शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009
मुस्कान वाले फ्रेम
मेरे होठों की मुस्कान थी...
औऱ मेरे पास...
उस मुस्कान को सहेजते...
अनगिनत फ्रेम...
गोल ...चौकोर... तिकोने...
रंगबिरंगे फ्रेम...
हर एक फ्रेम के साथ...
एक अदद मुस्कान...
कुछेक ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम भी हैं...
क्योंकि कभी-कभी गुस्से वाले फ्रेम में भी...
मैं एक मुस्कुराहट ढूंढ ही लेता था...
थोड़ा सा अटपटा लगता है...
लेकिन मेरे ज़िंदगी के फ्रेम...
किसी तस्वीर की बजाय...
शायद मुस्कुराहट के आदी हैं...
हां ! कुछ धुंधली तस्वीरों वाले फ्रेम भी हैं...
लेकिन थे भी रंग नहीं...
मुस्कान ज़्यादा मुखर है...
मेरे उकेरे कुछ स्केच भी...
गिनतीभर तस्वीरों वाले फ्रेम के साथ...
ताकते रहते हैं...
हर पल मुस्कुराती...
मेरी ज़िंदगी की अल्बम को...
जो संजोए है...
सहज मुस्कान वाले...
ढेरों पनीले और सपनीले फ्रेम...
शनिवार, 29 अगस्त 2009
कुछ खो गया है ...
वहीं दीवार पर टंगा कैलेंडर...
मंगलवार, 25 अगस्त 2009
चैन की सांस ...
हाथ से टिफिन लेने मैं बढ़ा...
कि अचानक उन्होंने ...
ज़ोर से छींक दिया...
हाथ बढ़ते-बढ़ते रुक गए...
कदम जैसे वहीं थम गए...
मैं किसी बहाने से...
वापस कमरे में आकर बैठ गया...
पापा वहां आए...
मेरी आंखों में तैरते संशय को...
शायद वो भांप गए...
औऱ मुस्कुरा कर दूसरे कमरे में जाकर आराम करने लगे...
मैं भी जबरदस्ती व्यस्त हो गया...
शाम हो चुकी थी...
घूमने के बहाने मैं घर से निकला...
कहीं अकेले ही चले जाना चाहता था...
क़ॉलोनी में पीछे की तरफ बना पार्क...
मुझे सबसे मुफीद लगा...
कदम उसी तरफ बढ़ चले...
लेकिन जब वहां पहुंचा...
तो वो भी वहीं थी...
तब याद आया...
आज मिलना तय हुआ था...
उसकी आंखों में शिकायत थी...
औऱ होठों पर एक गुजारिश...
वो पास आई...
सांसे मिलने को ही थी...
कि मैं फिर ठिठक गया...
वो आवाज़ देती रही ...
लेकिन मैनें पीछे मुड़कर भी नहीं देखा...
सीधा घर जाकर रुका...
रात हो चली थी...
मां ने खाने के लिए आवाज़ लगाई...
खाना परोसते वक्त देखा...
मां को हल्का बुखार था...
शायद सिरदर्द भी था...
खाना उसी हालत में बनाया गया था...
लेकिन थाली जैसे मेरे हाथों से छूटते-छूटते बची...
खाना जैसे मैने बेमन से निगला...
जल्दी से हाथ धोकर...
चादर तानकर सो गया...
मां-पापा ने इसे भी बड़ी सहजता से लिया...
कुछ नहीं कहा...
बस मुस्कुरा कर कहा गुडनाइट...
सुबह मैं देर से उठा...
ताकि मेरे पास नाश्ता करने का भी वक्त ना हो...
उस दिन लंच लाना मैं जानबूझकर भूल गया...
ऑफिस पहुंचा...
जो भी मिला...
सबने बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया...
पर मैं झिझकता रहा...
एक फीकी मुस्कुराहट के साथ...
सबसे मिला...
बातें की...
और जैसे ही मौका मिला...
तुरंत जाकर साबुन से हाथ धोए...
तब कहीं चैन की सांस ली...
स्वाइन फ्लू थमने का नाम नहीं ले रहा है...
कोई भी चांस लेना ठीक नहीं है...
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
हर रोज़ जीने की कोशिश करता हूं मैं...
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
कोई शीर्षक मिला ही नहीं...
और वो जाने कब से चुपचाप...
सहमा हुआ सा...
मेरी कुर्सी के पास खड़ा था...
आंख उठा कर मैने देखा...
क्या बात है भाई...
धीरे से उससे पूछा...
पर वो मेरे सवालों को शायद सुन भी नहीं सका था...
दिन भर की थकान के बाद...
नाइट शिफ्ट में भी अखबारों का बोझा लिए...
वो शायद खड़ा-खड़ा ही सो रहा था...
अचानक कोई जोर से चिल्लाया...
औऱ रोबोट की तरह मुड़कर...
आवाज़ की दिशा में...
सोते हुए ही ...वो चल पड़ा था...
थोड़ी ही देर बाद...
एक डस्टबिन में उलझा...
वो फिर दिखलाई पड़ा था...
जमाने भर की गंदगी समेटता...
निर्लिप्त भाव से...
वो फिर दूसरे डस्टबिन की ओर चल पड़ा था...
तभी अचानक एक और आवाज़ का पीछा करते हुए...
वो रोबोटनुमा चाल से
फिर से सोते हुए चल दिया था...
इस बार वो हाथ में पैकेट थामे...
किसी का खाने का ऑर्डर लेकर आया था...
भूख से मेरी भी आंते कुलबुला रही थी...
औऱ खाने की महक से वो...
किसी तरह अपने को बचाए हुए था...
लेकिन इंसान था...
भूख दबा तो ली... पर छुपा नहीं पाया...
वो चुपचाप कोने में खड़ा होकर...
हंसते-मुस्कुराते...
कॉफी पीते...नूडल्स खाते...केक पर लपलपाते...
अपने ही जैसे इंसानों के झुंड को देख रहा था...
मेरी नज़र उस पर पड़ी तो वो....
झेंप सा गया...
तभी उस झुंड में से भी किसी ने उसे देखा...
दुत्कारा नहीं... पर उतना देखना भी बहुत था...
रोबोट की तरह फिर से वो उनके पास जा पहुंचा....
अब वो झूठन को समेट रहा था...
इसके बाद वो रातभर नहीं दिखा...
अगली रात भी नहीं...
किसी ने पूछने की जहमत भी नहीं उठाई...
किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ता...
मैं भी कुछ पल सोचने के बाद ...
फिर से अपने कम्प्यूटर के मॉनीटर में जा घुसा...
तभी लगा जैसे कोई मुझे बहुत करीब से देख रहा है...
सिर उठाकर मैने देखा...
बस चेहरा बदले...
आज वो दूसरा ऑफिस ब्वॉय था...
जो उसी वर्दी में...
उसी मुस्कुराहट को ओढ़े...
वो अपने काम में जुटा था...
बिल्कुल एक रोबोट की तरह...
बुधवार, 12 अगस्त 2009
तुम नहीं थी... पर तुम सही थी...
मंगलवार, 11 अगस्त 2009
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
ये सुनकर मैं ठिठका...
आवाज़ जानी -पहचानी लगी तो ...
धीरे से पलटा...
वो खड़ी थीं... अपनी सास के साथ...
अपने मोहल्ले के भोलू की ब्याहता...
शादी के करीब ७ साल बाद...
अपने दो बच्चों का हाथ थामे...
वही सवाल फिर से किया अपनी सास से...
बताओ... तो ... दो हजार रुपए में भला क्या होता है...
आवाज़ में शिकायत भी थी... दर्द भी...
और एक मजबूरी भी...
सास ने भी उसी बेचारगी से उसे देखा...
कहती भी क्या...
वो फिर बोली...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
बच्चों के स्कूल की फीस...
बिजली-पानी का बिल...
घर में रोज़ चूल्हा कैसे जलाउं...
कैसे निभाउं ननद बिन्नो की रिश्तेदारी...
कैसे उसे नेग की साड़ी भिजवाउं...
वो दारु पीकर आता है...
तीन दिन रहता है बीमार...
चार दिन दिहाड़ी पर जाता है...
कैसे उसकी दवा-दारु करवाउं...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
बारिश में टपकती है घर की छत...
दरवाज़े की कुंडी तक नहीं है...
जब छुपाने को कुछ है ही नहीं...
क्यों कमरे की टूटी दीवार की मरम्मत करवाउं...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
मां... आंखों से तो तुझे भी नहीं दिखता है...
डॉक्टर ने कहा है ऑपरेशन होगा...
तू ही बता...
कैसे शहर में तेरा इलाज करवाउं...
गिरवी रखे हैं खेत...
जब से की है बिन्नों की शादी...
कर्जा अब तक उतरा नहीं है...
खेत कैसे वापस छुड़ाउं...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
वो कहता है घर छोड़ कर चली जा...
तू ही बता मां...
इन दोनों बच्चों को लेकर अब मैं कहां जाउं...
तू ही बता मां...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
अब दोनों के आंसू मुझसे देखे नहीं गए...
जेब में हाथ डालकर आगे बढ़ गया...
आखिर २५०० की अपनी चकाचक डेनिम...
मैं कब तक उनसे छुपाउं...
बाकी का हिसाब जो लगाता...
तो शायद उनके तीन-चार महीने का बजट हो जाता...
कैसे मैं उनसे नज़रें मिलाउं...
सच ही तो कहती थी वो...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...
बुधवार, 5 अगस्त 2009
जब तुम नहीं थी...
तो तुम नहीं थी...
नहीं मिला बिस्तर के सिरहाने रखा...
वो चाय का कप...
कसमसा कर रह गया मेरा हाथ...
जाने क्यूं तुम नहीं थी...
उनींदी आंखों को मसलती रह गई ...
तेरी जुल्फों को तलाशती उंगलियां...
जब बिस्तर को सहेजते वक्त भी नहीं मिला तुम्हारा साथ...
क्योंकि तुम नहीं थी...
गीला-गीला सा मिला तकिया...
खारा -खारा सा लगा सुबह की हवा का स्वाद
बस तुम नहीं थी...
सिरहाने रखी डायरी में भी...
फटा हुआ मिला वो पन्ना...
जिस पर दर्ज थी तुमसे आखिरी मुलाकात...
हर पन्ने पर भीगे मिले लफ्ज़...
तन्हा मिला हर लम्हा हर जज़्बात...
बस...तुम नहीं थी...
खुली थी चुपचाप खड़ी अलमारी...
बिखरे कपड़ों की तहों में...
उलझे मिले कई संवाद...
बस तुम नहीं थी...
बाल्कनी में खामोश बैठी थी ...
तुम्हारे बिना... पिछले हफ्ते खरीदी कुर्सी...
बाट जोह रही थी...
मेरे इंतज़ार के साथ...
बस तुम नहीं थी...
सुबह होने का अहसास कराती....
नहीं थी ओस की बूंदों सी जगमगाती तुम्हारी कोई बात...
तुम्हारी शरारती नज़रों को ढूंढते रहे अहसास....
पर ...तुम नहीं थी...
रह रहकर गूंजती रही तेरी खनखनाती हंसी...
तेरे ख्याल से जब करनी चाही बात...
होठों में उलझ कर रह गए अल्फाज़...
हां ...तुम नहीं थी...
बस है तुम्हारी याद...
बस है तुम्हारी याद...
रविवार, 26 जुलाई 2009
बाबा के दर्शन...औऱ घर वापसी

सुबह जब आंख खुली तो एक अरसे बाद या कुछ यूं कहें कि बहुत अच्छा महसूस हुआ... ये सुबह वाकई सुबह की तरह थी... नीला आसमान... सूरज के आने के आभास से शर्माया सा... देख कर वाकई ऐसा लगा कि ... ये नया रंग कौन सा है... खैर... इसके बाद नज़र पड़ी चारपाई की बगल में रखी मेज़ पर... वहां रखी थी कोल्डड्रिंक की एक खाली बोतल... रात का सफर फिर से दिमाग में ताज़ा होने लगा तो याद आया कि रास्ते में एक दुकानवाले को कहा था माज़ा दे दो... तो उसने एक बोतल थमा दी... अब ना तो लाइट थी और ना ही कोई दूसरी रोशनी... लिहाजा चुपचाप गटागट पी भी गए... स्वाद भी कुछ जाना-पहचाना सा ही लगा । उसी बोतल को जब रोशनी में देखा तो उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था... जयंती कोला... Be Indian Buy Indian . आसपास पूछा तो पता चला कि भई यहां तो यही ब्रांड मिलता है। हम तीनों भाई एक दूसरे की शक्लें देखकर हंस पड़े और तुरंत उठ खड़े हुए।
सुबह-सुबह का वक्त था लिहाजा दिशा-मैदान के लिए निकल पड़े । एक अर्सा हो चला था इस तरह खेतों की तरफ मुंह उठाए चले... सब कुछ एकदम परफेक्ट था... आसमान जितना नीला होना चाहिए उतना ही नीला और साफ था... ना कम ना ज़्यादा... हरियाली भी एकदम सुकून देने वाली फिर चाहे वो मन हो या आंखें... दूर-दूर तक नज़र आते खेत...और उन खेतों का सदुपयोग करते लोग। हम भी उन्हीं में जाकर शामिल हो गए।
सुबह की हमारी इस सैर में करीब एक घंटा लग गया। अब हम जल्दी से तैयार होकर निकल पड़े। करीब डेढ घंटे का सफर था और रास्ता बेहद खूबसूरत... कहने को राजस्थान लेकिन हरियाली जैसे दिल को छू गई। गांव की सुबह क्या होती है...इस सफर ने एक बार फिर से वो यादें ताज़ा कर दीं।
खाटू धाम जाते हुए रास्ते में पड़ता है रींगस...जो सबसे पास का रेलवे स्टेशन भी है। रींगस से जब हम खाटू धाम की तरफ निकले तो रास्ते में अनेकों श्रद्धालु मिले जो पैदल ही बाबा के दर्शनार्थ खाटू धाम की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। वक्त तो सुबह का था लेकिन धूप और गर्मी पूरे जोरों पर थी... ऐसे में नंगे पांव तपती सड़क पर चलना... ये सिर्फ भक्त और भगवान ही समझ सकते हैं। ...
जैसे-जैसे हम खाटू धाम के नज़दीक पहुंच रहे थे... धड़कन की रफ्तार बढ़ने लगी थी... औऱ जैसे ही खाटू धाम के द्वार पहुंचे... नतमस्तक हो गए। आस्था का अहसास...वाकई शब्दों में उसका वर्णन संभव नहीं है। इंसान अच्छे-बुरे सभी पलों ...सभी कर्मों को बरबस ही याद कर उठता है... और फिर ईश्वर से मांगता है इंसाफ... ऐसा इंसाफ जिसमें फैसला सुनाने से पहले उसकी जिंदगी के सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाए... और यकीन मानिए ...ऐसा होता भी है।
खाटू नगरी है श्याम बाबा की... भीमपुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की... जिन्हें खुद भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि कलियुग में उन्हें मेरे नाम यानि श्याम नाम से पूजा जाएगा। धर्म की रक्षा के लिए अपने शीश का दान करने वाले वीर बर्बरीक...यानि श्याम बाबा को शीश के दानी भी कहा जाता है। वीर बर्बरीक ने हारे का सहारा बनने की प्रतिज्ञा की थी... औऱ जब वो अपनी इस शपथ के साथ महाभारत के युद्ध में पहुंचे को उस वक्त पलड़ा पांडवों का भारी था... श्रीकृष्ण ये अच्छी तरह जानते थे कि अगर वीर बर्बरीक मैदान में उतरे तो फिर पांडवों की हार निश्चित है... लिहाजा धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने वीर बर्बरीक से शीश का दान मांगा जो उन्हें मिला भी... और साथ ही वीर बर्बरीक को मिला श्याम नाम...
इन्हीं श्याम बाबा की नगरी में जब एक अर्से बाद मैं पहुंचा ...सब कुछ जाना-पहचाना सा ही लगा। जल्दी से हम तीनों भाई श्याम कुंड पहुंचे... यहां भी भक्तों का तांता लगा हुआ था... बच्चे तो बच्चे बड़े भी श्याम कुंड में अठखेलियां कर रहे थे... गर्मी का मौसम...उस पर कुंड का शीतल जल... औऱ भक्तिमय माहौल...रह-रहकर लगते जयकारे....निकलने का मन ही नहीं कर रहा था... लेकिन वापस भी तो लौटना था...स्नान के बाद हम सीधा पहुंचे श्याम बाबा के दर्शनार्थ... कहते हैं कि मेले के दौरान खाटू में पग धरने भर जगह भी नहीं मिलती है... जब इस वक्त इतनी भीड़ थी... तो मेले के वक्त का अंदाजा हमें खुद ही लग गया। बच्चे...बूढ़े...जवान... सभी के होठों पर श्याम नाम...
आराम से बाबा के दर्शन हुए... इतनी देर से बुलाने के लिए ज़रा सी शिकायत औऱ फिर से जल्द बुलाने की कामना ... भक्त और भगवान के बीच इतना संवाद अक्सर बिना किसी औपचारिकता के हो जाया करता है... दर्शन...फरियाद औऱ परिक्रमा करते हुए हम सभी मंदिर से बाहर आ गए ...जहां से हम पुराने श्याम मंदिर की ओऱ बढ़ चले। यहां भी इत्मिनान से बाबा के दर्शन हुए।
दर्शन के बाद हम बाज़ार में आ गए औऱ घर ले जाने के लिए वो सब चीज़े ढूंढने लगे जिनकी लिस्ट घर से निकलते वक्त मुंहजुबानी थमाई गई थी। लॉकेट...कड़ा...तस्वीरें...किताबें... भजनों की सीडी... सब कुछ हमने जल्दी...जल्दी ढूंढा। एक बार फिर से जाकर दुकान से प्रसाद भी लिया।
मन तो कहां करता है लेकिन घर भी लौटना था... लिहाजा एक बार फिर से हम सभी बाइक्स पर सवार हुए और चल पड़े... जल्दी बुलाने की फरियाद और जल्द लौटने के वायदे के साथ... श्याम बाबा का आशीर्वाद लिए हम बढ़ चले।
भाई के मित्र को वापस उसके गांव जुगलपुरा छोड़कर हम लोग अपने रास्ते बढ़ चले। औऱ हां... खाना तो जुगलपुरा में खाना ही पड़ा। हमनें कितना कहा कि अब देर हो रही हो...लेकिन खाने के लिए कभी देर नहीं होती। ...खैर... वापसी का सफऱ भी इतना आसान ना था... धूप कड़ाके की थी... औऱ सूरज एकदम सिर पर...ऊपर से बेरहम लू के थपेड़े।
रास्ते में वही अरावली की पहाड़ियां मिली जो रात के वक्त बेहद खूबसूरत नज़र आ रही थी... लेकिन इतनी कड़ी धूप में वो भी तन्हा ...बेजान नज़र आईं... दिन की रोशनी में उनका अकेलापन साफ नज़र आया। हां कई जगह इन्सानों ने उनका ये अकेलापन मिटाने की कोशिश जरुरन उससे दर्द कम नहीं हुआ...बल्कि और बेपर्दा हो गया। इतना ही नहीं अरावली की इन पहाड़ियों को साक्षर बनाने के लिए जगह-जगह लोगों ने विज्ञापन लगाकर कोशिश भी की ...लेकिन इससे अकेलापन तो दूर नहीं हुआ अलबत्ता खूबसूरती पर पैबंद जरुर लग गए।
गर्मी पूरे शबाब पर थी... लिहाज़ा पूरी सावधानी बरतते हुए हम भी आगे बढ़ते रहे। जगह-जगह रुककर पानी पीते रहे... आराम करते रहे। घर पहुंचने से पहले मामा के गांव भी जाना था और जब हम वहां पहुंचे तो नज़ारा देखने लायक था। बचपन की याद ताज़ा हो आई... घर में बच्चे ही बच्चे... नाना-नानी... मामा-मामी और ढेर सारी मौसियां...सभी से मिलकर बहुत खुशी हुई...शाम होती जा रही थी...हम फिर से निकल पड़े...दिल्ली अभी दूर थी।
हालांकि अब गर्मी से परेशान होने की जरुरत नहीं थी... तेज़ी से अंधेरा होता जा रहा था...पर अब मैं आराम से बाइक चला रहा था अंधेरे की परवाह किए बगैर। भाई को गुड़गांव छोड़ा और फिर से बाइक दौड़ा दी दिल्ली की तरफ... सफर इतना लंबा हो चला था कि अहसास जैसे खत्म हो गया था... बस अब जल्दी थी जल्द से जल्द घर पहुंचने की... इंतज़ार वहां भी लंबा हो चला था... अहसास तब जागा जब घर पहुंचे... एक इत्मीनान सबके चेहरे पर था... औऱ एक विश्वास भी ...
गुरुवार, 9 जुलाई 2009
बाबा का बुलावा ...
रात अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी... और हमारी रफ़्तार पर सड़क कभी-कभार जैसे ब्रेक से लगा देती थी । रास्ता एकदम अनजान... और रात के इस पहर एकदम सुनसान...वीरान... अंधेरी सड़क पर सावधानी से आगे बढ़ते रोशनी के दो बिंदु... औऱ सन्नाटे में सबको अपने गुजरने का अहसास कराती थकी-हारी दो बाइक्स औऱ उन पर आढ़े-टेढ़े होकर बैठे तीन जवान , यानि मैं औऱ मेरे दो भाई ।