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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

एक दरख़्त होने का मतलब


मैं एक दरख़्त हूं
शांत
स्थिरचित्त
ये मेरी इच्छा नहीं
नियति है
अब यही
स्वभाव,
ये रास्ता
ये कंकड़-पत्थर
ये माटी मेरे साथी
ये मुसाफिर
मेरे हमसफर,
बातें करता हूं
बातें सुनता हूं
वजूद से परे
रिश्ते जोड़ता हूं
लेकिन नियति क्रूर
और 
मुसाफिर मजबूर  ...
छांव तले 
छूट जाते हैं
रिश्ते अक्सर
दरख़्त हूं
संभल जाता हूं
ये इंसान कब समझेंगे
रिश्तों को छोड़ना
इच्छा है
नियति नहीं
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हेमन्त वशिष्ठ
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मंगलवार, 21 जुलाई 2015

एक गिलहरी से मुलाकात


इस रविवार एक गिलहरी से मुलाकात हुई... उसका वीकली ऑफ था... मेरा नहीं। 
सुहाना मौसम, मॉनसून... सुबह से छाए बादल... बूंदाबांदी ...बारिश (चाय-पकौड़े) ... जलभराव... राजनीति की दशा और दिशा ...
हर विषय पर उसकी गजब की पकड़ है। बातचीत की detailing फिर कभी, फिलहाल उसकी तस्वीर... कभी राह चलते किसी पेड़-टहनी पर मिल जाए तो बेझिझक तस्वीर दिखाकर बात कर लें। याद रहे ये कोई आम गिलहरी नहीं है ...