गुरुवार, 29 अगस्त 2013
राजनीति की प्याज़
शनिवार, 24 अगस्त 2013
" तू क्या करेगा "
सोमवार, 19 अगस्त 2013
........................ रिपोर्ट का इंतज़ार है ........................
**************************** DISCLAIMER ****************************
एक छोटी सी कहानी है जो हम बचपन से सुनते हुए आए हैं लेकिन कमबख्त पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं लेती है ...
हर बार एक नए कलेवर और एक नए फ्लेवर के साथ सामने आ जाती है इतराती हुई ...
चाहे मामला कितना ही संजीदा क्यों ना हो ।
इस कहानी की मासूमियत और मार्मिकता बरकरार रहती है , पात्रों,सुपात्रों या कुपात्रों से नहीं इसकी ये विशेषताएं तथाकथित संलिग्न भावों से उपजी हैं ।
बरसों पुरानी कहानी का ये रेट्रो- रीमिक्स एक खरपतवारी सोच का नतीजा है और लेखक के मानसिक दीवालिएपन का द्योतक है लिहाजा इसे ' जैसा है वैसा है ' की श्रेणी में रखा जाए ।
(अरे जैसा नीलामियों में होता है मानसिक - आर्थिक कंगलों ) ...
और इस कपोल कल्पना को अन्यथा तो कतई ना लिया जाए और इसका किसी भी धर्म-संप्रदाय या फिर किसी व्यवसाय से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है ।
शेर बहादुर की शानो-शौकत पहले जैसी ही बरकरार थी । वही रौब-वही रुतबा ... जीने का वही अंदाज़ । अब आप वजह भी जानना चाहेंगे , और आपको जानकर ये कतई आश्चर्य नहीं होगा कि लोकतंत्र में एक तंत्र के मुताबिक हुए चुनावों में जनाब शेर अब निर्विरोध जंगल के मुखिया चुन लिए गए थे।
हालांकि चुनाव पूरे नियम कायदों के अनुसार हुए थे, जंगल में गठित चुनाव आयोग की सरपरस्ती में सैकड़ों गौरैयों का झुंड चुनाव पर्यवेक्षक बना इठला रहा था । पुराने जमाने के एक रीछ ने जरुर बालहठ में महाराजा शेर के सामने चुनाव मैदान में अंत तक डटे रहने का फैसला किया था लेकिन सठियाने की उम्र में वो वो अपनी जमानत जब्त करा बैठे थे । बाकी सभी कैंडिडेट्स को शुरु में ही मैनेज कर लिया गया था ।
शेर के चमचे सियार और गीदड़ पहले से रही आस-पास के मानवीकृत गांवों से चुनावों को मैनेज करने की सारी डीटेल जुटा चुके थे। जमकर बूथ-कैप्चरिंग हुई... चुनाव जीतने के तमाम हथकंडे अपनाए गए ... हर संभव वादे जंगल की जनता के साथ किए गए । और इसका नतीजा ये निकला कि महाराज शेर लोकतांत्रिक तरीके से भी जंगल के राजा बन गए । सर शेर बहादुर की गिनती अच्छे नेताओं में की जाती थी, एक कुशल शासक बनने के तमाम गुण उनमें सकुशल विद्यमान थे लेकिन ना जाने क्यों चुनाव होते ही सत्ता संभालने के बाद उन्होंने इस प्रकार के सभी दुर्व्यसनों से किनारा कर लिया ।
अब हर तरह के सौदों ... डील्स ... टेंडर्स के रास्ते उनके दीवान-ए-खास वाले ड्राइंगरुम से निकलते थे तो उनके दुश्मनों के लिए रास्ते... उनके किचन से । अरे भाई शेर आखिर शेर ही होता है ना और जंगल का राजा शेर भूखा मर जाएगा लेकिन घास नहीं खाएगा।
हुआ यूं कि जब जंगल में लोकतंत्र की स्थापना हुई तो सारे सेटअप का गहन अध्ययन किया गया और उसे ज्यों का त्यों अपनी सहजता और स्वभाव के अनुरुप अपना लिया गया । अब सबके लिए समान अवसर थे, सहूलियत के साथ भी और सहूलियत के बाद भी। लिहाजा कहीं बिल्ली बाबू बनी तो बकरी अफसर। कुत्ता कहीं सिक्योरिटी गार्ड था तो तोता डॉक्टर बना । हाथी को जंगल के म्यूनिसिपल डिपार्टमेंट में बुलडोज़र की नौकरी मिल गई थी । तो ऊंट फायर डिपार्टमेंट के चीफ थे, क्यों... पता नहीं । खरगोश डाक विभाग में लगा दिए गए थे। जंगल की देखभाल का जिम्मा चील-कौवों के हवाले था तो ट्रैफिक विभाग हिरण ने संभाला हुआ था। चील, बाज़ और कौवे क्रमश: पुलिस, इंटेलिजेंस और होमगार्ड में शामिल कर लिए गए थे।
जंगल में समयानुरुप सुशासन की बयार बह रही थी और जंगल की जनता ने भी जीने के इसी खांचे में खुद को ढाल लिया था ।
बकरी बहादुर जरुर थी लेकिन उसमें व्यवहारिकता का घोर अभाव था, बकरी के कर्तव्य निर्वाहन की हर संभव मंच पर मीमांसा की गई और उसे प्रशासनिक तौर पर अक्षम घोषित कर दिया गया । हालांकि जंगल का एक तबका बकरी के साथ भी था लेकिन बकरी को सबक सिखाना अब जरुरी हो चला था ताकि भविष्य में कोई इस तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था का गलत इस्तेमाल कर नाहक ही जंगल समाज के सम्मानित लोगों को परेशान ना कर सके ।
*** बकरी पर ये आरोप भी लगाया गया कि उसने सियार के साथ हाथापाई की और उसे बाद में देख लेने की धमकी भी दी । सियार के साथ उस वक्त मौजूद रहे 10 लोगों में से 9 इस मामले में चश्मदीद गवाह हैं जिनमें दो नेत्रहीन भी शामिल है और एक गवाह अफसर बकरी के डर से जान बचाकर कहीं छुपा बैठा है ।
*** आरोप है कि बकरी ने अफसर होने के नाते अपने कट की भी मांग की और मांग के पूरा ना होने पर बदले की भावना से इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया जिससे ... गलत धंधों के सही बंदे ... बेहद परेशान हुए।
*** बकरी पर आरोप है कि उन्होंने मामले में कार्रवाई करने से पहले आला अधिकारियों से सलाह लेना उचित नहीं समझा और हेडक्वार्टर से आदेश मिलते ही तुरंत कार्रवाई को अंजाम दे डाला।
*** साथ ही बकरी पर ये भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने सिस्टम के खिलाफ जाकर पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया। ये सारा काम एक सिस्टम के तहत पहले सुचारु रुप से होता था लेकिन बकरी ने अमानवीय एवं गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए सिस्टम का पूरा बैलेंस चौपट कर ही डाला जिससे कई बैंक बैलेंस बिगड़ गए।
अगर है तो क्या है ?
मसला व्यक्ति का है या व्यवस्था का ...
अब ये तो साहब आपको जांच रिपोर्ट के आने तक इंतज़ार करना पड़ेगा कि सच क्या है और उस सच के आधार पर क्या फैसला होता है ...
अब सिस्टम में रहेंगे तो सिस्टम को तो मानना पड़ता है ना बॉस ...
इंतज़ार कीजिए ...
हमें भी है ... आप भी कीजिए ...
शुक्रवार, 16 अगस्त 2013
आज़ादी का अहसास
सुबह जाने क्यों आज अलसाई सी थी, कमबख्त नींद को भी पता था कि आज छुट्टी का दिन है । छुट्टी का दिन... तमाम रस्मों - रिवाज़ों , तमाम औपचारिकताओं के साथ लोगों की मानसिकता एक छुट्टी के दिन सरीखी हो गई है ।
15 अगस्त 1947 ... जाने कितनी आंखों ने इस दिन का इंतज़ार किया होगा... कितनी आंखें इस दिन के दीदार की ख्वाहिश लिए ही बंद हो गई होंगी... जाने कितनी आंखों ने इस दिन का सपना देखा होगा । और फिर कितनी ही आंखों ने इस सपने को पूरा होते हुए देखा होगा । उस सपने को जिसे आज हम जी रहे हैं, मना रहे हैं... आज़ादी के इस दिन को।
ना ना ... घबराइए नहीं, मैं एक्सट्रा इमोशनल नहीं हूं ... इस पर मैं अपना स्टैंड पहले ही क्लीयर कर चुका हूं ।
इस राष्ट्रीय पर्व के दिन जब बाकी तमाम लोग अलसा रहे हैं, और मैं... मैं तैयार हो रहा हूं ऑफिस जाने के लिए।
जी ... मेरी छुट्टी नहीं है... मुझे ऑफिस जाना है । क्यों, ये मत पूछिए। बता नहीं पाउंगा, इसलिए कोशिश भी मत कीजिएगा और फेस टू फेस तो कतई नहीं । और इस वक्त घड़ी में क्या बजा है ये पूछने की भूल बिल्कुल मत कीजिएगा, क्यों !!! सर जी , " जाके पैर ना फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई " ।
खैर... घर से बाहर पहला कदम रखते ही कुछ बूंदों ने हौले से स्वागत किया, याद आया बचपन से ही तो सुनते आएं हैं...15 अगस्त को बारिश जरुर होती है। आज़ादी का दिन... इतनी खूबसूरत शुरुआत... और ऑफिस तक का सफर उससे भी ज्यादा खूबसूरत। साफ-सुथरी , बारिश से धुली हुई लगभग खाली सी सड़कें । जगह-जगह तैनात जवान... कहीं बैरिकेडिंग, कहीं पैदल गश्त... कहीं मोटरसाइकिल से पैट्रोलिंग, तो कहीं सायरन बजानी पुलिस की गाड़ियां। कार सिर्फ बैरिकेड्स पर रुक रही थी या फिर सिग्नल्स पर, इसके अलावा तो लगा जैसे सालों पुरानी दिल्ली वापस से लड़कों पर लौट आई हो ( सड़कें हालांकि बेहतर , लेकिन भीड़ नदारद)
हां यमुना बाज़ार पर जरुर ब्रेक लगाने पड़े ... कुछ सज्जन वहां रोज़ की ही तरह दीन-दुनिया से बेखबर सड़क पार कर रहे थे, आप वक्त रहते देख पाएं तो आपकी किस्मत नहीं तो ...
आज कोई रॉन्ग साइड से गाड़ी नहीं चला रहा था... बीच फ्लाई ओवर पर कहीं भी ट्रक-टैम्पो रोक कर कागज़ों की जांच-पड़ताल नहीं हो रही थी ।
आज सभी लोग ट्रैफिक सिग्नल्स को फॉलो कर रहे थे। हैरानी हुई ना सुनकर , आज़ादी का दिन औऱ लोग नियम-कायदों से चल रहे थे ।
आपने वो टैम्पो जरुर देखे होंगे ... ( रिंग रोड पर या फिर वो शहर का कोई भी हिस्सा हो सकता है) जो सुबह-सुबह तेज़ रफ्तार से आपके सामने से निकल जाते हैं , जिनमें ठूंस-ठूंसकर मुर्गे भरे होते हैं, पिंजरे में कैद मुर्गे रोज़ मिलते जरुर थे लेकिन बताते नहीं थे कि मंजिल कहां हैं । रुटीन में बदलाव था, आज शायद वो भी आज़ाद थे, वो टैम्पो कहीं नहीं थे और ना ही वो स्कूल वैन्स जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी कुछ उसी तरह से ठूंसे गए होते हैं। पीले रंग वाली वो स्कूल बसें भी नहीं थी जो पूरी सड़क के किसी भी हिस्से पर उसी रफ्तार से चलती है जो ड्राइवर की मर्जी होती है और जिनके पीछे बड़े करीने से लिखा होता है कि " अगर मैं गलत या खतरनाक तरीके से गाड़ी चला रहा हूं तो इस नंबर पर फोन कर बताएं " । जाने कितने ड्राइवर सही ड्राइविंग करते होंगे, कितने लोग फोन करते होंगे और कितने नंबर सही होंगे। टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन की तरह हवा से बातें और स्टंट करते वो बाइक सवार कहीं नहीं थे ।
आज छुट्टी होती है, लिहाजा ऑफिस में बॉस लोग अमूमन नहीं आते हैं, बाकी उनकी मर्जी , अरे बॉस हैं भई।
आज़ादी का दिन है वो मना सकते हैं तो हम भी मना सकते हैं । कैसे और कितना ??? ये भी मत पूछिए और फेस टू फेस तो बिल्कुल नहीं ।
इन सब के बीच लाल किले पर शान से लहराता तिरंगा... और स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल हज़ारों लोग। आसमान से छलकती ओस सी बूंदों सी बारिश की फुहारें और और बादलों के पार जाते सैकड़ों-हज़ारों रंग बिरंगे गुब्बारे। चप्पे-चप्पे पर मुस्तैद जवान ... औऱ संगीनों के साए में मनाया जाता आज़ादी का ये दिन। पुरानी दिल्ली इलाके में ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार करती हर रंग हर आकार प्रकार की पतंगें और उड़ने को बेताब बैठे मुंडेरों पर सफेद रंग के कबूतर।
सच ! कुछ खास ही होता है आज के दिन का अहसास...
आज़ादी का अहसास...
सुरक्षा का अहसास ...
हवाओं में घुला खुलापन...
भीगी-भीगी सुबह की नमी का अहसास...
और हां...
दिल्ली में रहने का अहसास ...
देश की राजधानी ...
हमारी दिल्ली, साफ-सुथरी दिल्ली, स्वच्छ दिल्ली... सुरक्षित दिल्ली
काश ये सभी अहसास एक साथ हमेशा के लिए रह पाते । किसी अहसास पर कभी कोई अलर्ट हावी हो जाता है, तो कुछ अहसास रोज़ाना की भीड़भाड़ में कहीं खो जाते हैं ... हम से ज़्यादा हमारा ये शहर इन सब का आदी हो चुका है , इन अहसासों के खो जाने का ... लेकिन आज़ादी का दिन है, और इससे बड़ा अहसास क्या आप सुझा सकते हैं... इस अहसास की कीमत हम चाहकर भी नहीं चुका सकते लेकिन हां इसे संजो कर रख सकते हैं, सहेज कर रख सकते हैं... हमेशा के लिए... हर कीमत पर ...
बुधवार, 7 अगस्त 2013
. . . मैं एक्सट्रा इमोशनल नहीं हूं . . .
मंगलवार, 6 अगस्त 2013
सावधान ... बयानों में गुम हैं समाधान
शुक्रवार, 26 जुलाई 2013
पांच रुपए की प्लेट...गरीब खाए भरपेट
तू क्यों खुद को गरीब बताता है
जब 5 रुपए में तेरा पेट भर जाता है
" आप हाईप क्रिएट करते हैं...
मैं तो बीमार हूं
मेरा काम तो 5 रुपए से भी कम में चल जाता है ... "
2 रुपए में तेरा खाना हो जाता है
फिर क्यों गरीब गरीब चिल्लाता है
" ये दिल्ली है दिल्ली ...
यहां हर चीज़ का जुगाड़ हो जाता है "
पेट तो 1 रुपए में भी भर लो
ना भरे तो 100 रुपया भी कम पड़ जाता है
" अपनी औकात से बाहर जाकर...
क्यों तू अपनी भूख बढ़ाता है "
सपनों का शहर है मुंबई
12 रुपए में मिलता है भरपेट भोजन
महंगे सपने और सस्ता खाना
" चौंको मत ... पेट की सोच "
तू अपना दिमाग क्यों चलाता है
33 रुपए तो बहुत होंगे तेरे गुजारे के लिए
अब इससे ज्यादा तू और क्या चाहता है
वो विरोधी दल का है
उसकी बातों में क्यों आता है
आटे-दाल का भाव पता है मुझे
तू गरीब है
" सिर्फ अपना घर चलाता है
नेता की भी जिम्मेदारी समझ
नेता तो पूरा देश चलाता है... "
और गरीब
वो तो कुछ समझ ही नहीं पाता है
" गरीब "
चुनावों के वक्त सबको याद आता है
वोट मांगने के वक्त
हर कोई गढ़ता है नई परिभाषा
हर कोई उसे अपना बताता है
लेकिन
गरीब जब भूखा होता है
तो उसे खाना खिलाने कोई नहीं जाता है
गरीब जब भूखा होता है
तो उसे खाना खिलाने कोई नहीं जाता है ...
शनिवार, 20 जुलाई 2013
अरसे से जैसे कुछ पता ही नहीं ...
अरसे से जैसे कुछ लिखा ही नहीं...
वक्त गुजरता रहा यूहीं बेसाख्ता...
अरसे से जैसे ...
... हमने जिया ही नहीं...
अखबार रद्दी बनते रहे...
धूल फांकती रहीं किताबें...
दोस्त फेसबुक पर मशगूल रहे...
कि ट्विटर,
थोड़ा सब्र कर ...
तुझे अभी समझा नहीं...
फिल्मों सरीखी चल रही है सांसें...
इंटरवल पता नहीं...
...है नहीं या हुआ नहीं...
मोबाइल पर मिलते रहते हैं
हर आम और खास के अपडेट
लेकिन
मेरा प्रोसेसर तो मेरे लैपटॉप सरीखा है...
आउटडेटेड हो गया...
और हमने अपडेट किया नहीं...
जिंदगी से निकलते जा रहे हैं इमोशंस
ताकि गैजेट्स और एप्स काबिल साबित हों
( मुझे तो ये MNC की साजिश लगती है)
खैर
" जिंदगी से निकलते / निकाले जा रहे हैं इमोशंस
ताकि गैजेट्स और एप्स काबिल साबित हों "
हम खर्च कर बैठें हैं सारे लम्हें...
कि हमारी जेबों में कुछ बचा ही नहीं...
खरीद लेता था कभी कभी
शौकिया कुछ पत्र-पत्रिकाएं
मजमून देखकर उसके स्टॉल से
एक अरसा हुआ
अपने अखबार वाले तक से मैं मिला नहीं ...
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
क्या लिखते हो ...
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है
चढ़ाता है वो चेहरे पर मुखौटे...
मुस्कान का मुलम्मा ...
हर रोज़ बदल जाता है
अफसोस ... ये सच है
वो इंसां तक नहीं रह पाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
मर जाता है आंखों का पानी ...
ज़मीर की बेपर्दगी...
वो नज़रअंदाज़ किए जाता है ...
बिना रीढ़ के वो घिसटता है...
अक्सर अपनी ही नज़रों में गिर जाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
बातों में राजनीति ...
हर पहलू में उसे शक नज़र आता है ...
हर आईना उसे धूर्त लगता है ...
वो खुद को पहले से ज़्यादा मक्कार पाता है ...
सोच की कंगाली मतलब क्या है ...
वो ये सोच ही नहीं पाता है...
एक घिसटने वाले जंतु के समान ...
वो तो बस लिजलिजा सा ... और घिनौना हुए जाता है ...
उसकी अप्रोच अब सैडिस्ट है ...
दूसरों के सुख ... अब वो बर्दाश्त नहीं कर पाता है ...
अब वो नौकरी को जीता नहीं है...
उसे जस्टीफाई करने में जुट जाता है ..
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
हां ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
कुछ की नियति ये कतई नहीं है ...
लेकिन जो निकृष्ट हैं...
आप गौर कीजिएगा ...
आदमी का इंसां ना रहना ...
उनकी किस्मत बन जाता है ...
मुझे अफसोस है ... मगर सच ...
वो कितना बेगैरत हो जाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...