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बुधवार, 8 जुलाई 2015

एक दिन की ज़िंदगी ...



सिर्फ एक दिन की ज़िंदगी...

एक दिन की ज़िंदगी में ही उसने ज़िंदगी की हकीकत समझ ली।

आंखें खोलने से पहले ही उसे क्या-क्या नहीं देखना पड़ा।

उसे ज़िंदा रखने की कोशिश में मां-बाप को पल-पल मरते देखा।

उसे ज़िंदा रखने की कीमत लगी, जो उसके मां-बाप नहीं दे पाए।

मालूम हुआ एक अस्पताल ने नवजात की ज़िंदगी की एक दिन की कीमत लगाई 10,000 रुपए। अस्पताल के लिए शायद कोई बहुत बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन उस मासूम की ज़िंदगी इस रकम के सामने बहुत मामूली थी। मां ने महीनों उसे कोख में रखा, पिता ने भी उतना ही इंतज़ार किया...
इंतज़ार के उन लम्हों में सांसों के हिसाब से उन्होंने अपने आने वाले बच्चे के लिए सपने भी देखे, लेकिन कोरे सपनों से क्या होता है... सपने नींद में ही अच्छे लगते है, जागती आंखों के सपनों के लिए इस दुनिया में पैसों की जरूरत होती है।
उनकी जेब में पैसे नहीं थे लेकिन गोद में मन्नतों से मांगा हुआ मासूम  ज़िंदगी की बाट जोह रहा था, वो जो उनके सहारे इस दुनिया में आया था... अपनी औलाद को अपनी आंखों के सामने वो मरता हुआ कैसे देखते।
लेकिन उस निजी अस्पताल के लोग भी आखिर इंसान थे, पत्थर-दिल नहीं...
बेशक पैसा देने में असमर्थ इस परिवार के प्री-मैच्योर बच्चे को ज़िंदा रखने की उन्होंने कीमत लगाई हो...
बेशक एक दिन के उस नवजात की ज़िंदगी और उसके बिलखते मां-बाप के आंसुओं के आगे उनका दिल नहीं पसीजा...
लेकिन अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर हद दर्जे तक आशावादी और भाग्यवादी निकले। पैसे नहीं हैं पास में तो क्या हुआ, ज़िंदा रखने की कीमत नहीं चुका सकते तो क्या हुआ, उन्होंने उसे ज़िंदा रखने की कोशिशों में कोई कमी नहीं रखी, एक अदद एंबुलेंस को बुला कर उन्होंने उस नवजात को परिवार के साथ रवाना कर दिया, दिल्ली के अस्पतालों की खाक छानने के लिए। उन्हें आशा थी कि ये बच्चा अपने भाग्य के सहारे जि़ंदा रहेगा।
प्री-मैच्योर बच्चा भाग्य की इसी डोर के सहारे फिर दिल्ली के जाने-माने अस्पतालों के चक्कर काटने लगा। सबसे पहले उसे कलावती अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके भाग्य में इलाज होना नहीं लिखा था, लिहाजा वहां उसका इलाज नहीं हुआ। इसके बाद कैट्स एंबुलेंस उस नवजात को लेकर आरएमएल अस्पताल पहुंची। लेकिन यहां भी इलाज उसके नसीब में नहीं था। इलाज के नाम पर यहां भी निराशा हाथ लगी, एक दिन की ज़िंदगी पूरी कोशिश कर रही थी... एक मुकम्मल ज़िंदगी हो जाने के लिए।
आरएमएल के बाद एंबुलेंस दिल्ली की भीड़भाड़ को चीरती हुई एलएनजेपी अस्पताल पहुंची, पहले यहां भी इलाज के नाम पर इंतज़ार मिला और ये इंतज़ार फिर लंबा होता गया... और एक कभी ना खत्म होने वाले इंतज़ार में बदल गया।
एक दिन की ज़िदगी अपने हिस्से की ज़िंदगी जी चुकी थी। राजधानी के अस्पताल उसे इस दुनिया में नहीं रोक पाए। एक अस्पताल ने उसकी जिंदगी की कीमत हैसियत से ज़्यादा लगा दी। तो दूसरे अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते वो एक ' मैटर ' बन गया, जिसकी जांच अस्पताल प्रशासन अब कर रहा है और पता लगते ही हमें बता दिया जाएगा। बच्चे को शायद सॉरी कह दिया जाएगा, क्योंकि अब अस्पताल इस मैटर को उसे समझा नहीं पाएगा।
एक दिन की ज़िंदगी के अपने आखिरी पड़ाव तक जाते -जाते नवजात एक ' पेशेंट ' बन चुका था, और वो गलत गेट पर इलाज का इंतज़ार कर रहा था, जहां इलाज के इंतज़ार में उसके हिस्से की सांसें खत्म होते-होते उसका साथ छोड़ गईं...
एक दिन की ज़िंदगी ...जि़ंदगी को कई सबक सिखा गई। पहले दो अस्पताल जहां उस नवजात को ले जाया गया वो केंद्र सरकार के अंतर्गत आते हैं, फिर उस नवजात ने जहां आखिरी सांस ली...वो अस्पताल दिल्ली सरकार के अधीन है।
ये वैसे तो सार्वजनिक जानकारी का हिस्सा है...
लेकिन इलाज के लिए जाते समय कौन ये सोचता है कि कौन सा अस्पताल किस सरकार के अंतर्गत आता है।
पर यकीन मानिए ये एक बहुत जरूरी तथ्य है जो आज मुझे टेलीविज़न के माध्यम से पता चला।
मगर अफसोस ये जानकारी उस नवजात के पास नहीं थी... 

रविवार, 7 जून 2015

LIFE AFTER MAGGI . . .

Dear Maggi . . .



. . . जिंदगी कब करवट बदल ले पता ही नहीं चलता। पिछले कुछ दिन जितने तुम पर भारी रहे हैं यकीन मानो किसी आदत को एकदम से छोड़ देना भी उतना ही कष्टकारी है।
पहले तो भरोसा ही नहीं हुआ, कि दो मिनट में तैयार हो जाने वाली मैगी का भरोसा भी दो ही मिनट में टूट जाएगा। हालांकि सब जानते हैं, ना तो तुम दो मिनट में तैयार होती हो और ना ही ये सारा खेल दो मिनट में सिमट जाएगा। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है... चलने दो। 
अगर तुम्हारा दामन पाक-साफ है तो फिर तुम्हें कोई छू भी ना पाएगा, अगर किसी ने तुम्हारे खिलाफ साज़िश की है तो भी भरोसा रखो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। औऱ अगर ये तुम्हारा अस्तित्व मिटाने का खेल है तो भी भरोसा रखो। झूठ के पांव नहीं होते हैं... और यकीन मानो सच हमेशा सच ही रहता है।
लेकिन हां... अगर तुमसे गलती हुई है तो उसे स्वीकार करो, पूरी जिम्मेदारी के साथ। भरोसा रखो, हम हिंदुस्तानी सब माफ कर देते हैं, सब कुछ। हमारी सोच जितनी विस्तृत औऱ संकुचित है समान रूप से हमारा हृदय भी उतना ही उदार है।
स्वाद के साथ अगर तुमने सेहत की तुकबंदी की थी, तो फिर उस पर खरा उतरना था, हालांकि आजकल वायदे कर तो दिए जाते हैं लेकिन उन्हें निभाते वक्त इंसान की हकीकत मालूम होती है, तुम तो फिर भी एक ब्रांड हो ... इतना बड़ा ब्रांड कि उसके आगे वायदे, भरोसा, सेहत... सब अदना सा होता चला जाता है उस इसान की तरह जिसका भरोसा फिलहाल तो टूटा सा लगता है।
कोई कह रहा है कि ये माओं का आलस है जो मैगी घर-घर तक जा पहुंचा... अब बताओ भला।
किसी का कहना है कि साल भर की उसकी मेहनत है जो सेहत से इस खिलवाड़ का खुलासा हो पाया...
कहीं बात हो रही है कि ब्रांड मैगी को मरने नहीं देंगे, ब्रांड क्या इंसान से बड़ा हो गया जी...
कहीं मैगी पर रोक लगा दी गई है तो कहीं उसका स्टॉक वापिस लिया जा रहा है...
कहीं मैगी पर बैन के खिलाफ अर्जी दी जा रही है...
इस बीच स्वदेशी मैगी उर्फ हर्बल नूडल्स की मांग और ब्रांडिंग पूरे शबाब पर है। मांग और आपूर्ति की परिकल्पना यही तो है।
हर्बल मैगी का स्वरूप आखिर कैसा होगा, क्या वही स्वाद होगा, क्या वही हवा में तैरती महक होगी जो आपकी भूख को और बढ़ा देती थी... क्या वही दो मिनट का इंतज़ार होगा। क्या फिर से वो भरोसा कायम हो पाएगा। सेहत और स्वाद का एक होना क्या वास्तव में संभव है या फिर ये एक कवि की कल्पना से भी इतर कोई अस्तित्व है।
पर मैगी... डियर मैगी ... तुम घबराओ मत। हो सकता है बहुत जल्द तुम पर लगे सारे आरोप किसी समझौते या संवाद के तहत खारिज कर दिए जाएं। और एक नए सिरे से सेहत और स्वाद को मद्देनज़र रखते हुए (उम्मीद है) तुम्हारी री-ब्रांडिंग की जाए। और अगर ऐसा नहीं भी होता है तो हम दो मिनट का विकल्प ढूंढने और ठूंसने में तुमसे भी कम वक्त लेंगे। बाज़ार में विकल्पों की कमी नहीं है, कभी-कभी तो विकल्पों की जरुरत और मार्केट दोनों बनाए जाते हैं और साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ अपनाया जाता है, यकीनन तुमने भी किसी ना किसी स्तर पर ऐसा जरूर किया होगा। फिर एक दिन एक नया विकल्प आएगा और हमें पता चलेगा कि जिस विकल्प को हमने तुम्हारी जगह दी थी वो भी उसके कतई लायक नहीं था। फिर हम एक नया विकल्प खोज निकालेंगे।
ये लापरवाही है, गलती है या फिर मुनाफा कमाने के चक्कर में जानबूझकर मानकों औऱ सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया। ये सच तो एक दिन सामने जरूर आएगा।
लेड का स्वाद कैसा होता है, ये हमें पता नहीं मैगी लेकिन उससे नुकसान क्या है ये अब जरूर पता चल गया है, MSG का खेल कैसे खेला जाता है ये भी नहीं पता, लेकिन इन सबकी भरपाई हम कर रहे हैं। स्वाद के नाम पर सेहत भी दे दी...वो भी बस दो मिनट के फेर में।
लोग कह रहे हैं कि हमारे रोज़ाना इस्तेमाल की चीजों में औऱ भी खतरनाक तत्व मिले हुए हैं या मिल जाते हैं या मिला दिए जाते हैं। कहीं कोल्ड-ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड्स की बात आती है, कहीं मिलावटी तेल का मसला है, नालों के पानी में पनपती सब्ज़ियां रोज़ाना खाई-पकाई जा रही हैं, केमिकल्स से पकाए गए फल किसी को कैसे सेहत दे सकते हैं। कहीं अनाज, दालों में आर्सेनिक मिल रहा है, तो कहीं रोज़ अंडे खाने पर भी अब सोचना पड रहा है। जगह-जगह मिलावटी और दूषित खाद्य सामग्री की चर्चा और इस्तेमाल, इंसान मिलावट का शायद आदी हो चला है।
एक तरफ तो मैगी ने उपभोक्ताओं के मन में संशय डाल दिया है तो दूसरी तरफ मैगी पर भरोसा करके उसका प्रचार करने वाले भी नूडल्स के फेर में उलझे नज़र आ रहे हैं। यकीनन बात सेहत और स्वाद की ही रही होगी तभी एक भरोसे के साथ एक भरोसे का प्रचार-प्रसार होता है। पैसा कहीं शामिल नहीं रहा होगा, सिर्फ पैसा मेरा मतलब है, शायद खुद का अनुभव भी प्रेरक रहा होगा। या फिर कोई ऐसा एग्रीमेंट होता होगा जो पैसों में ही लिखा जाता होगा। पैसा यानी मनी... अब यहां भी ब्लैक और व्हाईट खोजेंगे तो मामला बहुत भटक जाएगा। कहीं कोई अमिताभ बच्चन से सफाई मांग रहा है तो कोई माधुरी से मैगी खाने का हर्जाना मांगने पर तुला है। क्या ये सितारे फिल्मों में जो भी कुछ करते हैं आप आंख मूंदकर वो सब अपनी ज़िंदगी में करने लगते हैं, एक आम आदमी की ज़िंदगी में क्या इतनी गुंजाइश होती है। आम आदमी आजकल बहुत जागरुक हो गया है लेकिन ये जागरुकता क्षणिक और भौतिक ज्यादा हो गई है शायद।
किसी उत्पाद के दावों की सत्यता को परखना इन सितारों का काम होना चाहिए या सरकार का। या फिर सभी हमारी ही तरह एक धोखे का शिकार हुए हैं। और ये धोखा यकीन मानिए असली वास्तविकता है, उत्पाद का नाम और धोखे का स्तर शायद बदलता रहता है। अगर इन खबरों में लेशमात्र भी सच्चाई है तो ये भरोसा तोड़ने से भी बड़ा गुनाह है... ये गुनाह एक पूरी पीढ़ी के स्वास्थ्य के साथ है, इस गुनाह की व्यापकता को ज़रा देखिए... एक पूरी पीढ़ी। 

 खुशियों की रेसीपी ... दो मिनट की खुशियों की रेसीपी, कहीं किसी की मां को अपना बनाती रही, और जाने कहां- कहां दो मिनट में खुशिया बनाती रही। हम सबकी मैगी की अपनी – अपनी कहानी रही है, हां भई है बिल्कुल है यकीन मानो, क्योंकि मैगी की एक कहानी मेरी भी है, पर ये ना किसी पैक पर है, ना कभी टीवी पर आई और ना ही किसी को सुनाई गई। ऐसा मैने टीवी पर एक एड फिल्म में देखा था, लेकिन मेरी मैगी की कहानी मेरे पास रही। ये कहानी एक चैनल में काम करने वाले एक प्राणी की थी, जो कभी – कभी घर से लाया हुआ खाना नहीं खा पाता था। खाना जिसे पूरे दो घंटे में तैयार किया जाता था उस खाने के टिफिन पर दो मिनट की मैगी वाकई खुशियों की रेसीपी बन कर आती थी। पूरी शिफ्ट के बाद मैगी खाने में एक अलग ही आनंद आता था, पता नहीं झा जी मैगी में क्या डालते थे (यहां लेड और MSG की बात नहीं हो रही है), दिनभर की सेहत और स्वाद की शायद भरपाई हो जाती थी। झा जी का पूरा नाम क्या है कभी मालूम नहीं हुआ , शायद जरूरत ही नहीं पड़ी ना उन्हें बताने की ना हमें पूछने की। बस उनकी बनाई चाय और मैगी से वास्ता बना रहा। एक दिन उनको भरोसे में लेकर उनकी रेसीपी जानने की कोशिश भी की, और फिर उनके बताए तरीके से खुद का हाथ आजमाया, लेकिन वो स्वाद नहीं आया। 
और ये कोशिश उस दिन तक जारी थी . . . 

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

अस्पताल बदहाल... मरीज़ बेहाल

' अस्पताल ' ...  शब्द अपने आप में ही किसी को बीमार कर देने के काबिल है अगर इससे पहले ' सरकारी '  शब्द और जुड़ा हो
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 ... और ये आम धारणा नहीं है बल्कि अपने अनुभव से भी बता रहा हूं। 
( *** अगर आप किसी एमरजेंसी के शिकार नहीं हैं तो , भगवान ना करे आप कभी हों , अस्पताल चाहे जो भी हो)

बेशक सभी सरकारी अस्पताल ऐसे नहीं है, बेशक ये सिर्फ अस्पताल स्टाफ या सरकार की गलती नहीं है, बेशक मरीज़ों की तादाद ही इतनी है कि सरकारी अस्पतालों का सिस्टम खुद कराह रहा है, लेकिन हम सब कुछ देखकर आंखे मूंदकर तो नहीं रह सकते।

आप एम्स और सफदरजंग की बातें करते हैं लेकिन क्या राजधानी दिल्ली के कोने-कोने में जो अस्पताल हैं या डिस्पेंसरीज़ हैं,  कभी आपका वास्ता उनसे पड़ा है। ... अगर जवाब हां है तो आपसे माफी चाहता हूं कि आपको फिर से वो सब याद दिला रहा हूं ...लेकिन अगर जवाब ना में है तो दुआ करता हूं कि आपको कभी उन अस्पतालों की तरफ जाने की भी नौबत ना आए, जो आपका शरीर बेशक दुरुस्त कर दे लेकिन आपको ज़हनी तौर पर बीमार कर देते हैं।

हाल ही में एक अस्पताल में जाना हुआ जो सरकारी भी था और बीमार कर देने वाला भी । ग़ौरतलब बात ये है कि ये अस्पताल एक स्पेश्लाइज्ड अस्पताल है औऱ आंखों के इलाज के लिए जाना जाता है । ये कोई जनरल अस्पताल नहीं था जहां हर तरह की बीमारी के इलाज के लिए लोग पहुंचते हैं।

अनुभव ही ऐसा रहा कि आपसे जरुर शेयर करना चाहूंगा। 

शुरुआत अस्पताल के मेन गेट से ही हुई। जहां दो गार्ड वर्दी में तैनात थे और एक असिस्टेंट सादी वर्दी में । एक गाड़ी मुझसे पहले ही अदर जा रही थी और दूसरी गाड़ी देखते ही उन्होंने दरवाज़ा करीब-करीब गाड़ी के बोनट पर ही बंद कर दिया और ऊपर से शिकायत भी दर्ज कराई कि मैं उन्हें गाड़ी के बोनट पर बिठा कर ले जाना चाहता हूं । अपने एक परिचित का हवाला देने पर ही अंदर जाने दिया गया नहीं तो वीज़ा ना होने के चलते मुझे शायद वापस लौटा दिया जाता ।

प्राइवेट अस्पताल भले ही पैसे लेकर ... लेकिन पार्किंग की व्यवस्था करा देते हैं लेकिन सभी सरकारी अस्पतालों में ऐसी किसी सुविधा की अपेक्षा आप ना करें तो बेहतर होगा । अगर अपनी गाड़ी से जा रहे हैं तो मेरी सलाह यही है कि गाड़ी उपयुक्त पार्किंग में ही खड़ी करें इधर-उधर नहीं। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो अस्पताल के साथ-साथ आपको थाने के भी चक्कर काटने पड़ सकते हैं । यहां आपकी नज़रें हटीं और वहां आपकी गाड़ी। चोरी नहीं जनाब, एकदम खालिस सरकारी तरीके से सरकारी औऱ प्राइवेट स्टाफ मिलकर आपकी गाड़ी को एक अदद क्रेन की सहायता से ले जाते हैं ।

भले ही आपकी मजबूरी हो ...  "  लेकिण गलती तै गलती सै जनाब ... इब तै या तै थाणे तै अपणी गाडी छुड़ा लियो या फिर कोर्ट तै या फिर  ..." । जी हां ... यही तो होता है ना । 

खैर ... अपन एक बार ये सब बाहर होता देख चुके थे, जब मौके पर मौजूद जनाब ने मुझे भरोसा दिया कि वो मेरी गाड़ी को हाथ तक नहीं लगाएंगे लेकिन कोई दूसरी क्रेन वाला उनके इलाके में आकर गाड़ी ले जाए तो उस हालत में जनाब कुछ नहीं कर पाएंगे । और मेरे देखते ही देखते उन जनाब ने एक से दो चक्करों में वहां खड़ी सारी बाइक्स सुरक्षा के लिहाज़ से थाने में जमा करवा दी और एक गाड़ी के साथ तीसरे चक्कर में वो ऐसा ही कर रहे थे। मैने  कोशिश की औऱ गाड़ी अस्पताल के भीतर पार्क करने में कामयाब रहा ।

दरअसल जान-पहचान के एक सज्जन यहां कार्यरत हैं लिहाज़ा ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती है , काम जहां रुकता है जान-पहचान काम करा देती है , नहीं तो मेरे परिवार वालों के मुताबिक ऐसे किसी अस्पताल की तरफ रुख करना भी मुझे पसंद नहीं। लेकिन ये पसंद हर किसी की तो नहीं हो सकती है । जरुरत और मजबूरी ... पसंद से नहीं ... बेवक्त आते-जाते हैं।

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बाहर से अस्पताल जितना साफ-सुथरा लगा ( जी हां ... सरकारी औऱ साफ-सुथरा) ... भीतर उतनी ही भीड़ और रेलमपेल थी।
त्योहारों के दिनों में आप शायद कभी नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली या फिर निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन गए हों... वहां का हाल आपने देखा होगा ... दमघोंटू भीड़ ... कानों को बहरा कर देने वाला शोर ... बदबू ऐसी कि आप सांस लेने से परहेज़ करें।  कमोबेश यही हाल हर अस्पताल का है... सरकारी अस्पताल का है । होता है या फिर हो जाता है ।


आप अंदाज़ा ही नहीं लगा पाते हैं कि आखिर इतने लोग आते कहां से हैं ... चाहे वो सड़कें हों... रेलवे स्टेशन... बस अड्डे ... मेट्रो ... बसें ... बाज़ार या फिर बेशक अस्पताल ... आखिर इतने लोग ... वो भी इतनी तकलीफ में । ऐसे माहौल में उनका ठीक होना वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है। गलती डॉक्टरों की नहीं है वो भी इंसान हैं। काम का बोझ ही इतना ज्यादा हो कि कभी कभी वो झल्लाहट के रुप में दिखाई दे जाता है।

एक डॉक्टर ने एक मरीज़ को अपना नंबर दिया ताकि कभी जरुरत पड़ने पर वो फोन कर सके। और जितना उनके वार्तालाप से मैं समझ पाया ये एक दिन पहले की घटना थी और वो मरीज़ लगातार डॉक्टर साहब को फोन पर फोन किए जा रहा था। भले आदमी वो डॉक्टर है, आप खुशकिस्मत हैं कि आपको नंबर मिला ... बेजा इस्तेमाल तो ना करो। डॉक्टर साहब को परेशान तो ना करो। और डॉक्टर साहब मैने भी देखा था ... मरीज़ नासमझ था, आप तो समझदार हैं... भले आदमी क्या बातचीत का वो लहजा आपको या किसी भी डॉक्टर को शोभा देता है । 

ओपीडी ... हर अस्पताल की ओपीडी जैसी ही थी । भीड़ और शोर-शराबा ... मिन्नतें ... बदतमीजियां ... बदइंतजामी ... बेबसी ... अपने नाम की आवाज़ सुनने को आतुर कान और डॉक्टर की कुर्सी की तरफ टकटकी लगाकर देखती दसियों-बीसियों जोड़ी आंखें।

और इसी भीड़ के बीच एक बुजुर्ग आऱाम से खाना खा रहा था... भूख सब कुछ भुला देती है ।

 इसी शोर-शराबे के बीच एक महिला अपने पति के साथ बैठी थी, पति फर्श पर सो रहा था... शायद चेकअप के लिए ही आया था।

इसी चीख-चिल्लाहट के बीच कई जोड़ी बुजुर्ग आंखें चेहरे पर बिना किसी शिकायत के ... जहां जगह मिली वहीं बैठ कर ... अपना नंबर आने का इंतज़ार कर रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर कोई अकेला था तो कोई किसी अपने के साथ ... चेहरा सब बयां कर देता है ।

इसी भीड़भाड़ के बीच एक मां अपने बच्चे के साथ चली आ रही था... मां आगे - आगे और बच्चा पीछे पीछे... बच्चा आंखों के अलावा शायद किसी और बीमारी से भी पीड़ित था... उसको उस तरह से चलते हुए देखना तकलीफदेह था... चलना शायद उससे भी ज्यादा ... लेकिन वो चल रहा था ... अपने पैरों पर ....ठीक होने की उम्मीद के साथ....

शायद ऐसी ही किसी उम्मीद के साथ हम लोग भी जी रहे हैं ...

साथ ही यहां उन सैकड़ों, हज़ारों ...लाखों डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को भी नमन है जो तमाम उपलब्ध सुविधाओं के बीच अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं...

बेशक कई बार जिंदगी अपने ही तरीके से सभी को जीने का नज़रिया सिखाती है, जीने की राह दिखाती है , लेकिन जाने कितनी जिंदगियां ... इन्हीं अस्पतालों की बदौलत आज जि़ंदा हैं ... उनका वजूद कायम है। 
बेशक कई बार मायूसी होती है ... लेकिन उम्मीद ... उम्मीद हर मर्ज़ की दवा है ... और भरोसा हर दर्द का इलाज ।