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मंगलवार, 31 मई 2016

कौन है असली ' विलेन '

हम लोग दिल्ली में रहते हैं, देश की राजधानी दिल्ली में। साल भर हम तरह-तरह की वर्षगांठ और खुशफहमियां मनाते हैं। देश की राजधानी, देश का आईना भी है लिहाज़ा देश भर पर चर्चा, परिचर्चा औऱ खर्चा सब यहां होता है... और फिर ये आईना एक दिन एक ऐसी सूरत आपको दिखा देता है कि आप आईने से नफरत करने लगते हैं... लेकिन उस सूरत और सीरत से नहीं । फिर वक्त के साथ-साथ वो तस्वीर धुंधली होती जाती है... धुंधली होते होते उसका वजूद खत्म हो जाता है। न कोई सीख...न कोई सबक, हम मान लेते हैं माहौल ठीक है और एक दिन फिर से आपका ये भ्रम टूट जाता है ... आईना आपको एक नई सूरत दिखाता है, आप इस सूरत से और भी ज़्यादा नफरत करते हैं... रस्म अदायगी के तौर पर आप कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हैं, फिर दिल और पक्का कर उसकी भर्त्सना करते हैं, कुछ जुलूस ...कुछ बैठकें... कुछ दिशानिर्देश, जो कुछ दिन बाद फिर से दिशाहीन हो जाते हैं।

 राजधानी दिल्ली के पॉश वसंतकुंज इलाके में कांंगो के एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। वजह ऑटोरिक्शा में बैठने को लेकर हुआ विवाद।
 पुलिस के मुताबिक ये नस्लीय आधार पर हुआ हमला नहीं है, ये कोई Hate crime नहीं है, ऑटो में बैठने को लेकर झगड़ा हुआ जिसके बाद वीभत्स तरीके से इस युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना पर विश्व भर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। राजधानी दिल्ली में सभी अफ्रीकी देशों के राजदूत ने अपना विरोध दर्ज कराया। एक तरफ अफ्रीका दिवस का आयोजन और दूसरी तरफ इस तरह का दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम। विरोधस्वरुप अफ्रीकी देशों के राजदूतों ने इस आयोजन में शामिल न होने का निर्णय लिया, जिसे बाद में बहुत समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने वापस ले लिया।
वस्तुत: अपराध से ज़्यादा अपराध के पीछे की मानसिकता आपको सोचने पर विवश करती है।
इस घटना के कई पहलू हैं... आपराधिक, सामाजिक, कूटनीतिक, आर्थिक... और इन तमाम पहलुओं की अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
अखबारों में...न्यूज़ चैनल्स में इस खबर के करीब-करीब हर पहलू को खंगाल लिया गया है, लेकिन माहौल में एक वैचारिक अवरोध जस का तस बरकरार है।
आप prejudices और bias के आधार पर किसी को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते हैं। अगर कोई एक व्यक्ति किसी अपराध में संलिप्त पाया जाता है तो उस देश, शहर, समाज, धर्म, जाति या नस्ल के सभी लोगों को अपराधी करार नहीं दे सकते। हर व्यक्ति स्वयं अपने फैसलों के लिए उत्तरदायी होता है। यदि कोई अफ्रीकी नागरिक किसी अपराध में संलिप्त पाया गया है तो सभी अफ्रीकी नागरिक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आप सभी को संदेह के दायरे में नहीं रख सकते हैं। आप सिर्फ इस आधार पर सभी से भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते हैं।
ऐसे अपराध संकुचित सोच और आपराधिक प्रवृति  का ही नतीजा हो सकते हैं। लेकिन अपराधी ये भूल जाते हैं कि इसके कितने दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। और अगर इतनी समझ इतना विवेक उनमें पहले ही होता तो ऐसी नौबत शायद कभी नहीं आती।
आप अखबार में छपी रिपोर्ट के इस हिस्से को पढ़िए। इस तरह के अपराध का ये भी एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। लोगों से...समाज से ...व्यवस्था से आपका भरोसा उठने लगता है और एक लोकतांत्रिक प्रणाली में ये कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं है। आप सिहर जाते हैं जब आपको ऐसी भावनाओं से अवगत कराया जाता है लेकिन कहीं न कहीं इसके लिए आप भी जिम्मेदार हैं , क्योंकि जब आपको इसका हरसंभव विरोध करना चाहिए था उस वक्त आप बारिशों में भीगा वीकेंड मनाने में मशगूल थे। आपके पास तमाम व्यस्तताएं थीं लेकिन फिर आप इस सब के बारे में सोचते भी क्यों... इससे आपका क्या सरोकार। आप यहां जो करते हैं उसकी प्रतिक्रिया आपको जरूर मिलती है। हिंसक घटना की अहिंसक प्रतिक्रियाएं अमूमन नहीं होती, ये खुद को ही धोखा देने जैसी बात हुई।

अतिथि देवो भव: । आप करोड़ों-अरबों रुपए विज्ञापन पर फूंक दीजिए, लेकिन सालों की मेहनत से जो छवि आप बनाते हैं... अर्जित करते हैं, ऐसी घटनाएं एक पल में उस पर सवालिया निशान लगा देती है। सांप निकल जाने के बाद आप लकीर पीटते रहिए, लेकिन सार्थकता सही समय पर उठाए गए सही कदम की ही होती है। लोगों में भरोसे का कायम रहना जरूरी है, एक व्यवस्था में भरोसा रहना जरुरी है। लेकिन आप सिर्फ इस सोच के साथ नहीं चल सकते कि किसी अन्य देश के नागरिक को मिली सुरक्षा की गारंटी उस देश में आपके अपने नागरिक के अधिकारों की रक्षा समान है, ये कोई बदले की कार्रवाई नहीं है, ये किसी का अधिकार है तो आपका कर्तव्य भी। 
मैनें कहीं किसी अखबार में डैमेज कंट्रोल शब्द को भी छपा पाया। किसी भी समाज के लिए डैमेज कंट्रोल एक बहुत ही वाहियात अवधारणा है, पहली कोशिश उस तथाकथित 'डैमेज' को होने ही न देने की होनी चाहिए। लेकिन हम इंतज़ार करते हैं, हमें मुद्दों, मसलों और मामलों की गंभीरता से फर्क नहीं पड़ता है, हमें सिर्फ उन चीज़ों से फर्क पड़ता है जिनसे सिर्फ हमें फर्क पड़ता है। 
हर विचारधारा को आत्मसात कर लेना, हर व्यक्तित्व को स्वीकार कर लेना, हर सोच को साकार होने का अवसर देना, हर जीव को जीने का अधिकार देना...हमारे समाज में सहिष्णुता के असल मायने यही थे, पिछले काफी अरसे से सहूलियत के हिसाब से सहिष्णुता और असहिष्णुता का जमकर दुरुपयोग चला आ रहा है लेकिन किसी की जान जाने से ज़्यादा असहिष्णुता किसी समाज के लिए क्या हो सकती है। ये अक्षम्य है ...

गुरुवार, 3 मार्च 2016

शहर ( क्यों ) जब शमशान बनते हैं . . .

मुद्दों की आड़ में
गई इंसानियत भाड़ में
हैवानियत के ठेके पर
जब हम ताज़ा ताज़ा हैवान बनते हैं...
बहुत कुछ गवां देती है ज़िंदगी
चंद मकसदों के लिए
शहर जब शमशान बनते हैं...
कर्फ्यू की खामोशी में
दस दिन की बासी रोटी में
मांगें हुए चंद निवालों में
किस तरह दिन सालों से निकलते हैं
ऑर्डर की राह तकती आंखों की बेबसी
भीड़ के आगे क्यूं बेज़ुबान बनते हैं
रिश्तों के कफन लिए
चंद कमज़र्फों की कमान में
शहर जब शमशान बनते हैं...
खाली पड़े बंद मकानों में
लुट चुकी जली दुकानों में
लाशों की राख है बिखरी हुई
मुर्दा मोहल्लों... अरमानों में
रंगों में
निशानों में
फर्क मिट जाए 
जब इंसानों में
हदों से भी आगे
हम बेशर्म अनजान बनते है
चंद मतलबों के लिए
शहर जब शमशान बनते हैं
अपनों के ही हाथों
अपनों की लाशों के मचान बनते हैं
शहर ... जब शमशान बनते हैं...

बुधवार, 8 जुलाई 2015

एक दिन की ज़िंदगी ...



सिर्फ एक दिन की ज़िंदगी...

एक दिन की ज़िंदगी में ही उसने ज़िंदगी की हकीकत समझ ली।

आंखें खोलने से पहले ही उसे क्या-क्या नहीं देखना पड़ा।

उसे ज़िंदा रखने की कोशिश में मां-बाप को पल-पल मरते देखा।

उसे ज़िंदा रखने की कीमत लगी, जो उसके मां-बाप नहीं दे पाए।

मालूम हुआ एक अस्पताल ने नवजात की ज़िंदगी की एक दिन की कीमत लगाई 10,000 रुपए। अस्पताल के लिए शायद कोई बहुत बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन उस मासूम की ज़िंदगी इस रकम के सामने बहुत मामूली थी। मां ने महीनों उसे कोख में रखा, पिता ने भी उतना ही इंतज़ार किया...
इंतज़ार के उन लम्हों में सांसों के हिसाब से उन्होंने अपने आने वाले बच्चे के लिए सपने भी देखे, लेकिन कोरे सपनों से क्या होता है... सपने नींद में ही अच्छे लगते है, जागती आंखों के सपनों के लिए इस दुनिया में पैसों की जरूरत होती है।
उनकी जेब में पैसे नहीं थे लेकिन गोद में मन्नतों से मांगा हुआ मासूम  ज़िंदगी की बाट जोह रहा था, वो जो उनके सहारे इस दुनिया में आया था... अपनी औलाद को अपनी आंखों के सामने वो मरता हुआ कैसे देखते।
लेकिन उस निजी अस्पताल के लोग भी आखिर इंसान थे, पत्थर-दिल नहीं...
बेशक पैसा देने में असमर्थ इस परिवार के प्री-मैच्योर बच्चे को ज़िंदा रखने की उन्होंने कीमत लगाई हो...
बेशक एक दिन के उस नवजात की ज़िंदगी और उसके बिलखते मां-बाप के आंसुओं के आगे उनका दिल नहीं पसीजा...
लेकिन अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर हद दर्जे तक आशावादी और भाग्यवादी निकले। पैसे नहीं हैं पास में तो क्या हुआ, ज़िंदा रखने की कीमत नहीं चुका सकते तो क्या हुआ, उन्होंने उसे ज़िंदा रखने की कोशिशों में कोई कमी नहीं रखी, एक अदद एंबुलेंस को बुला कर उन्होंने उस नवजात को परिवार के साथ रवाना कर दिया, दिल्ली के अस्पतालों की खाक छानने के लिए। उन्हें आशा थी कि ये बच्चा अपने भाग्य के सहारे जि़ंदा रहेगा।
प्री-मैच्योर बच्चा भाग्य की इसी डोर के सहारे फिर दिल्ली के जाने-माने अस्पतालों के चक्कर काटने लगा। सबसे पहले उसे कलावती अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके भाग्य में इलाज होना नहीं लिखा था, लिहाजा वहां उसका इलाज नहीं हुआ। इसके बाद कैट्स एंबुलेंस उस नवजात को लेकर आरएमएल अस्पताल पहुंची। लेकिन यहां भी इलाज उसके नसीब में नहीं था। इलाज के नाम पर यहां भी निराशा हाथ लगी, एक दिन की ज़िंदगी पूरी कोशिश कर रही थी... एक मुकम्मल ज़िंदगी हो जाने के लिए।
आरएमएल के बाद एंबुलेंस दिल्ली की भीड़भाड़ को चीरती हुई एलएनजेपी अस्पताल पहुंची, पहले यहां भी इलाज के नाम पर इंतज़ार मिला और ये इंतज़ार फिर लंबा होता गया... और एक कभी ना खत्म होने वाले इंतज़ार में बदल गया।
एक दिन की ज़िदगी अपने हिस्से की ज़िंदगी जी चुकी थी। राजधानी के अस्पताल उसे इस दुनिया में नहीं रोक पाए। एक अस्पताल ने उसकी जिंदगी की कीमत हैसियत से ज़्यादा लगा दी। तो दूसरे अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते वो एक ' मैटर ' बन गया, जिसकी जांच अस्पताल प्रशासन अब कर रहा है और पता लगते ही हमें बता दिया जाएगा। बच्चे को शायद सॉरी कह दिया जाएगा, क्योंकि अब अस्पताल इस मैटर को उसे समझा नहीं पाएगा।
एक दिन की ज़िंदगी के अपने आखिरी पड़ाव तक जाते -जाते नवजात एक ' पेशेंट ' बन चुका था, और वो गलत गेट पर इलाज का इंतज़ार कर रहा था, जहां इलाज के इंतज़ार में उसके हिस्से की सांसें खत्म होते-होते उसका साथ छोड़ गईं...
एक दिन की ज़िंदगी ...जि़ंदगी को कई सबक सिखा गई। पहले दो अस्पताल जहां उस नवजात को ले जाया गया वो केंद्र सरकार के अंतर्गत आते हैं, फिर उस नवजात ने जहां आखिरी सांस ली...वो अस्पताल दिल्ली सरकार के अधीन है।
ये वैसे तो सार्वजनिक जानकारी का हिस्सा है...
लेकिन इलाज के लिए जाते समय कौन ये सोचता है कि कौन सा अस्पताल किस सरकार के अंतर्गत आता है।
पर यकीन मानिए ये एक बहुत जरूरी तथ्य है जो आज मुझे टेलीविज़न के माध्यम से पता चला।
मगर अफसोस ये जानकारी उस नवजात के पास नहीं थी... 

रविवार, 21 जून 2015

एक पत्रकार की मौत

पत्रकार... व्यवस्था/तंत्र का एक बहुत जरूरी हिस्सा होते हैंलेकिन ये जरूरी नहीं कि व्यवस्था/तंत्र भी उन्हें उतना ही जरूरी समझे। जरूरी होना और जरूरत होना, ये दो अलग-अलग भाव हैं ...
image ctsy-google

वैसे बात सिर्फ पत्रकारिता की नहीं है,  जिन लोगों में ये हुनर होता हैवो कहीं भी किसी भी व्यवस्था में अपने आप को जरूरी साबित कर लेते हैं। ऐसे मामलों में कई अपवाद भी देखने को मिलते हैंकुछ लोग अपनी प्रतिभा के बलबूते पर अपनी जगह बनाते हैं तो कुछ लोगों का हुनर खुद के महत्व को मनवाना और अपनी काबिलियत को स्थापित कर लेना भी होता है।

पत्रकार जगेन्द्र का इन सब बातों से सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं हैलेकिन एक पत्रकार होने के नाते वो भी स्वयं इस व्यवस्था/तंत्र का ही हिस्सा रहे। उनकी दर्दनाक मौत आम जनता और स्वयं पत्रकार बिरादरी के सामने कई अहम सवाल छोड़ गई है। आखिर उनकी मौत का सच क्या है, एक सभ्य समाज में इस तरह का अमानवीय कृत्यअक्षम्य है। क्यों किया गया, किस लिए किया गयाकैसे अंजाम दिया गया... किसके लिए किया गया... सवाल तमाम हैंलेकिन दरिंदगी की तमाम हदें पार करके ऐसे अपराध को अंजाम देने वाले लोग यकीनन इंसान तो नहीं हो सकते। कानून के साथ-साथ ये लोग इंसानियत के गुनहगार है।
कानून पर भरोसा हमारी सोचदिनचर्यापरवरिश और पेशे का हिस्सा है। भरोसा है जगेन्द्र को न्याय जरूर मिलेगा ठीक है आप जांच कराईए... तसल्लीबख्श तरीके से जांच कराईए,  आप पूरी तरह आश्वस्त हो जाइए कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष। पूरे होशोहवास में कोई नहीं चाहता कि किसी निर्दोष को सज़ा मिले लेकिन जिसने जुर्म किया है सज़ा उसे कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिएऐसी सज़ा जो एक नज़ीर साबित हो। 
जगेन्द्र सिर्फ एक पत्रकार थेएक मामूली पत्रकार ... वो भी शहर और सत्ता से दूर ... पहले तो वो खुद एक छोटी से खबर बन कर रह गए। ऐसे में एक छोटी सी खबर जगेन्द्र को जरूरत वाले भाव का पत्रकार जगह-जगह खोजता रहा... अखबारों में , टीवी पर, खबरों में , चर्चा में, लोगों में ...चेहरों में ... कहीं से खबर मिले... क्या वाकई एक पत्रकार को जिंदा जलाने की खबर में सच्चाई है, खबरों की जिंदगी जीने वाला पत्रकार मौत की इस खबर पर शायद भरोसा ही नहीं करना चाहता था, आखिर करता भी तो कैसे...
जगेन्द्र की मौत का सच जनता के सामने आना भी उतना ही जरूरी है जितना पत्रकार बिरादरी के लिए, जितना जरूरी वो कानून व्यवस्था के लिए है, उतना ही जरूरी इस व्यवस्था में आस्था और विश्वास के लिए है...
जाने से पहले जगेन्द्र कह रहे थे... मुझे पीट लेते, ज़िंदा क्यों जलाया जगेन्द्र अब जिंदा नहीं है... लेकिन उनका ये सवाल ज़िंदा है और जब तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलता ये सवाल यूहीं ज़िंदा रहेगा।



(ये सवाल उन सभी लोगों के लिए भी है, जो शरीर से ज़िंदा हैं लेकिन आत्मा, ईमान, आत्मसम्मान और सोच जैसी तमाम कसौटियों के मुताबिक एक अर्से से मृतप्राय हैं, जो जरूरत से बढ़कर शायद जरूरी... बेहद जरूरी हो गए हैं)

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

अलविदा नन्हें फरिश्तों ...



सितारे भी रोए होंगे सारी रात...
दिन भर सूरज भी सिसकता रहा...
तारीख भी कोसती रही खुद को...
खुदा ने भी शायद...
इंसान बनाने से तौबा कर ली होगी...



' उन फरिश्तों की याद में जो सितारे बन गए '

क्या दर्द को लिखा जा सकता है... 
क्या आंसुओं को पढ़ा जा सकता है ... 
क्या आंसुओं की स्याही किसी के दर्द को लफ्ज़ दर लफ्ज़ कागज़ पर उतार सकती है...

जवाब मुझे भी नहीं सूझ रहा ... लेकिन जो हुआ वो दर्द से भी कहीं आगे की खौफनाक हकीकत बन गया ... 

जवाब नहीं हैं... सिर्फ सवाल हैं...




ऐसे कोई करता है क्या, छोटे बच्चों को कोई मारता है क्या

शब्द अपाहिज हैं... दर्द बहुत ज़्यादा

दिन भर तमाम टीवी चैनलों पर एक पिता का दर्द... देखता रहा, सुनता रहा, महसूस करता रहा। रूह कांप गई जब इस खौफनाक, दर्दनाक मंजर को टीवी स्क्रीन पर देखा... बार बार देखा।
ये दर्द... ये मातम सिर्फ एक परिवार का नहीं... सिर्फ उन तमाम परिवारों का नहीं जो ... जो...
एक... दो... तीन या चार नहीं... ये गिनती सौ के पार भी नहीं रुकी...
ये मातम सिर्फ पेशावर का नहीं है... ये मातम सिर्फ पाकिस्तान का नहीं है...
इंसानियत, धर्म , मजहब... पड़ोसी मुल्क, एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अमेरिका, रूस ... ये मातम... ये दर्द सबका है...
बच्चे तो खुदा की नेमत होते हैं, भगवान का रूप होते हैं... फिर क्यों ...

याद नहीं पहली बार कब पढ़ा था...

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए

... एक रोते हुए बच्चे को भी सुना, उसके ज़हन में अब बदला है, वो आतंकियों की नस्लें तबाह करने की बात कर रहा है। क्या देखा होगा उस मासूम ने... क्या कुछ नहीं सहा होगा... आखिर दरिंदगी का वो मंजर ... कैसे भूल पाएंगे ... वो बच्चे ... जिन्होंने अपने साथियों को ... मुर्दा जिस्मों में तब्दील होते हुए देखा। 
वो... जिनकी चहक से स्कूल गुलज़ार रहा करता था... गोलियों के शोर में उसी स्कूल में उनकी चीखें ... उनकी आवाज़ें ... खामोश हो गईं। 

दहशत... दर्द... खून... ज़ख्म... तकलीफ... खौफ............................................मौत, इन मासूमों का क्या हाल हुआ होगा , ये दुनिया की कोई ज़ुबां बयां नहीं कर सकती।

एक छोटा मासूम बच्चा... जिसे शायद इल्म भी नहीं होगा कि असल में क्या हुआ है एक सांस में हमले के बारे में बताता चला गया। बच्चे जिन्हें अंकल कह रहे थे... वो अंकल आतंकी थे, मासूम इससे भी अनजान थे।
आतंक के कई चेहरे इंसानियत के सामने बपर्दा हुए हैं, यकीन मानिए हर चेहरा और घिनौना ही साबित हुआ है... लेकिन... मासूम, निहत्थे बच्चों को निशाना बनाना ...हैवानियत भी क्या इतना गिर सकती है। क्या ऊपर से नीचे तक उन हैवानों में एक भी इंसान नहीं था, क्या उनके घरों में बच्चे नहीं थे... क्या उनको अपने बच्चों तक का ख्याल नहीं आया... मासूम बच्चों पर गोलियां बरसाते हुए क्या उनको अपने बच्चों के चेहरे याद नहीं आए होंगे।

वो माएं... जिन्होंने अपने अरमानों से पाले बच्चों को रोज़ की तरह स्कूल यूनिफॉर्म में स्कूल भेजा, वो स्कूल यूनिफॉर्म... कफन बन गई... उन माओं के सवालों का जवाब कौन देगा। क्या कोई भी जवाब उनकी औलाद की जगह ले सकता है। 
रोज़ की तरह ही सुबह उठना हुआ होगा... सुबह घर में धमाचौकड़ी मचाते... आधे-अधूरे नाश्ते को मुंह में ठूंसते... मां-बाप का पूरा प्यार समेटे स्कूल की तरफ भागे होंगे... किसी ने मां से टाई मांगी होगी, किसी ने अब्बू से स्वेटर... किसी भाई ने जूते पौंछकर पहनाए होंगे... तो किसी बहन ने जाते-जाते दुआओं के साथ बाल संवारे होंगे... जाने कितने घरों में ये सब उस तारीख के साथ चला गया। 

लाशें घर लौट कर नहीं आती...  वो बच्चे जो अपनी स्कूल की वर्दी पर एक दाग पसंद नहीं करते ... उनकी वर्दी का रंग लहू सरीखा हो गया। 

इस उम्र में बच्चे... बच्चे भी नहीं होते... वो तो एक ख्वाब होते हैं...
हर एक बच्चा एक ख्वाब होता है...
हर बच्चा अपने आप में एक मुकम्मल ख्वाब समेटे होता है...
ऐसे कितने ख्वाब आज इंसानियत से छीन लिए गए।

ऐसे कोई करता है क्या, छोटे बच्चों को कोई मारता है क्या


ये सवाल सिर्फ उन शख्स का नहीं है, जिन्होंने अपना बच्चा खोया है...

ये सवाल हर उस मासूम का है जिसे हमने आज खो दिया...

ये सवाल हर उस ख्वाब का है ... 
जो वो मासूम पूरा होने से पहले ही अपने साथ लिए जा रहे हैं... 

दूर ... बहुत दूर... 
वापिस उसी खुदा के पास... 

जिसने उन्हें ज़िंदगी देने के साथ ... 
एक ख्वाब दिया था... एक मुकम्मल ख्वाब... 

एक मुकम्मल ज़िंदगी के साथ... 
एक मुकम्मल ज़िंदगी जीने के लिए... 

*** अब वो शायद सितारे बन गए हैं... 
ऊपर उसी आसमान में ... 
जो चुपचाप सब देखता रहा... सहता रहा... सिसकता रहा... 
प्लीज़... उन्हें दुनिया का वो आसमान कभी मत देना जिसके नीचे ऐसे सिरफिरे वहशी पनाह लेते हैं... 
जहां मजहब के नाम पर ऐसे गुनाह होते हैं...
ऐसी दुनिया और ऐसे आसमान से उन्हें दूर रखना ईश्वर... 

अलविदा नन्हें फरिश्तों ...