शनिवार, 24 अगस्त 2013

" तू क्या करेगा "

"  तू क्या करेगा  " ... तीन शब्द हैं । बड़े साधारण से, रोज़ाना की बातचीत में धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाते हैं बिना किसी हिचक ... झिझक... बेरोकटोक... अमूमन बिना किसी निहित स्वार्थ... भावार्थ और परमार्थ के । 
लेकिन प्रयोग यदि किसी विशेष संदर्भ में हो तो साधारण से लगने वाले शब्द... रोजाना के वाक्य और वाकये भी सोचने पर मजबूर कर देते हैं। 
उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ। आमतौर पर दोपहर के वक्त... औऱ वो भी छुट्टी वाले दिन , मैं दिनभर सोने में विश्वास रखता हूं। लेकिन उस दिन किसी कारणवश मैं जागा हुआ था, कुछ काम से कहीं जाना था लिहाजा हफ्ते भर की नींद और उतनी ही बेतरतीब दाढ़ी लिए अपने इलाके के सबसे हैपेनिंग सलून पर जा पहुंचा ।
 नाम एकदम मॉडर्न ... दाम एकदम मॉडर्न ... और काम ... खैर छोड़िए, इसके अलावा बाकी चीज़ों में सुधार की काफी गुंजाइश थी, इसके अलावा दूसरे ऑप्शन गौर फरमाने लायक भी नहीं है। लेकिन भीड़ वहां भी कम नहीं रहती है।
खैर ... हमें इनका बिजनेस मॉडल या पैटर्न स्टडी नहीं करना है, बल्कि उस दिन यहां कुछ ऐसा हुआ जिससे मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया । 
अरसे से मुझे लगने लगा था कि इंसानियत... अपनापन औऱ आत्मीयता जैसी मानवीय भावनाएं हमारे ऑफिस ( कृप्या बहुवचन संदर्भ लें) या फिर परिवेश से गायब हो चुकी हैं और इनकी जगह कदाचित ऐसी मशीनी भावनाओं ने ले ली है जो अभी खुद अपने अस्तित्व से अनजान हैं, लिहाजा इंसानों का वजूद उनके लिए कोई औचित्य नहीं रखता है । 
लेकिन मशीनी भावनाओं या फिर सीधे-सपाट शब्दों में इंसानियत के अभाव का ये वायरस हर जगह अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहा है।
हम हकीकत से रुबरु कराते इस किस्से के उस हिस्से पर सीधा पहुंचते हैं जहां इसकी शुरुआत हुई।
आज काफी दिनों के बाद मिस्टर ए से मुलाकात हुई। मिस्टर  ' ए ' एकदम खुशमिजाज किस्म के मस्तमौला उस्ताद हैं। उस्ताद इसलिए क्योंकि उस मॉडर्न शेव शॉप पर वो सबसे पुराने मुलाजिम हैं ( कायदे से पीएफ, ग्रेच्युटी वगैरह वगैरह के हकदार, लेकिन हिस्से में क्या आता है ... कम गल्ला होने पर सबके हिस्से की गालियां ... शराब का ठेका बंद होने से पहले रोज़ाना मालिक के लिए शराब और चखना लाने की जिम्मेदारी और कभी-कभी मालिक के मूड में होने पर एक-दो पैग भी गटकने को मिल जाते हैं  ) । 
उस्ताद बिना गाना सुने शेव नहीं बनाते हैं औऱ कटिंग तो बिल्कुल नहीं । उनकी बातें कुछ इस किस्म की होती हैं कि लोगों के बाल सुनते सुनते पक जाएं लिहाजा वो कलरिंग भी पूरे शौक से करते हैं। 
.........................औऱ उनकी दुकान पर छंटनी नहीं होती है जैसा कि बड़ी बड़ी कई तरह की दुकानों में बड़ी ही बेशर्मी से कर दी जाती है । .........................
खैर... जल्दी थी तो हमने उस्ताद जी से इल्तजा की, कि थोड़ा जल्दी फारिग कर दिया जाए, तो उस्ताद जी भी एकदम मौके की नजाकत को समझते हुए फौरन काम में जुट गए। मोबाइल पर गोविंदा का एक तड़कता-फड़कता सा गाना लगाया और उस्ताद का उस्तरा सटासट चालू । 
इस बीच वहीं बैठे आराम फरमा रहे एक चेले ' ई ' का फोन बजता है। चेला कुछ नया सा जान पड़ रहा था , फोन बजने से पहले तक ये नया चेला उस्ताद जी से प्रवचन सुन रहा था उसकी काहिली को लेकर । और वो सिर्फ मिमिया रहा था। फोन घर से था और मामला सीरियस जान पड़ रहा था, लिहाजा उस्ताद जी शेव बनाने में जुट गए तो चेला फोन सुनने में । 
चेले ने फोन रखा तो आंखों में आंसू थे और गला रुंधा हुआ था। उस्ताद जी ने फौरन हाथ रोका और चेले से पूछा सब खैरियत ... चेला रोने लगा । साथ के बाकी चेले ... बी , सी और डी उसे चुप कराने लगे । सुबकियों के बीच उसने बताया कि उसके चाचा की लड़की ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली है , वजह .. जाहिर सी बात है पता नहीं ...  या बताई नहीं गई, लेकिन चेले को फौरन घर बुलाया है। 
चेले ने उस्ताद जी से घर जाने की इजाजत मांगी तो उस्ताद जी ने सलून के मालिक को फोन करने की सलाह दी। आखिर उस्ताद जी भी तो लाला की चाकरी करते हैं, कैसे खुद से चेले को घर जाने के लिए बोल देते , दुकान पर तो एक अदद हैंड कम हो जाता ना , उसकी जिम्मेदारी कौन लेता। 
चेला नया था, डरते-डरते आंखों में आंसू लिए मालिक को फोन किया। दोपहर का वक्त था, मालिक आराम फरमा रहे थे लिहाजा सास-बहू सीरियल देख रही मालकिन ने फोन उठाया और परेशान करने का सबब पूछा। चेले ने डरते-डरते... रोते-रोते ... पूरी बात उन्हें बताई ।  
मालकिन जाहिर तौर पर एक महिला हीं थी, लिहाजा इनसे एक महिला सा व्यवहार ही अपेक्षित था... लेकिन वो तो मालिक से भी दो कदम आगे निकली । मालिक हो सकता है शराब के नशे में इन लोगों के साथ बदतमीजी से पेश आता हो ... वो भी शायद ... लेकिन मालकिन का जवाब चौंकाने वाला था...
मालकिन का जवाब --- जैसा बताया गया  --- " मरने वाली तो मर गई है, अब तेरे जाने से क्या हो जाएगा। बता ... तू क्या करेगा । " ...
पूरी दुकान में हर तरफ बस यहीं गूंज रहा था... 
तू क्या करेगा । वो तो मर गई है , अब तेरे जाने से क्या होगा । 
चेला रुकने की हालत में नहीं था लिहाजा उस्ताद जी ने अपने रिस्क पर उसे घर रवाना कर दिया । इंसानियत अभी घिसट-घिसट कर ही सही लेकिन जिंदा दिखाई दी। 
मैं भी शेवोपरांत घर की तरफ चल पड़ा ... लेकिन सामने रास्ता दिखाई देना बंद हो चला था... दिमाग शून्य था और मैं संज्ञाशून्य ... बस यही शब्द बार-बार सुनाई दे रहे थे ... तू क्या करेगा  ... 
" मरने वाली तो मर गई है, अब तेरे जाने से क्या हो जाएगा। 
बता ...
" तू क्या करेगा  " ...

2 टिप्‍पणियां:

  1. तू क्या करेगा ... ये सुन सुन के और एक दुसरे को कह के ... हम इतने आदि हो गए हैं की ये हमारी मानसिकता बन चली है. अब शायद जहाँ हम कुछ कर सकते हैं, वहां भी खामोश रहके खुद से ही कह देते हैं, मेरे बस में क्या है… मैं क्या कर सकता हूं ..में क्या करूँगा ...छोड़ यार… रहने दे…

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  2. बहुत ही खूबसूरती से लिखा गया है...बदलाव की दरकार है, बदलाव की ज़रूरत...ये हम सब जानते है..लेकिन बदलाव तो सबसे पहले हमे अपने में करना होगा..अपनी सोच में करना होगा.

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