसियों के दावों की पोल खुल जाती है। सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं, अंडरपास बसों को अपने आगोश में ले लेते हैं । जगह-जगह सड़कों पर गड्ढे ...

 हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं।

प्रदूषण से निवारण 
 प्रदूषण से छुटकारा पाने के तमाम उपाय जैसे नाकाफी साबित होते जा रहे हैं। सड़कों पर वाहनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, रात के वक्त राजधानी से गुजरने वाले भारी वाहन हवा को इतना ज़हरीला बना देते हैं कि दिन भर आपका दम घुटा सा रहता है।
बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा 
शहर की आबादी के हिसाब से लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए शहर को एक इंटीग्रेडेट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है। जो शहर के हर हिस्से तक पहुंचना आसान बनाए ... सुरक्षित बनाए और सस्ता भी। जरुरत मेट्रो की भी है तो बसों की भी। उपयोगी ग्रामीण सेवा भी है, जरुरत सिर्फ समुचित संचालन की है।
बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात 
दिल्ली को एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम की जरुरत है जो शहर में दौड़ने वाले ट्रैफिक पर काबू रखे साथ ही जगह-जगह लगने वाले जाम पर भी जो लोगों के वक्त के साथ साथ उनकी जेब पर भी भारी पड़ रहा है। अक्सर वीआईपी मूवमेंट भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। ध्यान इस बात का रखा जाना चाहिए कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें बजाय इसके कि ज़ोर उनका चालान काटने पर दिया जाए। 
शहर की हरियाली बरकरार रखनी होगी
हमें ध्यान रखना होगा कि विकास पर्यावरण की कीमत पर ना हो । शहर का कंक्रीट शहर की हरियाली को ना निगल जाए। दिल्ली का फेफड़ा माना जाने वाला रिज इलाका धीरे धीरे उपेक्षा का शिकार हो रहा है, अतिक्रमण दिल्ली की हरियाली को निगल रहा है। जो पेड़ सालों से नहीं गिरे सरकारी विभागों की लापरवाही की भेंट ना चढ़ें। दिल्ली अपने बाशिंदों को स्वस्थ रखे, इसके लिए जरुरी है दिल्ली खुद तंदरुस्त रहे, हरी- भरी रहे। साथ ही लगातार गिर रहे जलस्तर पर भी नज़र रखी जाए और इसके लिए जो नियम कानून बनाए गए हैं उनका सख्ती से पालन किया जाए।
साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखने की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों की है वो अपना काम ठीक से करें, दिल्ली ये गारंटी मांगती है। शहर गंदा ना दिखे, दिल्ली इसकी गारंटी भी मांगती है। दिल्ली का एक हिस्सा वो भी है जहां आप कूड़े के पहाड़ देखते है, जहां आसपास के निवासी और वहां से गुजरने वाले एक अजीब सी बू के आदी हो चले हैं। डंपिंग ग्राउंड्स और लैंड-फिल साइट्स शहर का दाग ना बन जाएं, हमें शहर चाहिए... कूड़ाघर नहीं।
अवैध कॉलोनियों का नियमन
राजधानी में जिस वक्त जगह-जगह अवैध कॉलोनियां कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं तब शायद अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि आज वो दिल्ली की इतनी बड़ी आबादी का पता बन जाएंगी। पीने के लिए पानी नहीं, कई जगह बिजली नहीं, ना सड़कें ना सीवर, विकास की वास्तव में जरुरत इन कॉलोनियों को है जहां विकास चाहिए , परस्पर समन्वय के साथ विकास। सिर्फ दावों और वादों से काम नहीं चलेगा, काम कर के दिखाना होगा क्योंकि आपके चाहते और ना चाहते हुए भी अब ये हमारे शहर का ही हिस्सा है।
यमुना को बचाना होगा 
दिल्लीवाले अपनी धरोहर यमुना को लेकर साल में कुछ ही दिन जागते हैं लेकिन हज़ारों करोड़ों रुपए फूंकने के बाद भी यमुना की हालत बद से बदतर ही हुई है। यमुना में गिरने वाले नाले तमाम सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। इससे पहले कि ये शहर अपनी नदी को हमेशा के लिए खो दे ... जरुरी कदम उठाने होंगे, सरकार को भी और इस शहर को भी।
सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर में कई जगह अभी भी सीवरेज सिस्टम पहुंचा नहीं है कई जगह अंतिम सांसे ले रहा है... और इसका नतीज़ा लोग हर साल भुगतते हैं। बदलाव और सुधार ...जरुरत यहां भी है।
भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
सरकार के लाख दावों के बावजूद राजधानी अब तक भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो पाई है। भ्रष्टाचार हमेशा से ही जनसाधारण का पसंदीदा दर्द और दर्दनिवारक मुद्दा रहा है (भ्रष्टाचार को कोस-कोसकर लोग शांत हो जाते हैं। भ्रष्टाचार से ना सिर्फ आम आदमी परेशान है बल्कि सरकारी खजाने को भी चपत लग रही है। दिल्ली सरकार के हर विभाग को भ्रष्टाचार मुक्त देखना हर दिल्लीवासी का सपना है।
औऱ अब सबसे जरुरी बात जोकि दिल्ली और दिल्ली के लोगों के लिए सबसे जरुरी है
चुनावी वादों की सच्चाई
जी हां ... चुनाव के वक्त नेता वादे तो कर जाते हैं लेकिन उन वादों की हकीकत क्या है ये अगले चुनाव आने पर ही पता चलता है जब जनता के सामने उन वादों पर हो रहे दावों की कलई खुलती है।

दिल्ली शिक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सुरक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सूचना का अधिकार चाहती है
दिल्ली ज्यादा कुछ नहीं चाहती है ... बस 
विकास का अधिकार चाहती है ... 
दिल्ली...
जीने का अधिकार चाहती है 
यही सब कुछ है जो अपनी गति से धीरे-धीरे हो गया होता तो शायद कुछ ऐसे नए मुद्दे आ गए होते जो वक्त के हिसाब से मुनासिब रहते... लेकिन मुद्दों का ये बैकलॉग सालों से है ... औऱ दिलवालों की ये दिल्ली इस बैकलॉग को कब तक बर्दाश्त कर पाती है , ये देखना होगा। ये दिल्ली अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी बखूबी जानती है , इंतज़ार कीजिए ...नतीजा आप खुद देखेंगे ... फर्क आप खुद महसूस करेंगे। 

दिल्ली की हालत फिलहाल कैसी है ये आपके सामने है ... हमें ऐसी दिल्ली चाहिए जहां विकास है तो विरासत भी । गूगल से साभार ली गई ये तस्वीर शायद यही कुछ बयां करती है। 
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