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मंगलवार, 16 मई 2017

मॉनसून के लिए तैयार दिल्ली !!!

पिछली बारिशों की एक शाम
मई की तपती गर्मी के बीच राजधानी दिल्ली के निवासियों के लिए कुछ ‘राहत’ की फुहारें बहुत ‘सुकून’ लेकर आई हैं। पूरी दिल्ली का सरकारी अमला इन दिनों दिल्ली के सीवेज़ और ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने में जुटा है जिससे मॉनसून आने पर राजधानी के लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। आपसी गिले-शिकवे, आरोप-प्रत्यारोप, नारे और वादे, समर्थकों से वादाखिलाफी औऱ विरोधियों की छीछालेदर... सब कुछ मनों और टनों की मात्रा में सुबह से शाम तक रोज़ाना गटर में बहाया जा रहा है जिससे इन पदार्थों की प्रवृति के अम्लीय स्वभाव से शहर की गंदगी को साफ किया जा सके। आमतौर पर ये कवायद (कई बार देखा गया है) मॉनसून के आने पर ही शुरु की जाती है लेकिन इस बाद माहौल बदला हुआ है।

कई प्रेस कॉन्फ्रेंसों के ज़रिए पहले से ही मच्छरों की ब्रीडिंग पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है। जगह-जगह अनशन और धरनों के माध्यम से नालों की सिल्ट, गाद साफ की जा चुकी है, नालियां चमचमा रही हैं। सिस्टम को इस हद तक साफ कर दिया गया है कि आप यमुना नदी में गिरने वाले नालों में बेझिझक स्नान का आनंद उठा सकते हैं। अत्यंत कड़े शब्दों में निंदा कर, दिल्ली के ड्रेनेज सिस्टम को भी दुरुस्त कर लिया गया है। हालांकि कई बार विभागों के आपसी समन्वय और आंकड़ों के मकड़जाल में उलझे रहने की वजह से इफेक्टिव मैनपावर और इफेक्टिव मैनआवर के बीच तालमेल गड़बड़ाया जरूर है लेकिन इस बार हालात बदले हुए नज़र आ रहे हैं। 

सेंट्रल दिल्ली निवासी मिंटो ब्रिज और तिलक ब्रिज से जब इस बारे में बात की गई तो वे मॉनसून को लेकर काफी उत्साहित नज़र आए। जलभराव का ज़िक्र उन्हें थोड़ा संजीदा कर गया, पानी से भरी सड़क जब तालाब में तब्दील हो जाती है तो उन्हें बचपन के दिन याद आ जाते हैं जब बच्चों के लिए तालाबों तक की किल्लत नहीं थी। यही कुछ उद्गार ज़खीरा पुल ने भी व्यक्त किए, कई बारिशों में बसों की साफ-सफाई का काम ज़खीरा पुल के नीचे और आस-पास तसल्लीबख्श तरीके से किया गया है। ऐसे और भी कई इलाके हैं, लेकिन सभी की बात आप तक पहुंचाते-पहुंचाते हम अगले मॉनसून तक जा पहुंचेंगे। लेकिन हां, भयंकर गर्मी और लू के थपेड़ों को सहने के बाद बारिश की बूंदों की बाट जोहते दिल्ली वालों को जगह-जगह जलभराव के बहाने प्रकृति के नज़दीक आने का अवसर सालों से दिया जा रहा है।

ट्विटर, इंस्टाग्राम औऱ फेसबुक के माध्यम से राजधानी जगमगा रही है, राजधानी दिल्ली लंदन में तब्दील हो चुकी है। जियों के अनलिमिटेड डाटा के बोझ तले फ्री वाई-फाई कसमसा रहा है। मॉनसून के लिए राजधानी को तैयार कर लेने के बाद फिलहाल गर्मी में कई इलाकों में हो रही पानी सप्लाई में दिक्कत पर काबू पाने के लिए कई खुलासों का सहारा लिया जा रहा है। पुराने रहस्यों को ज़ाहिर कर पाइपलाइनों की मरम्मत का काम किया जा रहा है। राजधानी में जगह-जगह पोल-खोल महोत्सव आयोजित किए जा रहे हैं जिससे साफ-सफाई के महत्व को जन-जन तक पहुंचाया जा सके। नालों की सफाई से निकली गाद और कीचड़ का इस्तेमाल धड़ल्ले से विरोधियों पर हमला बोलने के लिए किया जा रहा है, जिससे कालिख हो या कीचड़ कुछ भी व्यर्थ न जाने दिया जाए। 

जनता खुश है... 
राजधानी की बांछें खिल गई हैं... 
बादलों के इंतज़ार में यमुना का जल हिलोरें मार रहा है... 
झकाझक साफ सड़कें कड़ी धूप में सेल्फी ले लेकर खिलखिला रही हैं... 
दिल्ली तैयार है... 
बादल, बारिश ... मॉनसून... 
सब नै आण दे !!!



मंगलवार, 21 जुलाई 2015

एक गिलहरी से मुलाकात


इस रविवार एक गिलहरी से मुलाकात हुई... उसका वीकली ऑफ था... मेरा नहीं। 
सुहाना मौसम, मॉनसून... सुबह से छाए बादल... बूंदाबांदी ...बारिश (चाय-पकौड़े) ... जलभराव... राजनीति की दशा और दिशा ...
हर विषय पर उसकी गजब की पकड़ है। बातचीत की detailing फिर कभी, फिलहाल उसकी तस्वीर... कभी राह चलते किसी पेड़-टहनी पर मिल जाए तो बेझिझक तस्वीर दिखाकर बात कर लें। याद रहे ये कोई आम गिलहरी नहीं है ...

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

ये भी दिल्ली है ...

                 

दिल्ली की बारिश और जलभराव...

जनता... बकौल अखबार और समाचार, राजधानी की सड़कों पर पानी जमा होने से परेशान है लेकिन इसी शहर का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पक्की सड़कें बेशक नहीं है लेकिन जलभराव की समस्या शायद साल भर यूंही बनी रहती है, बारिश के होने या ना होने से शायद यहां के हालात पर बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है।

पहली तस्वीर को देखिए... बिजली की तारों में उलझा-छिपा एक बोर्ड, अपनी फीकी पड़ती मटमाती लिखावट के साथ आपके पधारने का धन्यवाद का धन्यवाद कर रहा है।
धन्यवाद...जी हां... ये बोर्ड कुछ यही कह रहा है, लेकिन बारिश के मौसम में इस धन्यवाद के अगले ही कदम पर आपको क्या मिल जाए, आप सोच भी नहीं सकते। और यकीन मानिए आप ऐसा करना भी नहीं चाहेंगे।

ज़रा ध्यान से देखिए... तस्वीर में आप एक आदमी को हाथ में कुदाल लिए खड़ा देख सकते हैं।
ये भाई साहब पानी की निकासी का रास्ता खोज रहे थे। किसी महकमे के इंतज़ार में तो यहां के लोग सड़ांध भरे इस पानी में यूहीं सारा मौसम बैठे रहेंगे लेकिन बारिश की हर फुहार आपके लिए राहत नहीं परेशानी का सबब बनती जाएगी।

अगली तस्वीर में पानी से लबालब भरी गली में घुसने से शायद एक मिनी ट्रक को भी सोचना पड़ रहा है, गली में ठहरा हुआ पानी बारिश के पानी की तरह मिट्टी घुला हुआ गंदला सा नहीं, बल्कि नालियों के पानी और गाद से मिलकर काले रंग का बदबूदार घोल की तरह हो जाता है।

तीसरी तस्वीर में एक बाइक सवार पूरे अनुभव के साथ पानी से भरे रास्ते में धड़ल्ले से निकल गया लेकिन पैदल जाने वाले लोग... वो क्या करते होंगे। पैदल जाने वाले लोग दीवार का सहारा लेकर इन रास्तों को पार करते हैं। यहां से गुजरने वाले लोग किसी तरह व्यवस्था और बारिश को कोसते हुए निकल जाते हैं लेकिन यहां के बाशिंदे। यहां रोज़ाना सालों से रहने वाले लोग... क्या वो इसी ज़िंदगी के हक़दार हैं।

ऐसा कमोबेश इन लोगों के साथ हर साल हर बारिश होता होगा लेकिन इस समस्या का समाधान कब निकलेगा ये कोई नहीं जानता।  मौसम की पहली बारिश ही सिविक एजेंसियों की पोल खोल देती है लेकिन यहां ये हालात पहली से आखिरी बारिश तक बने रहते हैं... और शायद बिना बारिश के भी। हम लोग राजधानी की सड़कों पर एक-दो घंटे का जलभराव नहीं झेल पाते हैं और ये सड़ांध इन लोगों के जीवन का जैसे हिस्सा बन जाती है...एक-दो नहीं बल्कि पूरे 24 घंटे... ऐसा एक-दो दिन नहीं बल्कि सालों से चला आ रहा है और शिकायतें हर साल यूंही बह जाती है इसी तरह... लोग जैसे आदी हो चले हैं . . .

पार्टी बदल जाती है, नेता बदल जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं लेकिन कुछ है जो साल दर साल यूंही बदस्तूर जारी रहता है और वो है दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में लोगों का नारकीय हालात में जीवन। यहां रहने वाले लोगों को इन कॉलोनियों को नियमित करने का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है, लेकिन ज़मीनी तौर पर ऐसा होना अभी बहुत दूर की कौड़ी लगती है। साल 2008 में तत्कालीन शीला सरकार ने 1639 अनधिकृत कॉलोनियों में से 895 कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया था, लेकिन अभी तक एक भी कॉलोनी नियमित नहीं की जा सकी है। एक तरफ इन कॉलोनियों को नियमित करने वादा है तो दूसरी तरफ इस प्रक्रिया में शामिल तमाम व्यावहारिक दिक्कतें। लेकिन ये तमाम अड़चनें एक मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के सामने कोई वजूद नहीं रखती।

दिल्ली सरकार ने हाल ही में दिल्ली शहरी विकास एजेंसी (DUDA) बनाने की घोषणा की थी, जो दिल्ली में अलग-अलग सिविक एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने और विकास के कार्यों में एकरूपता लाने के साथ-साथ इन पर नज़र रखने का भी काम करेगी। दिल्ली कैबिनेट की बैठक में इस एजेंसी के गठन को औपचारिक मंजूरी दे दी गई है।

उम्मीद है ... अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले हज़ारों-लाखों लोगों की ज़िंदगी अगली बारिश तक ऐसी ना रहे।
सभी जगह तो संभव नहीं है लेकिन अगर कुछ इलाकों में भी लोगों को रोज़ाना के इस नारकीय जीवन से छुटकारा मिल सके तो शुरुआत अच्छी ही मानी जाएगी। वर्ना लोग तो आदी हो चुके हैं, मजबूरी की ऐसी ज़िंदगी के भी औऱ हर बारिश में बह जाने वाले वाले चुनावी वादों के भी।