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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

अलविदा ...डॉक्टर कलाम

मैं एक गहरा कुआं हूं इस ज़मीन पर...
बेशुमार लड़के-लड़कियों के लिए कि उनकी प्यास बुझाता रहूं।
उसकी बेपनाह रहमत उसी तरह ज़र्रे-ज़र्रे पर बरसती है...
जैसे कुआं सबकी प्यास बुझाता है।
इतनी सी कहानी है मेरी...
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.................
....................
मैं दूसरों के लिए मिसाल नहीं बनना चाहता, 
लेकिन शायद कुछ पढ़ने वालों को प्रेरणा मिले कि अंतिम सुख रूह और आत्मा की तस्कीन है...
खुदा की रहमत उनकी विरासत है।
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शब्द गुलज़ार साहब के हैं ...
जो बयां कर रहे हैं एक रूह की खूबसूरती को...
और ये खूबसूरत रूह ... डॉक्टर एपीेजे अब्दुल कलाम... 
औऱ उनकी कहानी...
कहानी उस लड़के की जो अखबारें बेचकर अपने भाई की मदद करता था... 
उसके बाद जिसकी ज़िंदगी सबके लिए एक मिसाल बन गई।
फिलहाल... रात के बारह बज चुके हैं ... एक नया दिन एक नया सूरज आपकी राह देख रहा है...
और सुबह की पहली किरण के साथ वो हमें वहां से देख रहे होंगे... 
वो ज़मीन...जहां सूरज सबसे पहले अपनी आंखें खोलता है, उगते सूरज की ज़मीन पर जहां पिछले दिन का ढलता हुआ सूरज ...  उन्हें अपने साथ उस वक्त ले गया जब वो अपना सबसे पसंदीदा काम कर रहे थे... जब वो छात्रों के बीच ज्ञान औऱ अनुभव बांट रहे थे... उनसे अपने सपने साझा कर रहे थे... उनके हौंसलों को एक नई उड़ान ...एक नई पहचान दे रहे थे।
देश के 11वें राष्ट्रपति भारत रत्न डॉक्टर अब्दुल कलाम ने छात्रों से संवाद के हर मौके का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल किया। डॉक्टर कलाम शिक्षा में रचनात्मकता के हमेशा पक्षधर रहे। एक अवसर पर छात्रों से बातचीत के दौरान किताबी ज्ञान के परे शिक्षा को रचनात्मक रूप देने पर ज़ोर दिया क्योंकि रचनात्मकता सोच की तरफ जाती है। सोच से ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान आपको महान बना देता है। 

ऐसे महान इंसान डॉक्टर कलाम के व्यक्तित्व और उनकी उपलब्धियों के सामने समूचा देश उनका ऋणी है। 

डॉक्टर कलाम सपनों पर भरोसा करते थे शायद तभी उन्होंने इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल की। उन्होंने ना सिर्फ बड़े सपने देखे बल्कि अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उन्हें पूरा भी किया। 
एक बार उन्होंने कहा था ...

मेरे पंख हैं और मैं उड़ जाउंगा, आप सब मेरे साथ उड़ान भरने के लिए तैयार हैं???

वास्तव में ... सपनों के पंख लगाकर वो सफलता की उड़ान भरते रहे और सभी को प्रेरित करते रहे खासकर बच्चों और युवाओं को... खुद में भरोसा रखने के लिए, सपने देखने के लिए... और उन्हें पूरा करने के लिए। 
अलविदा डॉक्टर कलाम ...

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

एक गिलहरी से मुलाकात


इस रविवार एक गिलहरी से मुलाकात हुई... उसका वीकली ऑफ था... मेरा नहीं। 
सुहाना मौसम, मॉनसून... सुबह से छाए बादल... बूंदाबांदी ...बारिश (चाय-पकौड़े) ... जलभराव... राजनीति की दशा और दिशा ...
हर विषय पर उसकी गजब की पकड़ है। बातचीत की detailing फिर कभी, फिलहाल उसकी तस्वीर... कभी राह चलते किसी पेड़-टहनी पर मिल जाए तो बेझिझक तस्वीर दिखाकर बात कर लें। याद रहे ये कोई आम गिलहरी नहीं है ...

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

ये भी दिल्ली है ...

                 

दिल्ली की बारिश और जलभराव...

जनता... बकौल अखबार और समाचार, राजधानी की सड़कों पर पानी जमा होने से परेशान है लेकिन इसी शहर का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पक्की सड़कें बेशक नहीं है लेकिन जलभराव की समस्या शायद साल भर यूंही बनी रहती है, बारिश के होने या ना होने से शायद यहां के हालात पर बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है।

पहली तस्वीर को देखिए... बिजली की तारों में उलझा-छिपा एक बोर्ड, अपनी फीकी पड़ती मटमाती लिखावट के साथ आपके पधारने का धन्यवाद का धन्यवाद कर रहा है।
धन्यवाद...जी हां... ये बोर्ड कुछ यही कह रहा है, लेकिन बारिश के मौसम में इस धन्यवाद के अगले ही कदम पर आपको क्या मिल जाए, आप सोच भी नहीं सकते। और यकीन मानिए आप ऐसा करना भी नहीं चाहेंगे।

ज़रा ध्यान से देखिए... तस्वीर में आप एक आदमी को हाथ में कुदाल लिए खड़ा देख सकते हैं।
ये भाई साहब पानी की निकासी का रास्ता खोज रहे थे। किसी महकमे के इंतज़ार में तो यहां के लोग सड़ांध भरे इस पानी में यूहीं सारा मौसम बैठे रहेंगे लेकिन बारिश की हर फुहार आपके लिए राहत नहीं परेशानी का सबब बनती जाएगी।

अगली तस्वीर में पानी से लबालब भरी गली में घुसने से शायद एक मिनी ट्रक को भी सोचना पड़ रहा है, गली में ठहरा हुआ पानी बारिश के पानी की तरह मिट्टी घुला हुआ गंदला सा नहीं, बल्कि नालियों के पानी और गाद से मिलकर काले रंग का बदबूदार घोल की तरह हो जाता है।

तीसरी तस्वीर में एक बाइक सवार पूरे अनुभव के साथ पानी से भरे रास्ते में धड़ल्ले से निकल गया लेकिन पैदल जाने वाले लोग... वो क्या करते होंगे। पैदल जाने वाले लोग दीवार का सहारा लेकर इन रास्तों को पार करते हैं। यहां से गुजरने वाले लोग किसी तरह व्यवस्था और बारिश को कोसते हुए निकल जाते हैं लेकिन यहां के बाशिंदे। यहां रोज़ाना सालों से रहने वाले लोग... क्या वो इसी ज़िंदगी के हक़दार हैं।

ऐसा कमोबेश इन लोगों के साथ हर साल हर बारिश होता होगा लेकिन इस समस्या का समाधान कब निकलेगा ये कोई नहीं जानता।  मौसम की पहली बारिश ही सिविक एजेंसियों की पोल खोल देती है लेकिन यहां ये हालात पहली से आखिरी बारिश तक बने रहते हैं... और शायद बिना बारिश के भी। हम लोग राजधानी की सड़कों पर एक-दो घंटे का जलभराव नहीं झेल पाते हैं और ये सड़ांध इन लोगों के जीवन का जैसे हिस्सा बन जाती है...एक-दो नहीं बल्कि पूरे 24 घंटे... ऐसा एक-दो दिन नहीं बल्कि सालों से चला आ रहा है और शिकायतें हर साल यूंही बह जाती है इसी तरह... लोग जैसे आदी हो चले हैं . . .

पार्टी बदल जाती है, नेता बदल जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं लेकिन कुछ है जो साल दर साल यूंही बदस्तूर जारी रहता है और वो है दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में लोगों का नारकीय हालात में जीवन। यहां रहने वाले लोगों को इन कॉलोनियों को नियमित करने का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है, लेकिन ज़मीनी तौर पर ऐसा होना अभी बहुत दूर की कौड़ी लगती है। साल 2008 में तत्कालीन शीला सरकार ने 1639 अनधिकृत कॉलोनियों में से 895 कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया था, लेकिन अभी तक एक भी कॉलोनी नियमित नहीं की जा सकी है। एक तरफ इन कॉलोनियों को नियमित करने वादा है तो दूसरी तरफ इस प्रक्रिया में शामिल तमाम व्यावहारिक दिक्कतें। लेकिन ये तमाम अड़चनें एक मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के सामने कोई वजूद नहीं रखती।

दिल्ली सरकार ने हाल ही में दिल्ली शहरी विकास एजेंसी (DUDA) बनाने की घोषणा की थी, जो दिल्ली में अलग-अलग सिविक एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने और विकास के कार्यों में एकरूपता लाने के साथ-साथ इन पर नज़र रखने का भी काम करेगी। दिल्ली कैबिनेट की बैठक में इस एजेंसी के गठन को औपचारिक मंजूरी दे दी गई है।

उम्मीद है ... अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले हज़ारों-लाखों लोगों की ज़िंदगी अगली बारिश तक ऐसी ना रहे।
सभी जगह तो संभव नहीं है लेकिन अगर कुछ इलाकों में भी लोगों को रोज़ाना के इस नारकीय जीवन से छुटकारा मिल सके तो शुरुआत अच्छी ही मानी जाएगी। वर्ना लोग तो आदी हो चुके हैं, मजबूरी की ऐसी ज़िंदगी के भी औऱ हर बारिश में बह जाने वाले वाले चुनावी वादों के भी। 

रविवार, 7 जून 2015

LIFE AFTER MAGGI . . .

Dear Maggi . . .



. . . जिंदगी कब करवट बदल ले पता ही नहीं चलता। पिछले कुछ दिन जितने तुम पर भारी रहे हैं यकीन मानो किसी आदत को एकदम से छोड़ देना भी उतना ही कष्टकारी है।
पहले तो भरोसा ही नहीं हुआ, कि दो मिनट में तैयार हो जाने वाली मैगी का भरोसा भी दो ही मिनट में टूट जाएगा। हालांकि सब जानते हैं, ना तो तुम दो मिनट में तैयार होती हो और ना ही ये सारा खेल दो मिनट में सिमट जाएगा। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है... चलने दो। 
अगर तुम्हारा दामन पाक-साफ है तो फिर तुम्हें कोई छू भी ना पाएगा, अगर किसी ने तुम्हारे खिलाफ साज़िश की है तो भी भरोसा रखो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। औऱ अगर ये तुम्हारा अस्तित्व मिटाने का खेल है तो भी भरोसा रखो। झूठ के पांव नहीं होते हैं... और यकीन मानो सच हमेशा सच ही रहता है।
लेकिन हां... अगर तुमसे गलती हुई है तो उसे स्वीकार करो, पूरी जिम्मेदारी के साथ। भरोसा रखो, हम हिंदुस्तानी सब माफ कर देते हैं, सब कुछ। हमारी सोच जितनी विस्तृत औऱ संकुचित है समान रूप से हमारा हृदय भी उतना ही उदार है।
स्वाद के साथ अगर तुमने सेहत की तुकबंदी की थी, तो फिर उस पर खरा उतरना था, हालांकि आजकल वायदे कर तो दिए जाते हैं लेकिन उन्हें निभाते वक्त इंसान की हकीकत मालूम होती है, तुम तो फिर भी एक ब्रांड हो ... इतना बड़ा ब्रांड कि उसके आगे वायदे, भरोसा, सेहत... सब अदना सा होता चला जाता है उस इसान की तरह जिसका भरोसा फिलहाल तो टूटा सा लगता है।
कोई कह रहा है कि ये माओं का आलस है जो मैगी घर-घर तक जा पहुंचा... अब बताओ भला।
किसी का कहना है कि साल भर की उसकी मेहनत है जो सेहत से इस खिलवाड़ का खुलासा हो पाया...
कहीं बात हो रही है कि ब्रांड मैगी को मरने नहीं देंगे, ब्रांड क्या इंसान से बड़ा हो गया जी...
कहीं मैगी पर रोक लगा दी गई है तो कहीं उसका स्टॉक वापिस लिया जा रहा है...
कहीं मैगी पर बैन के खिलाफ अर्जी दी जा रही है...
इस बीच स्वदेशी मैगी उर्फ हर्बल नूडल्स की मांग और ब्रांडिंग पूरे शबाब पर है। मांग और आपूर्ति की परिकल्पना यही तो है।
हर्बल मैगी का स्वरूप आखिर कैसा होगा, क्या वही स्वाद होगा, क्या वही हवा में तैरती महक होगी जो आपकी भूख को और बढ़ा देती थी... क्या वही दो मिनट का इंतज़ार होगा। क्या फिर से वो भरोसा कायम हो पाएगा। सेहत और स्वाद का एक होना क्या वास्तव में संभव है या फिर ये एक कवि की कल्पना से भी इतर कोई अस्तित्व है।
पर मैगी... डियर मैगी ... तुम घबराओ मत। हो सकता है बहुत जल्द तुम पर लगे सारे आरोप किसी समझौते या संवाद के तहत खारिज कर दिए जाएं। और एक नए सिरे से सेहत और स्वाद को मद्देनज़र रखते हुए (उम्मीद है) तुम्हारी री-ब्रांडिंग की जाए। और अगर ऐसा नहीं भी होता है तो हम दो मिनट का विकल्प ढूंढने और ठूंसने में तुमसे भी कम वक्त लेंगे। बाज़ार में विकल्पों की कमी नहीं है, कभी-कभी तो विकल्पों की जरुरत और मार्केट दोनों बनाए जाते हैं और साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ अपनाया जाता है, यकीनन तुमने भी किसी ना किसी स्तर पर ऐसा जरूर किया होगा। फिर एक दिन एक नया विकल्प आएगा और हमें पता चलेगा कि जिस विकल्प को हमने तुम्हारी जगह दी थी वो भी उसके कतई लायक नहीं था। फिर हम एक नया विकल्प खोज निकालेंगे।
ये लापरवाही है, गलती है या फिर मुनाफा कमाने के चक्कर में जानबूझकर मानकों औऱ सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया। ये सच तो एक दिन सामने जरूर आएगा।
लेड का स्वाद कैसा होता है, ये हमें पता नहीं मैगी लेकिन उससे नुकसान क्या है ये अब जरूर पता चल गया है, MSG का खेल कैसे खेला जाता है ये भी नहीं पता, लेकिन इन सबकी भरपाई हम कर रहे हैं। स्वाद के नाम पर सेहत भी दे दी...वो भी बस दो मिनट के फेर में।
लोग कह रहे हैं कि हमारे रोज़ाना इस्तेमाल की चीजों में औऱ भी खतरनाक तत्व मिले हुए हैं या मिल जाते हैं या मिला दिए जाते हैं। कहीं कोल्ड-ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड्स की बात आती है, कहीं मिलावटी तेल का मसला है, नालों के पानी में पनपती सब्ज़ियां रोज़ाना खाई-पकाई जा रही हैं, केमिकल्स से पकाए गए फल किसी को कैसे सेहत दे सकते हैं। कहीं अनाज, दालों में आर्सेनिक मिल रहा है, तो कहीं रोज़ अंडे खाने पर भी अब सोचना पड रहा है। जगह-जगह मिलावटी और दूषित खाद्य सामग्री की चर्चा और इस्तेमाल, इंसान मिलावट का शायद आदी हो चला है।
एक तरफ तो मैगी ने उपभोक्ताओं के मन में संशय डाल दिया है तो दूसरी तरफ मैगी पर भरोसा करके उसका प्रचार करने वाले भी नूडल्स के फेर में उलझे नज़र आ रहे हैं। यकीनन बात सेहत और स्वाद की ही रही होगी तभी एक भरोसे के साथ एक भरोसे का प्रचार-प्रसार होता है। पैसा कहीं शामिल नहीं रहा होगा, सिर्फ पैसा मेरा मतलब है, शायद खुद का अनुभव भी प्रेरक रहा होगा। या फिर कोई ऐसा एग्रीमेंट होता होगा जो पैसों में ही लिखा जाता होगा। पैसा यानी मनी... अब यहां भी ब्लैक और व्हाईट खोजेंगे तो मामला बहुत भटक जाएगा। कहीं कोई अमिताभ बच्चन से सफाई मांग रहा है तो कोई माधुरी से मैगी खाने का हर्जाना मांगने पर तुला है। क्या ये सितारे फिल्मों में जो भी कुछ करते हैं आप आंख मूंदकर वो सब अपनी ज़िंदगी में करने लगते हैं, एक आम आदमी की ज़िंदगी में क्या इतनी गुंजाइश होती है। आम आदमी आजकल बहुत जागरुक हो गया है लेकिन ये जागरुकता क्षणिक और भौतिक ज्यादा हो गई है शायद।
किसी उत्पाद के दावों की सत्यता को परखना इन सितारों का काम होना चाहिए या सरकार का। या फिर सभी हमारी ही तरह एक धोखे का शिकार हुए हैं। और ये धोखा यकीन मानिए असली वास्तविकता है, उत्पाद का नाम और धोखे का स्तर शायद बदलता रहता है। अगर इन खबरों में लेशमात्र भी सच्चाई है तो ये भरोसा तोड़ने से भी बड़ा गुनाह है... ये गुनाह एक पूरी पीढ़ी के स्वास्थ्य के साथ है, इस गुनाह की व्यापकता को ज़रा देखिए... एक पूरी पीढ़ी। 

 खुशियों की रेसीपी ... दो मिनट की खुशियों की रेसीपी, कहीं किसी की मां को अपना बनाती रही, और जाने कहां- कहां दो मिनट में खुशिया बनाती रही। हम सबकी मैगी की अपनी – अपनी कहानी रही है, हां भई है बिल्कुल है यकीन मानो, क्योंकि मैगी की एक कहानी मेरी भी है, पर ये ना किसी पैक पर है, ना कभी टीवी पर आई और ना ही किसी को सुनाई गई। ऐसा मैने टीवी पर एक एड फिल्म में देखा था, लेकिन मेरी मैगी की कहानी मेरे पास रही। ये कहानी एक चैनल में काम करने वाले एक प्राणी की थी, जो कभी – कभी घर से लाया हुआ खाना नहीं खा पाता था। खाना जिसे पूरे दो घंटे में तैयार किया जाता था उस खाने के टिफिन पर दो मिनट की मैगी वाकई खुशियों की रेसीपी बन कर आती थी। पूरी शिफ्ट के बाद मैगी खाने में एक अलग ही आनंद आता था, पता नहीं झा जी मैगी में क्या डालते थे (यहां लेड और MSG की बात नहीं हो रही है), दिनभर की सेहत और स्वाद की शायद भरपाई हो जाती थी। झा जी का पूरा नाम क्या है कभी मालूम नहीं हुआ , शायद जरूरत ही नहीं पड़ी ना उन्हें बताने की ना हमें पूछने की। बस उनकी बनाई चाय और मैगी से वास्ता बना रहा। एक दिन उनको भरोसे में लेकर उनकी रेसीपी जानने की कोशिश भी की, और फिर उनके बताए तरीके से खुद का हाथ आजमाया, लेकिन वो स्वाद नहीं आया। 
और ये कोशिश उस दिन तक जारी थी . . . 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

पेशेवर... एहसान-फरामोश

हर हर्फ़ चुप है
क्यूँ क़लम चुप है
नज़रें बेबस नहीं 
बेशर्म हैं...
और चुप हैं
पर्दे के पीछे विकृत से
गुनहगार हैं चेहरे 
ख़ामोश हैं
ये किन लोगों से इंसाफ़ चाहिए तुम्हें
ये कमज़र्फ हैं 
पेशे से एहसानफरामोश हैं ...

रविवार, 27 जुलाई 2014

झूठा बचपन ... रूठा बचपन


एक बचपन है झूठा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
दिन बहुत लंबा है, पेट है खाली...
ये बचपन है...
दिन भर के बोझ से टूटा सा...
सतरंगी हैं गुब्बारे,
और डोर से ज़ख्मी हथेलियां,
नींद में ही सही मचलती तो होगी...
कलम पकड़ने के लिए...
दोपहर के सूरज तले...
कलम बेचती नन्ही सी उंगलियां...
क्यूं बचपन की खुशियों से,
ये बचपन है छूटा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
रेड-लाइट पर भागता...
कातर निगाहों से ताकता...
भीड़ में चेहरे नहीं रोटी ढूंढता है ...
रोज़ सड़कों पर ...
ये बचपन भूखा सा...
अपनों से रूखा सा...
मढ़ी हुई है सूखी चमड़ी ...
मुट्ठी भर हाड़-मांस पर ...
ये बचपन है,
पसलियों तक सूखा सा ...
जिंदा शरीर...मुर्दा ख्वाब ...
बस उनके बोझ को ढोता सा ...
बुझे हुए अरमानों का बचपन...
ये बचपन,
जैसे एक धोखा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
लम्हों को सीता हुआ ...
खाली सा ...रीता सा...
जूठन को धोता वो,
खुरचन पर जीता सा...
सपनों से रूठा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
  

शनिवार, 30 नवंबर 2013

. . . . . . . ये रंग जिंदगी के . . .


ये हाथ कागज़ों से 
ये लफ्ज़ बादलों से
लिखते हुए किस्सा तेरा
हुआ ज़िक्र फासलों से . . .
पगडंडियों सी लिखावट
धुलती चली गई वो
हर शाम तुम्हें लिखा
बेताब बारिशों से . . .
हर रंग से लिपटकर
ख्वाबों ने जी समेटा
हुई धड़कनें मलंग सी
थामा जो हसरतों से . . .
उस धूप की इबारत
है वक्त के सफे पर
वो हाशिये पर लिखना
फिर रोज़ आदतों से . . .
दुआओं की ली स्याही
लिखा इबादतों से
है जिंदगी को बख्शा
खुद से ही ... ख्वाहिशों से . . . 
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हर राह पर भटक कर
सरे-राह खुद से मिलना
हर मोड़ पर हम उलझे
क्या पाया मंज़िलों से
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रविवार, 24 नवंबर 2013

तुम एक सोच हो ...

क्यों ...
आखिर क्यों तुम बासी हो चली हो ...
ठंडी पड़ी उस चाय की तरह ....
जिसे नुक्कड़ का चायवाला बार बार गर्म कर परोस देता है ....
और सुड़क सुड़क कर तुम
पी जाते हो चुपचाप बिना किसी शिकायत के ...
उस चाय को जिसमें पत्ती से ज़्यादा ...
चाय के बर्तन का जंग महकता है ...
जिसमें चाय की पत्ती से ज़्यादा
उस पेड़ के पत्ते मिले हैं
जो ऊपर से सब कुछ देखता रहता है चुपचाप
औऱ मुस्कुराता है...
नीचे जुटी बुद्धि-परजीवियों की जमात
और उनकी फेसबुकिया जुगाली पर ...
क्यों ...
आखिर क्यों तुम पर असर डालने लगी हैं ...
इस नश्वर दुनिया की मायावी बातें ...
और घिनौनी लगने लगी हो तुम ...
आज जब चाय की इस दुकान पर अरसे बाद मिली हो ...
हां घिनौनी ...
बिल्कुल कांच के इस गिलास की तरह...
जिसे खरीदने के बाद कभी धोया नहीं गया ...
बस खंगाल दिया गया ...
जूठे बर्तनों से भरे एक बड़े से टब में ....
जो गंदला उठा है...
जमाने भर के लोगों की सोच से...
जो वो बची-खुची चाय के साथ
उसी गिलास में जमी
पपड़ाई मलाई की परत के साथ छोड़ गए
तभी रह रहकर स्वाद चाय से ज़्यादा ...
जग की झूठन का कौंचता है...
क्यों ...
आखिर क्यों...
फटे हुए दूध के उबाल सरीखे...
बेस्वाद ... अपने विचारों को समेटे हो...
हंसी ठठ्ठा करते चार लोगों का ओपिनियन पोल नहीं  ...
जो ऐसे किसी भी पेड़ के नीचे बैठकर ...
ज़माने भर को चार गालियां देकर ...
खीसें निपोरते हैं ...
टूटी चारपाईयों पर बैठने वाले ये लोग ...
बिना रीढ़ के ...
तुम इनसे परे हो ...
तुम एक सोच हो...
तुम्हें जिंदा रहना है ....
कहा है ना
फेसबुकिया जुगाली नहीं...
बुद्धि-परजीवियों की जमात से परे ...
ब्लॉगिक आत्म-मुग्धता से दूर ...
तुम एक सोच हो...
तुम्हें जिंदा रहना है ....