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मंगलवार, 31 मई 2016

कौन है असली ' विलेन '

हम लोग दिल्ली में रहते हैं, देश की राजधानी दिल्ली में। साल भर हम तरह-तरह की वर्षगांठ और खुशफहमियां मनाते हैं। देश की राजधानी, देश का आईना भी है लिहाज़ा देश भर पर चर्चा, परिचर्चा औऱ खर्चा सब यहां होता है... और फिर ये आईना एक दिन एक ऐसी सूरत आपको दिखा देता है कि आप आईने से नफरत करने लगते हैं... लेकिन उस सूरत और सीरत से नहीं । फिर वक्त के साथ-साथ वो तस्वीर धुंधली होती जाती है... धुंधली होते होते उसका वजूद खत्म हो जाता है। न कोई सीख...न कोई सबक, हम मान लेते हैं माहौल ठीक है और एक दिन फिर से आपका ये भ्रम टूट जाता है ... आईना आपको एक नई सूरत दिखाता है, आप इस सूरत से और भी ज़्यादा नफरत करते हैं... रस्म अदायगी के तौर पर आप कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हैं, फिर दिल और पक्का कर उसकी भर्त्सना करते हैं, कुछ जुलूस ...कुछ बैठकें... कुछ दिशानिर्देश, जो कुछ दिन बाद फिर से दिशाहीन हो जाते हैं।

 राजधानी दिल्ली के पॉश वसंतकुंज इलाके में कांंगो के एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। वजह ऑटोरिक्शा में बैठने को लेकर हुआ विवाद।
 पुलिस के मुताबिक ये नस्लीय आधार पर हुआ हमला नहीं है, ये कोई Hate crime नहीं है, ऑटो में बैठने को लेकर झगड़ा हुआ जिसके बाद वीभत्स तरीके से इस युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना पर विश्व भर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। राजधानी दिल्ली में सभी अफ्रीकी देशों के राजदूत ने अपना विरोध दर्ज कराया। एक तरफ अफ्रीका दिवस का आयोजन और दूसरी तरफ इस तरह का दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम। विरोधस्वरुप अफ्रीकी देशों के राजदूतों ने इस आयोजन में शामिल न होने का निर्णय लिया, जिसे बाद में बहुत समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने वापस ले लिया।
वस्तुत: अपराध से ज़्यादा अपराध के पीछे की मानसिकता आपको सोचने पर विवश करती है।
इस घटना के कई पहलू हैं... आपराधिक, सामाजिक, कूटनीतिक, आर्थिक... और इन तमाम पहलुओं की अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
अखबारों में...न्यूज़ चैनल्स में इस खबर के करीब-करीब हर पहलू को खंगाल लिया गया है, लेकिन माहौल में एक वैचारिक अवरोध जस का तस बरकरार है।
आप prejudices और bias के आधार पर किसी को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते हैं। अगर कोई एक व्यक्ति किसी अपराध में संलिप्त पाया जाता है तो उस देश, शहर, समाज, धर्म, जाति या नस्ल के सभी लोगों को अपराधी करार नहीं दे सकते। हर व्यक्ति स्वयं अपने फैसलों के लिए उत्तरदायी होता है। यदि कोई अफ्रीकी नागरिक किसी अपराध में संलिप्त पाया गया है तो सभी अफ्रीकी नागरिक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आप सभी को संदेह के दायरे में नहीं रख सकते हैं। आप सिर्फ इस आधार पर सभी से भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते हैं।
ऐसे अपराध संकुचित सोच और आपराधिक प्रवृति  का ही नतीजा हो सकते हैं। लेकिन अपराधी ये भूल जाते हैं कि इसके कितने दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। और अगर इतनी समझ इतना विवेक उनमें पहले ही होता तो ऐसी नौबत शायद कभी नहीं आती।
आप अखबार में छपी रिपोर्ट के इस हिस्से को पढ़िए। इस तरह के अपराध का ये भी एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। लोगों से...समाज से ...व्यवस्था से आपका भरोसा उठने लगता है और एक लोकतांत्रिक प्रणाली में ये कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं है। आप सिहर जाते हैं जब आपको ऐसी भावनाओं से अवगत कराया जाता है लेकिन कहीं न कहीं इसके लिए आप भी जिम्मेदार हैं , क्योंकि जब आपको इसका हरसंभव विरोध करना चाहिए था उस वक्त आप बारिशों में भीगा वीकेंड मनाने में मशगूल थे। आपके पास तमाम व्यस्तताएं थीं लेकिन फिर आप इस सब के बारे में सोचते भी क्यों... इससे आपका क्या सरोकार। आप यहां जो करते हैं उसकी प्रतिक्रिया आपको जरूर मिलती है। हिंसक घटना की अहिंसक प्रतिक्रियाएं अमूमन नहीं होती, ये खुद को ही धोखा देने जैसी बात हुई।

अतिथि देवो भव: । आप करोड़ों-अरबों रुपए विज्ञापन पर फूंक दीजिए, लेकिन सालों की मेहनत से जो छवि आप बनाते हैं... अर्जित करते हैं, ऐसी घटनाएं एक पल में उस पर सवालिया निशान लगा देती है। सांप निकल जाने के बाद आप लकीर पीटते रहिए, लेकिन सार्थकता सही समय पर उठाए गए सही कदम की ही होती है। लोगों में भरोसे का कायम रहना जरूरी है, एक व्यवस्था में भरोसा रहना जरुरी है। लेकिन आप सिर्फ इस सोच के साथ नहीं चल सकते कि किसी अन्य देश के नागरिक को मिली सुरक्षा की गारंटी उस देश में आपके अपने नागरिक के अधिकारों की रक्षा समान है, ये कोई बदले की कार्रवाई नहीं है, ये किसी का अधिकार है तो आपका कर्तव्य भी। 
मैनें कहीं किसी अखबार में डैमेज कंट्रोल शब्द को भी छपा पाया। किसी भी समाज के लिए डैमेज कंट्रोल एक बहुत ही वाहियात अवधारणा है, पहली कोशिश उस तथाकथित 'डैमेज' को होने ही न देने की होनी चाहिए। लेकिन हम इंतज़ार करते हैं, हमें मुद्दों, मसलों और मामलों की गंभीरता से फर्क नहीं पड़ता है, हमें सिर्फ उन चीज़ों से फर्क पड़ता है जिनसे सिर्फ हमें फर्क पड़ता है। 
हर विचारधारा को आत्मसात कर लेना, हर व्यक्तित्व को स्वीकार कर लेना, हर सोच को साकार होने का अवसर देना, हर जीव को जीने का अधिकार देना...हमारे समाज में सहिष्णुता के असल मायने यही थे, पिछले काफी अरसे से सहूलियत के हिसाब से सहिष्णुता और असहिष्णुता का जमकर दुरुपयोग चला आ रहा है लेकिन किसी की जान जाने से ज़्यादा असहिष्णुता किसी समाज के लिए क्या हो सकती है। ये अक्षम्य है ...

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

ये भी दिल्ली है ...

                 

दिल्ली की बारिश और जलभराव...

जनता... बकौल अखबार और समाचार, राजधानी की सड़कों पर पानी जमा होने से परेशान है लेकिन इसी शहर का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पक्की सड़कें बेशक नहीं है लेकिन जलभराव की समस्या शायद साल भर यूंही बनी रहती है, बारिश के होने या ना होने से शायद यहां के हालात पर बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है।

पहली तस्वीर को देखिए... बिजली की तारों में उलझा-छिपा एक बोर्ड, अपनी फीकी पड़ती मटमाती लिखावट के साथ आपके पधारने का धन्यवाद का धन्यवाद कर रहा है।
धन्यवाद...जी हां... ये बोर्ड कुछ यही कह रहा है, लेकिन बारिश के मौसम में इस धन्यवाद के अगले ही कदम पर आपको क्या मिल जाए, आप सोच भी नहीं सकते। और यकीन मानिए आप ऐसा करना भी नहीं चाहेंगे।

ज़रा ध्यान से देखिए... तस्वीर में आप एक आदमी को हाथ में कुदाल लिए खड़ा देख सकते हैं।
ये भाई साहब पानी की निकासी का रास्ता खोज रहे थे। किसी महकमे के इंतज़ार में तो यहां के लोग सड़ांध भरे इस पानी में यूहीं सारा मौसम बैठे रहेंगे लेकिन बारिश की हर फुहार आपके लिए राहत नहीं परेशानी का सबब बनती जाएगी।

अगली तस्वीर में पानी से लबालब भरी गली में घुसने से शायद एक मिनी ट्रक को भी सोचना पड़ रहा है, गली में ठहरा हुआ पानी बारिश के पानी की तरह मिट्टी घुला हुआ गंदला सा नहीं, बल्कि नालियों के पानी और गाद से मिलकर काले रंग का बदबूदार घोल की तरह हो जाता है।

तीसरी तस्वीर में एक बाइक सवार पूरे अनुभव के साथ पानी से भरे रास्ते में धड़ल्ले से निकल गया लेकिन पैदल जाने वाले लोग... वो क्या करते होंगे। पैदल जाने वाले लोग दीवार का सहारा लेकर इन रास्तों को पार करते हैं। यहां से गुजरने वाले लोग किसी तरह व्यवस्था और बारिश को कोसते हुए निकल जाते हैं लेकिन यहां के बाशिंदे। यहां रोज़ाना सालों से रहने वाले लोग... क्या वो इसी ज़िंदगी के हक़दार हैं।

ऐसा कमोबेश इन लोगों के साथ हर साल हर बारिश होता होगा लेकिन इस समस्या का समाधान कब निकलेगा ये कोई नहीं जानता।  मौसम की पहली बारिश ही सिविक एजेंसियों की पोल खोल देती है लेकिन यहां ये हालात पहली से आखिरी बारिश तक बने रहते हैं... और शायद बिना बारिश के भी। हम लोग राजधानी की सड़कों पर एक-दो घंटे का जलभराव नहीं झेल पाते हैं और ये सड़ांध इन लोगों के जीवन का जैसे हिस्सा बन जाती है...एक-दो नहीं बल्कि पूरे 24 घंटे... ऐसा एक-दो दिन नहीं बल्कि सालों से चला आ रहा है और शिकायतें हर साल यूंही बह जाती है इसी तरह... लोग जैसे आदी हो चले हैं . . .

पार्टी बदल जाती है, नेता बदल जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं लेकिन कुछ है जो साल दर साल यूंही बदस्तूर जारी रहता है और वो है दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में लोगों का नारकीय हालात में जीवन। यहां रहने वाले लोगों को इन कॉलोनियों को नियमित करने का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है, लेकिन ज़मीनी तौर पर ऐसा होना अभी बहुत दूर की कौड़ी लगती है। साल 2008 में तत्कालीन शीला सरकार ने 1639 अनधिकृत कॉलोनियों में से 895 कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया था, लेकिन अभी तक एक भी कॉलोनी नियमित नहीं की जा सकी है। एक तरफ इन कॉलोनियों को नियमित करने वादा है तो दूसरी तरफ इस प्रक्रिया में शामिल तमाम व्यावहारिक दिक्कतें। लेकिन ये तमाम अड़चनें एक मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के सामने कोई वजूद नहीं रखती।

दिल्ली सरकार ने हाल ही में दिल्ली शहरी विकास एजेंसी (DUDA) बनाने की घोषणा की थी, जो दिल्ली में अलग-अलग सिविक एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने और विकास के कार्यों में एकरूपता लाने के साथ-साथ इन पर नज़र रखने का भी काम करेगी। दिल्ली कैबिनेट की बैठक में इस एजेंसी के गठन को औपचारिक मंजूरी दे दी गई है।

उम्मीद है ... अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले हज़ारों-लाखों लोगों की ज़िंदगी अगली बारिश तक ऐसी ना रहे।
सभी जगह तो संभव नहीं है लेकिन अगर कुछ इलाकों में भी लोगों को रोज़ाना के इस नारकीय जीवन से छुटकारा मिल सके तो शुरुआत अच्छी ही मानी जाएगी। वर्ना लोग तो आदी हो चुके हैं, मजबूरी की ऐसी ज़िंदगी के भी औऱ हर बारिश में बह जाने वाले वाले चुनावी वादों के भी। 

रविवार, 21 जून 2015

एक पत्रकार की मौत

पत्रकार... व्यवस्था/तंत्र का एक बहुत जरूरी हिस्सा होते हैंलेकिन ये जरूरी नहीं कि व्यवस्था/तंत्र भी उन्हें उतना ही जरूरी समझे। जरूरी होना और जरूरत होना, ये दो अलग-अलग भाव हैं ...
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वैसे बात सिर्फ पत्रकारिता की नहीं है,  जिन लोगों में ये हुनर होता हैवो कहीं भी किसी भी व्यवस्था में अपने आप को जरूरी साबित कर लेते हैं। ऐसे मामलों में कई अपवाद भी देखने को मिलते हैंकुछ लोग अपनी प्रतिभा के बलबूते पर अपनी जगह बनाते हैं तो कुछ लोगों का हुनर खुद के महत्व को मनवाना और अपनी काबिलियत को स्थापित कर लेना भी होता है।

पत्रकार जगेन्द्र का इन सब बातों से सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं हैलेकिन एक पत्रकार होने के नाते वो भी स्वयं इस व्यवस्था/तंत्र का ही हिस्सा रहे। उनकी दर्दनाक मौत आम जनता और स्वयं पत्रकार बिरादरी के सामने कई अहम सवाल छोड़ गई है। आखिर उनकी मौत का सच क्या है, एक सभ्य समाज में इस तरह का अमानवीय कृत्यअक्षम्य है। क्यों किया गया, किस लिए किया गयाकैसे अंजाम दिया गया... किसके लिए किया गया... सवाल तमाम हैंलेकिन दरिंदगी की तमाम हदें पार करके ऐसे अपराध को अंजाम देने वाले लोग यकीनन इंसान तो नहीं हो सकते। कानून के साथ-साथ ये लोग इंसानियत के गुनहगार है।
कानून पर भरोसा हमारी सोचदिनचर्यापरवरिश और पेशे का हिस्सा है। भरोसा है जगेन्द्र को न्याय जरूर मिलेगा ठीक है आप जांच कराईए... तसल्लीबख्श तरीके से जांच कराईए,  आप पूरी तरह आश्वस्त हो जाइए कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष। पूरे होशोहवास में कोई नहीं चाहता कि किसी निर्दोष को सज़ा मिले लेकिन जिसने जुर्म किया है सज़ा उसे कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिएऐसी सज़ा जो एक नज़ीर साबित हो। 
जगेन्द्र सिर्फ एक पत्रकार थेएक मामूली पत्रकार ... वो भी शहर और सत्ता से दूर ... पहले तो वो खुद एक छोटी से खबर बन कर रह गए। ऐसे में एक छोटी सी खबर जगेन्द्र को जरूरत वाले भाव का पत्रकार जगह-जगह खोजता रहा... अखबारों में , टीवी पर, खबरों में , चर्चा में, लोगों में ...चेहरों में ... कहीं से खबर मिले... क्या वाकई एक पत्रकार को जिंदा जलाने की खबर में सच्चाई है, खबरों की जिंदगी जीने वाला पत्रकार मौत की इस खबर पर शायद भरोसा ही नहीं करना चाहता था, आखिर करता भी तो कैसे...
जगेन्द्र की मौत का सच जनता के सामने आना भी उतना ही जरूरी है जितना पत्रकार बिरादरी के लिए, जितना जरूरी वो कानून व्यवस्था के लिए है, उतना ही जरूरी इस व्यवस्था में आस्था और विश्वास के लिए है...
जाने से पहले जगेन्द्र कह रहे थे... मुझे पीट लेते, ज़िंदा क्यों जलाया जगेन्द्र अब जिंदा नहीं है... लेकिन उनका ये सवाल ज़िंदा है और जब तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलता ये सवाल यूहीं ज़िंदा रहेगा।



(ये सवाल उन सभी लोगों के लिए भी है, जो शरीर से ज़िंदा हैं लेकिन आत्मा, ईमान, आत्मसम्मान और सोच जैसी तमाम कसौटियों के मुताबिक एक अर्से से मृतप्राय हैं, जो जरूरत से बढ़कर शायद जरूरी... बेहद जरूरी हो गए हैं)

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

पेशेवर... एहसान-फरामोश

हर हर्फ़ चुप है
क्यूँ क़लम चुप है
नज़रें बेबस नहीं 
बेशर्म हैं...
और चुप हैं
पर्दे के पीछे विकृत से
गुनहगार हैं चेहरे 
ख़ामोश हैं
ये किन लोगों से इंसाफ़ चाहिए तुम्हें
ये कमज़र्फ हैं 
पेशे से एहसानफरामोश हैं ...

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

My Delhi Manifesto- क्या चाहती है दिल्ली !!!














" दिल्ली – सपनों का शहर ... खुशियों का शहर ... उम्मीदों का शहर ... आशाओं का शहर। कुछ यही सपने लिए जाने कितने लोग दिल्ली आते हैं ...और जाने कितने यहां रहते हैं। "

बात कॉलेज के दिनों की है ... जब ये चंद लाइनें अपनी एक डॉक्यूमेंट्री के लिए लिखी थी।

सपने अब भी वैसे ही हैं, खुशियां अभी भी उतनी ही प्यारी हैं, उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं... आशाएं अब भी हैं... और इन सब के बीच अपनी दिल्ली भी कितनी बदल चुकी है। दिल्ली की जरुरतें कितनी बदल चुकी हैं... दिल्ली की आबादी कितनी बढ़ चुकी है। लेकिन क्या बढ़ती आबादी, फैलती दिल्ली और बदलती दिल्ली ... जरुरतों और विकास के बीच किसी भी तरह का सामंजस्य हम स्थापित कर पाए हैं, बड़ा सवाल ये है।
सवाल किसी सरकार या पार्टी विशेष का नहीं है।
सवाल दिल्ली का है...दिल्ली की आबादी का है...दिल्ली की जरुरतों का है...दिल्ली के विकास का है। सवाल दिल्ली के लोगों का है।
अपनी उम्र के हिसाब से दिल्ली के बदलाव का करीब-करीब तीन दशकों तक का दौर अभी तक मैने भी जिया है। मुद्दे कमोबेश वही रहे हैं ...बस वक्त वक्त पर लोगों की प्राथमिकता बदलती रहती है।

अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली
दिल्ली देश की राजधानी है। अगर इसी राजधानी के लोग खुद को सुरक्षित महसूस ना करें तो हालात वाकई चिंताजनक हैं। उस पर महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ते अपराध...छीनाझपटी...छेड़छाड़ औऱ बलात्कार ... दिल्ली पुलिस केन्द्र के अधीन हो या राज्य के, दिल्लीवालों की मांग अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली की है जो उनका अधिकार है।
महंगाई – जी हां ... दिल्ली महंगाई से मुक्ति चाहती है।
देश के किसी भी हिस्से में कहीं भी कुछ भी होता है , उसका असर सीधा राजधानी दिल्ली के बाज़ारों ... घरों ... रसोईघरों पर पड़ता है। प्याज़ रसोईघरों से निकल कर चुनावी मुद्दा बन जाती है। और बात सिर्फ प्याज़ की नहीं है महंगाई की मार से आम आदमी सालों से बेहाल है । आखिर राजधानी में रहने की कीमत लोग चुकाएं ये कहां तक जायज़ है। जीना महंगा और लगातार महंगा होता जा रहा है।
बिजली-पानी का अधिकार 
 क्या निजीकरण हर समस्या का समाधान है। सवाल भी आपके सामने है और जवाब भी।  दिल्ली जैसे शहर को 24 घंटे बिजली- पानी की दरकार है। कहीं बढ़े बिल तो कहीं बिजली नहीं ... तो कहीं पानी की बूंद तक नहीं। मानो शहर का हर हिस्सा एक अलग जिंदगी जी रहा है।
विकास में सामंजस्य  
 राजधानी दिल्ली विकास चाहती है लेकिन विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है। आप एक फ्लाईओवर बनाते हैं लेकिन जहां वो फ्लाईओवर खत्म होता है वहां सड़क इतनी संकरी हो जाती है कि आपका फ्लाईओवर जाम का समाधान नहीं जाम का सबब बनता है।
शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से औऱ शहर के बढ़ते विस्तार के साथ साथ सुविधाओं का सामंजस्य बहुत जरुरी हो जाता है। 
विकास की समग्रता 
 विकास आबादी के हर हिस्से तक पहुंचे और शहर के हर कोने तक , ये भी सुनिश्चित करना होगा। एक बारिश में ही सरकारी एजेंसियों के दावों की पोल खुल जाती है। सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं, अंडरपास बसों को अपने आगोश में ले लेते हैं । जगह-जगह सड़कों पर गड्ढे ...

 हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं।

प्रदूषण से निवारण 
 प्रदूषण से छुटकारा पाने के तमाम उपाय जैसे नाकाफी साबित होते जा रहे हैं। सड़कों पर वाहनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, रात के वक्त राजधानी से गुजरने वाले भारी वाहन हवा को इतना ज़हरीला बना देते हैं कि दिन भर आपका दम घुटा सा रहता है।
बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा 
शहर की आबादी के हिसाब से लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए शहर को एक इंटीग्रेडेट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है। जो शहर के हर हिस्से तक पहुंचना आसान बनाए ... सुरक्षित बनाए और सस्ता भी। जरुरत मेट्रो की भी है तो बसों की भी। उपयोगी ग्रामीण सेवा भी है, जरुरत सिर्फ समुचित संचालन की है।
बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात 
दिल्ली को एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम की जरुरत है जो शहर में दौड़ने वाले ट्रैफिक पर काबू रखे साथ ही जगह-जगह लगने वाले जाम पर भी जो लोगों के वक्त के साथ साथ उनकी जेब पर भी भारी पड़ रहा है। अक्सर वीआईपी मूवमेंट भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। ध्यान इस बात का रखा जाना चाहिए कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें बजाय इसके कि ज़ोर उनका चालान काटने पर दिया जाए। 
शहर की हरियाली बरकरार रखनी होगी
हमें ध्यान रखना होगा कि विकास पर्यावरण की कीमत पर ना हो । शहर का कंक्रीट शहर की हरियाली को ना निगल जाए। दिल्ली का फेफड़ा माना जाने वाला रिज इलाका धीरे धीरे उपेक्षा का शिकार हो रहा है, अतिक्रमण दिल्ली की हरियाली को निगल रहा है। जो पेड़ सालों से नहीं गिरे सरकारी विभागों की लापरवाही की भेंट ना चढ़ें। दिल्ली अपने बाशिंदों को स्वस्थ रखे, इसके लिए जरुरी है दिल्ली खुद तंदरुस्त रहे, हरी- भरी रहे। साथ ही लगातार गिर रहे जलस्तर पर भी नज़र रखी जाए और इसके लिए जो नियम कानून बनाए गए हैं उनका सख्ती से पालन किया जाए।
साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखने की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों की है वो अपना काम ठीक से करें, दिल्ली ये गारंटी मांगती है। शहर गंदा ना दिखे, दिल्ली इसकी गारंटी भी मांगती है। दिल्ली का एक हिस्सा वो भी है जहां आप कूड़े के पहाड़ देखते है, जहां आसपास के निवासी और वहां से गुजरने वाले एक अजीब सी बू के आदी हो चले हैं। डंपिंग ग्राउंड्स और लैंड-फिल साइट्स शहर का दाग ना बन जाएं, हमें शहर चाहिए... कूड़ाघर नहीं।
अवैध कॉलोनियों का नियमन
राजधानी में जिस वक्त जगह-जगह अवैध कॉलोनियां कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं तब शायद अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि आज वो दिल्ली की इतनी बड़ी आबादी का पता बन जाएंगी। पीने के लिए पानी नहीं, कई जगह बिजली नहीं, ना सड़कें ना सीवर, विकास की वास्तव में जरुरत इन कॉलोनियों को है जहां विकास चाहिए , परस्पर समन्वय के साथ विकास। सिर्फ दावों और वादों से काम नहीं चलेगा, काम कर के दिखाना होगा क्योंकि आपके चाहते और ना चाहते हुए भी अब ये हमारे शहर का ही हिस्सा है।
यमुना को बचाना होगा 
दिल्लीवाले अपनी धरोहर यमुना को लेकर साल में कुछ ही दिन जागते हैं लेकिन हज़ारों करोड़ों रुपए फूंकने के बाद भी यमुना की हालत बद से बदतर ही हुई है। यमुना में गिरने वाले नाले तमाम सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। इससे पहले कि ये शहर अपनी नदी को हमेशा के लिए खो दे ... जरुरी कदम उठाने होंगे, सरकार को भी और इस शहर को भी।
सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर में कई जगह अभी भी सीवरेज सिस्टम पहुंचा नहीं है कई जगह अंतिम सांसे ले रहा है... और इसका नतीज़ा लोग हर साल भुगतते हैं। बदलाव और सुधार ...जरुरत यहां भी है।
भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
सरकार के लाख दावों के बावजूद राजधानी अब तक भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो पाई है। भ्रष्टाचार हमेशा से ही जनसाधारण का पसंदीदा दर्द और दर्दनिवारक मुद्दा रहा है (भ्रष्टाचार को कोस-कोसकर लोग शांत हो जाते हैं। भ्रष्टाचार से ना सिर्फ आम आदमी परेशान है बल्कि सरकारी खजाने को भी चपत लग रही है। दिल्ली सरकार के हर विभाग को भ्रष्टाचार मुक्त देखना हर दिल्लीवासी का सपना है।
औऱ अब सबसे जरुरी बात जोकि दिल्ली और दिल्ली के लोगों के लिए सबसे जरुरी है
चुनावी वादों की सच्चाई
जी हां ... चुनाव के वक्त नेता वादे तो कर जाते हैं लेकिन उन वादों की हकीकत क्या है ये अगले चुनाव आने पर ही पता चलता है जब जनता के सामने उन वादों पर हो रहे दावों की कलई खुलती है।

दिल्ली शिक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सुरक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सूचना का अधिकार चाहती है
दिल्ली ज्यादा कुछ नहीं चाहती है ... बस 
विकास का अधिकार चाहती है ... 
दिल्ली...
जीने का अधिकार चाहती है 
यही सब कुछ है जो अपनी गति से धीरे-धीरे हो गया होता तो शायद कुछ ऐसे नए मुद्दे आ गए होते जो वक्त के हिसाब से मुनासिब रहते... लेकिन मुद्दों का ये बैकलॉग सालों से है ... औऱ दिलवालों की ये दिल्ली इस बैकलॉग को कब तक बर्दाश्त कर पाती है , ये देखना होगा। ये दिल्ली अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी बखूबी जानती है , इंतज़ार कीजिए ...नतीजा आप खुद देखेंगे ... फर्क आप खुद महसूस करेंगे। 

दिल्ली की हालत फिलहाल कैसी है ये आपके सामने है ... हमें ऐसी दिल्ली चाहिए जहां विकास है तो विरासत भी । गूगल से साभार ली गई ये तस्वीर शायद यही कुछ बयां करती है। 
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