Questions लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Questions लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 8 जुलाई 2015

एक दिन की ज़िंदगी ...



सिर्फ एक दिन की ज़िंदगी...

एक दिन की ज़िंदगी में ही उसने ज़िंदगी की हकीकत समझ ली।

आंखें खोलने से पहले ही उसे क्या-क्या नहीं देखना पड़ा।

उसे ज़िंदा रखने की कोशिश में मां-बाप को पल-पल मरते देखा।

उसे ज़िंदा रखने की कीमत लगी, जो उसके मां-बाप नहीं दे पाए।

मालूम हुआ एक अस्पताल ने नवजात की ज़िंदगी की एक दिन की कीमत लगाई 10,000 रुपए। अस्पताल के लिए शायद कोई बहुत बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन उस मासूम की ज़िंदगी इस रकम के सामने बहुत मामूली थी। मां ने महीनों उसे कोख में रखा, पिता ने भी उतना ही इंतज़ार किया...
इंतज़ार के उन लम्हों में सांसों के हिसाब से उन्होंने अपने आने वाले बच्चे के लिए सपने भी देखे, लेकिन कोरे सपनों से क्या होता है... सपने नींद में ही अच्छे लगते है, जागती आंखों के सपनों के लिए इस दुनिया में पैसों की जरूरत होती है।
उनकी जेब में पैसे नहीं थे लेकिन गोद में मन्नतों से मांगा हुआ मासूम  ज़िंदगी की बाट जोह रहा था, वो जो उनके सहारे इस दुनिया में आया था... अपनी औलाद को अपनी आंखों के सामने वो मरता हुआ कैसे देखते।
लेकिन उस निजी अस्पताल के लोग भी आखिर इंसान थे, पत्थर-दिल नहीं...
बेशक पैसा देने में असमर्थ इस परिवार के प्री-मैच्योर बच्चे को ज़िंदा रखने की उन्होंने कीमत लगाई हो...
बेशक एक दिन के उस नवजात की ज़िंदगी और उसके बिलखते मां-बाप के आंसुओं के आगे उनका दिल नहीं पसीजा...
लेकिन अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर हद दर्जे तक आशावादी और भाग्यवादी निकले। पैसे नहीं हैं पास में तो क्या हुआ, ज़िंदा रखने की कीमत नहीं चुका सकते तो क्या हुआ, उन्होंने उसे ज़िंदा रखने की कोशिशों में कोई कमी नहीं रखी, एक अदद एंबुलेंस को बुला कर उन्होंने उस नवजात को परिवार के साथ रवाना कर दिया, दिल्ली के अस्पतालों की खाक छानने के लिए। उन्हें आशा थी कि ये बच्चा अपने भाग्य के सहारे जि़ंदा रहेगा।
प्री-मैच्योर बच्चा भाग्य की इसी डोर के सहारे फिर दिल्ली के जाने-माने अस्पतालों के चक्कर काटने लगा। सबसे पहले उसे कलावती अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके भाग्य में इलाज होना नहीं लिखा था, लिहाजा वहां उसका इलाज नहीं हुआ। इसके बाद कैट्स एंबुलेंस उस नवजात को लेकर आरएमएल अस्पताल पहुंची। लेकिन यहां भी इलाज उसके नसीब में नहीं था। इलाज के नाम पर यहां भी निराशा हाथ लगी, एक दिन की ज़िंदगी पूरी कोशिश कर रही थी... एक मुकम्मल ज़िंदगी हो जाने के लिए।
आरएमएल के बाद एंबुलेंस दिल्ली की भीड़भाड़ को चीरती हुई एलएनजेपी अस्पताल पहुंची, पहले यहां भी इलाज के नाम पर इंतज़ार मिला और ये इंतज़ार फिर लंबा होता गया... और एक कभी ना खत्म होने वाले इंतज़ार में बदल गया।
एक दिन की ज़िदगी अपने हिस्से की ज़िंदगी जी चुकी थी। राजधानी के अस्पताल उसे इस दुनिया में नहीं रोक पाए। एक अस्पताल ने उसकी जिंदगी की कीमत हैसियत से ज़्यादा लगा दी। तो दूसरे अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते वो एक ' मैटर ' बन गया, जिसकी जांच अस्पताल प्रशासन अब कर रहा है और पता लगते ही हमें बता दिया जाएगा। बच्चे को शायद सॉरी कह दिया जाएगा, क्योंकि अब अस्पताल इस मैटर को उसे समझा नहीं पाएगा।
एक दिन की ज़िंदगी के अपने आखिरी पड़ाव तक जाते -जाते नवजात एक ' पेशेंट ' बन चुका था, और वो गलत गेट पर इलाज का इंतज़ार कर रहा था, जहां इलाज के इंतज़ार में उसके हिस्से की सांसें खत्म होते-होते उसका साथ छोड़ गईं...
एक दिन की ज़िंदगी ...जि़ंदगी को कई सबक सिखा गई। पहले दो अस्पताल जहां उस नवजात को ले जाया गया वो केंद्र सरकार के अंतर्गत आते हैं, फिर उस नवजात ने जहां आखिरी सांस ली...वो अस्पताल दिल्ली सरकार के अधीन है।
ये वैसे तो सार्वजनिक जानकारी का हिस्सा है...
लेकिन इलाज के लिए जाते समय कौन ये सोचता है कि कौन सा अस्पताल किस सरकार के अंतर्गत आता है।
पर यकीन मानिए ये एक बहुत जरूरी तथ्य है जो आज मुझे टेलीविज़न के माध्यम से पता चला।
मगर अफसोस ये जानकारी उस नवजात के पास नहीं थी... 

रविवार, 5 जुलाई 2015

पत्रकार की ज़िंदगी और मौत


कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी है तेरी
जिस पर तू इतराता है
तेरे पत्रकार होने के वजूद पर
पत्रकार नहीं...
बल्कि कोई और ठप्पा लगाता है,
हर गली में अब पत्रकार हैं...
तू क्या एक्सक्लूज़िव बना धक्के खाता है...
बातों से दुनिया नापते हो रोज़...
और तेरा सैलरी अकाउंट ...
रोज़ तुझे तेरी औकात बताता है...
मानेगा नहीं तू पर ये सच है...
आखिर तू भी तो इंसान है...
इसमें झिझकना क्या...
किससे शर्माता है...
तुझे गुमान है ...
तुझे खबरों की समझ है...
अच्छा ...
लिख-लिख...
लिख ले खबर...
फिर तान दे...
तू जान दे या ईमान दे...
तेरी खबर कोई कितनी चलाता है...
ये खबर तय नहीं करती है...
बल्कि तू जनता को उसे कितना बेच पाता है...
सच सच बता...
कितनी बार वक्त पर खाना खा पाता है...
दो निवाले अंदर जाते है...एक फोन आता है...
और तू उठ जाता है...
ज़माने भर के सरोकार की बातें मत कर...
क्या जरूरत के वक्त तू अपने घर भी पहुंच पाता है...
अपने हक़ की आवाज़ उठाने के लिए भी सोचता है...
सोचता है... फिर सोचता है...
और सोचता रह जाता है...
फिर एक दिन तुम्हारा एक निर्भीक साथी...
किसी खबर की पड़ताल करते-करते...
ऑन ड्यूटी...
एक ‘ नैचुरल ’ मौत मर जाता है...


शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

उजाले की ओर . . .



ये तस्वीर आपसे कुछ कहना चाहती है... 
ये बेफिक्री... कुछ कहना चाहती हैं...
कुछ कहना चाहते हैं ये चेहरे...
ये चेहरे... अनजाने से...
कुछ साफ कुछ धुंधले ...
लेकिन मुस्कुराहट... वही जानी-पहचानी... 
आशाओं वाली... उम्मीदों वाली... 
बिल्कुल वही...
उस ऐड फिल्म की तरह... 
उम्मीदों वाली धूप... 
sunshine वाली आशा... 

कैमरे में मैने इस पल को तो कैद कर लिया लेकिन और भी बहुत कुछ था इस पल के साथ जुड़ा हुआ जो मैं उस वक्त देख रहा था, महसूस कर रहा था। मैं उस पल को वास्तविकता में जी रहा था जो एक कैमरा आप तक पहुंचा तो सकता है लेकिन उसे एक इंसान की तरफ भावनात्मक तौर पर महसूस और बयां करने में अभी शायद समर्थ नहीं है।
कुछ वक्त पहले किसी काम के सिलसिले में गांव जाना हुआ। ये तभी था, जब गांव के स्कूल से लौटते इन बच्चों से मुलाकात हुई।
और यही कुछ ऐसे पल होते हैं जो आपको जाने-अनजाने बहुत कुछ दे जाते हैं।
सालों पहले एक शब्द से साबका हुआ,  जिजीविषा... शाब्दिक और संदर्भित अर्थ तो तत्काल उपयोगानुसार ग्रहण कर लिया गया लेकिन वास्तविक अर्थ... वास्तविकता का दर्शन... इसी जीवन दर्शन से हुआ। आखिर क्या होती है ये जिजीविषा। तमाम विषमताओं और तमाम अभावों के बीच ज़िंदगी कैसे पनपती है... हमारे शहरों से ज़िंदगी के कुछ सबक शायद अछूते रह जाते हैं।


स्कूल से लौटते इन बच्चों के चेहरे थकान से उतरे हुए नहीं बल्कि खुशी से दमक रहे थे, इन बच्चों के होठों पर कोई शिकायत नहीं थी बल्कि वो स्कूल में सीखा कोई गीत गुनगुना रहे थे और सिर्फ गुनगुना नहीं रहे थे बल्कि बुलंद आवाज़ में मास्टर जी द्वारा सिखाए गए पाठ को याद करते जा रहे थे।  इन बच्चों को घर जाकर ट्यूशन नहीं जाना था, ना किसी डांस क्लास में जाना था, ना कहीं म्यूज़िक क्लास में जाना था। घर पर टीवी तो शायद होगा ही लेकिन उस पर तमाम चैनल होंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं। शहर की सभी सुविधाओं की तुलना नहीं करूंगा, वो शायद तर्कसंगत नहीं होगा लेकिन इन बच्चों को घर जाकर आराम करने को भी मिलेगा ये भी तय नहीं था, और ये शायद इस तरफ ध्यान भी नहीं देते होंगे। लेकिन ये बच्चे खुश थे, स्कूल जाकर ... इनकी बातों में स्कूल ना जाने के बहाने नहीं थे... आज की बातें थी, कल की मुलाक़ातें थीं, सपने थे, बालसुलभ जिज्ञासा थी।
कुछ दिन पहले एबीपी न्यूज़ चैनल पर कार्यक्रम रामराज्य देखा। कार्यक्रम के बारे में बहुत चर्चा सुनी थी, इसलिए देखने की जिज्ञासा भी थी और उस दिन का वो कार्यक्रम देखना व्यर्थ नहीं था। रामराज्य के उस एपिसोड में फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली की बात की गई थी। कुछ ऐसा नहीं था जो इस धरती पर संभव ना हो, कुछ ऐसा नहीं था जो हमारे संसाधनों से परे हो। कुछ ऐसा नहीं था जो हमारे इतिहास से बढ़कर समृद्ध, सक्षम, समर्थ, विविधतापूर्ण और गौरवशाली हो।
क्या ऐसा हमारे अपने देश, हमारे अपने शहरों और हमारे अपने गांवों में नहीं हो सकता है। हालांकि ये सोच... बहुत पहले से हमारी व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन एक आदर्श के तौर पर इस सोच का साकार होना अभी बाकी है . . .

रविवार, 21 जून 2015

एक पत्रकार की मौत

पत्रकार... व्यवस्था/तंत्र का एक बहुत जरूरी हिस्सा होते हैं, लेकिन ये जरूरी नहीं कि व्यवस्था/तंत्र भी उन्हें उतना ही जरूरी समझे। जरूरी होना और जरूरत होना, ये दो अलग-अलग भाव हैं ...
image ctsy-google

वैसे बात सिर्फ पत्रकारिता की नहीं है,  जिन लोगों में ये हुनर होता है, वो कहीं भी किसी भी व्यवस्था में अपने आप को जरूरी साबित कर लेते हैं। ऐसे मामलों में कई अपवाद भी देखने को मिलते हैं, कुछ लोग अपनी प्रतिभा के बलबूते पर अपनी जगह बनाते हैं तो कुछ लोगों का हुनर खुद के महत्व को मनवाना और अपनी काबिलियत को स्थापित कर लेना भी होता है।

पत्रकार जगेन्द्र का इन सब बातों से सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन एक पत्रकार होने के नाते वो भी स्वयं इस व्यवस्था/तंत्र का ही हिस्सा रहे। उनकी दर्दनाक मौत आम जनता और स्वयं पत्रकार बिरादरी के सामने कई अहम सवाल छोड़ गई है। आखिर उनकी मौत का सच क्या है, एक सभ्य समाज में इस तरह का अमानवीय कृत्य, अक्षम्य है। क्यों किया गया, किस लिए किया गया, कैसे अंजाम दिया गया... किसके लिए किया गया... सवाल तमाम हैं, लेकिन दरिंदगी की तमाम हदें पार करके ऐसे अपराध को अंजाम देने वाले लोग यकीनन इंसान तो नहीं हो सकते। कानून के साथ-साथ ये लोग इंसानियत के गुनहगार है।
कानून पर भरोसा हमारी सोच, दिनचर्या, परवरिश और पेशे का हिस्सा है। भरोसा है जगेन्द्र को न्याय जरूर मिलेगा,  ठीक है आप जांच कराईए... तसल्लीबख्श तरीके से जांच कराईए,  आप पूरी तरह आश्वस्त हो जाइए कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष। पूरे होशोहवास में कोई नहीं चाहता कि किसी निर्दोष को सज़ा मिले लेकिन जिसने जुर्म किया है सज़ा उसे कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिए, ऐसी सज़ा जो एक नज़ीर साबित हो। 
जगेन्द्र सिर्फ एक पत्रकार थे, एक मामूली पत्रकार ... वो भी शहर और सत्ता से दूर ... पहले तो वो खुद एक छोटी से खबर बन कर रह गए। ऐसे में एक छोटी सी खबर जगेन्द्र को जरूरत वाले भाव का पत्रकार जगह-जगह खोजता रहा... अखबारों में , टीवी पर, खबरों में , चर्चा में, लोगों में ...चेहरों में ... कहीं से खबर मिले... क्या वाकई एक पत्रकार को जिंदा जलाने की खबर में सच्चाई है, खबरों की जिंदगी जीने वाला पत्रकार मौत की इस खबर पर शायद भरोसा ही नहीं करना चाहता था, आखिर करता भी तो कैसे...
जगेन्द्र की मौत का सच जनता के सामने आना भी उतना ही जरूरी है जितना पत्रकार बिरादरी के लिए, जितना जरूरी वो कानून व्यवस्था के लिए है, उतना ही जरूरी इस व्यवस्था में आस्था और विश्वास के लिए है...
जाने से पहले जगेन्द्र कह रहे थे... मुझे पीट लेते, ज़िंदा क्यों जलाया ? जगेन्द्र अब जिंदा नहीं है... लेकिन उनका ये सवाल ज़िंदा है और जब तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलता ये सवाल यूहीं ज़िंदा रहेगा।



(ये सवाल उन सभी लोगों के लिए भी है, जो शरीर से ज़िंदा हैं लेकिन आत्मा, ईमान, आत्मसम्मान और सोच जैसी तमाम कसौटियों के मुताबिक एक अर्से से मृतप्राय हैं, जो जरूरत से बढ़कर शायद जरूरी... बेहद जरूरी हो गए हैं)

रविवार, 7 जून 2015

LIFE AFTER MAGGI . . .

Dear Maggi . . .



. . . जिंदगी कब करवट बदल ले पता ही नहीं चलता। पिछले कुछ दिन जितने तुम पर भारी रहे हैं यकीन मानो किसी आदत को एकदम से छोड़ देना भी उतना ही कष्टकारी है।
पहले तो भरोसा ही नहीं हुआ, कि दो मिनट में तैयार हो जाने वाली मैगी का भरोसा भी दो ही मिनट में टूट जाएगा। हालांकि सब जानते हैं, ना तो तुम दो मिनट में तैयार होती हो और ना ही ये सारा खेल दो मिनट में सिमट जाएगा। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है... चलने दो। 
अगर तुम्हारा दामन पाक-साफ है तो फिर तुम्हें कोई छू भी ना पाएगा, अगर किसी ने तुम्हारे खिलाफ साज़िश की है तो भी भरोसा रखो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। औऱ अगर ये तुम्हारा अस्तित्व मिटाने का खेल है तो भी भरोसा रखो। झूठ के पांव नहीं होते हैं... और यकीन मानो सच हमेशा सच ही रहता है।
लेकिन हां... अगर तुमसे गलती हुई है तो उसे स्वीकार करो, पूरी जिम्मेदारी के साथ। भरोसा रखो, हम हिंदुस्तानी सब माफ कर देते हैं, सब कुछ। हमारी सोच जितनी विस्तृत औऱ संकुचित है समान रूप से हमारा हृदय भी उतना ही उदार है।
स्वाद के साथ अगर तुमने सेहत की तुकबंदी की थी, तो फिर उस पर खरा उतरना था, हालांकि आजकल वायदे कर तो दिए जाते हैं लेकिन उन्हें निभाते वक्त इंसान की हकीकत मालूम होती है, तुम तो फिर भी एक ब्रांड हो ... इतना बड़ा ब्रांड कि उसके आगे वायदे, भरोसा, सेहत... सब अदना सा होता चला जाता है उस इसान की तरह जिसका भरोसा फिलहाल तो टूटा सा लगता है।
कोई कह रहा है कि ये माओं का आलस है जो मैगी घर-घर तक जा पहुंचा... अब बताओ भला।
किसी का कहना है कि साल भर की उसकी मेहनत है जो सेहत से इस खिलवाड़ का खुलासा हो पाया...
कहीं बात हो रही है कि ब्रांड मैगी को मरने नहीं देंगे, ब्रांड क्या इंसान से बड़ा हो गया जी...
कहीं मैगी पर रोक लगा दी गई है तो कहीं उसका स्टॉक वापिस लिया जा रहा है...
कहीं मैगी पर बैन के खिलाफ अर्जी दी जा रही है...
इस बीच स्वदेशी मैगी उर्फ हर्बल नूडल्स की मांग और ब्रांडिंग पूरे शबाब पर है। मांग और आपूर्ति की परिकल्पना यही तो है।
हर्बल मैगी का स्वरूप आखिर कैसा होगा, क्या वही स्वाद होगा, क्या वही हवा में तैरती महक होगी जो आपकी भूख को और बढ़ा देती थी... क्या वही दो मिनट का इंतज़ार होगा। क्या फिर से वो भरोसा कायम हो पाएगा। सेहत और स्वाद का एक होना क्या वास्तव में संभव है या फिर ये एक कवि की कल्पना से भी इतर कोई अस्तित्व है।
पर मैगी... डियर मैगी ... तुम घबराओ मत। हो सकता है बहुत जल्द तुम पर लगे सारे आरोप किसी समझौते या संवाद के तहत खारिज कर दिए जाएं। और एक नए सिरे से सेहत और स्वाद को मद्देनज़र रखते हुए (उम्मीद है) तुम्हारी री-ब्रांडिंग की जाए। और अगर ऐसा नहीं भी होता है तो हम दो मिनट का विकल्प ढूंढने और ठूंसने में तुमसे भी कम वक्त लेंगे। बाज़ार में विकल्पों की कमी नहीं है, कभी-कभी तो विकल्पों की जरुरत और मार्केट दोनों बनाए जाते हैं और साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ अपनाया जाता है, यकीनन तुमने भी किसी ना किसी स्तर पर ऐसा जरूर किया होगा। फिर एक दिन एक नया विकल्प आएगा और हमें पता चलेगा कि जिस विकल्प को हमने तुम्हारी जगह दी थी वो भी उसके कतई लायक नहीं था। फिर हम एक नया विकल्प खोज निकालेंगे।
ये लापरवाही है, गलती है या फिर मुनाफा कमाने के चक्कर में जानबूझकर मानकों औऱ सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया। ये सच तो एक दिन सामने जरूर आएगा।
लेड का स्वाद कैसा होता है, ये हमें पता नहीं मैगी लेकिन उससे नुकसान क्या है ये अब जरूर पता चल गया है, MSG का खेल कैसे खेला जाता है ये भी नहीं पता, लेकिन इन सबकी भरपाई हम कर रहे हैं। स्वाद के नाम पर सेहत भी दे दी...वो भी बस दो मिनट के फेर में।
लोग कह रहे हैं कि हमारे रोज़ाना इस्तेमाल की चीजों में औऱ भी खतरनाक तत्व मिले हुए हैं या मिल जाते हैं या मिला दिए जाते हैं। कहीं कोल्ड-ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड्स की बात आती है, कहीं मिलावटी तेल का मसला है, नालों के पानी में पनपती सब्ज़ियां रोज़ाना खाई-पकाई जा रही हैं, केमिकल्स से पकाए गए फल किसी को कैसे सेहत दे सकते हैं। कहीं अनाज, दालों में आर्सेनिक मिल रहा है, तो कहीं रोज़ अंडे खाने पर भी अब सोचना पड रहा है। जगह-जगह मिलावटी और दूषित खाद्य सामग्री की चर्चा और इस्तेमाल, इंसान मिलावट का शायद आदी हो चला है।
एक तरफ तो मैगी ने उपभोक्ताओं के मन में संशय डाल दिया है तो दूसरी तरफ मैगी पर भरोसा करके उसका प्रचार करने वाले भी नूडल्स के फेर में उलझे नज़र आ रहे हैं। यकीनन बात सेहत और स्वाद की ही रही होगी तभी एक भरोसे के साथ एक भरोसे का प्रचार-प्रसार होता है। पैसा कहीं शामिल नहीं रहा होगा, सिर्फ पैसा मेरा मतलब है, शायद खुद का अनुभव भी प्रेरक रहा होगा। या फिर कोई ऐसा एग्रीमेंट होता होगा जो पैसों में ही लिखा जाता होगा। पैसा यानी मनी... अब यहां भी ब्लैक और व्हाईट खोजेंगे तो मामला बहुत भटक जाएगा। कहीं कोई अमिताभ बच्चन से सफाई मांग रहा है तो कोई माधुरी से मैगी खाने का हर्जाना मांगने पर तुला है। क्या ये सितारे फिल्मों में जो भी कुछ करते हैं आप आंख मूंदकर वो सब अपनी ज़िंदगी में करने लगते हैं, एक आम आदमी की ज़िंदगी में क्या इतनी गुंजाइश होती है। आम आदमी आजकल बहुत जागरुक हो गया है लेकिन ये जागरुकता क्षणिक और भौतिक ज्यादा हो गई है शायद।
किसी उत्पाद के दावों की सत्यता को परखना इन सितारों का काम होना चाहिए या सरकार का। या फिर सभी हमारी ही तरह एक धोखे का शिकार हुए हैं। और ये धोखा यकीन मानिए असली वास्तविकता है, उत्पाद का नाम और धोखे का स्तर शायद बदलता रहता है। अगर इन खबरों में लेशमात्र भी सच्चाई है तो ये भरोसा तोड़ने से भी बड़ा गुनाह है... ये गुनाह एक पूरी पीढ़ी के स्वास्थ्य के साथ है, इस गुनाह की व्यापकता को ज़रा देखिए... एक पूरी पीढ़ी। 

 खुशियों की रेसीपी ... दो मिनट की खुशियों की रेसीपी, कहीं किसी की मां को अपना बनाती रही, और जाने कहां- कहां दो मिनट में खुशिया बनाती रही। हम सबकी मैगी की अपनी – अपनी कहानी रही है, हां भई है बिल्कुल है यकीन मानो, क्योंकि मैगी की एक कहानी मेरी भी है, पर ये ना किसी पैक पर है, ना कभी टीवी पर आई और ना ही किसी को सुनाई गई। ऐसा मैने टीवी पर एक एड फिल्म में देखा था, लेकिन मेरी मैगी की कहानी मेरे पास रही। ये कहानी एक चैनल में काम करने वाले एक प्राणी की थी, जो कभी – कभी घर से लाया हुआ खाना नहीं खा पाता था। खाना जिसे पूरे दो घंटे में तैयार किया जाता था उस खाने के टिफिन पर दो मिनट की मैगी वाकई खुशियों की रेसीपी बन कर आती थी। पूरी शिफ्ट के बाद मैगी खाने में एक अलग ही आनंद आता था, पता नहीं झा जी मैगी में क्या डालते थे (यहां लेड और MSG की बात नहीं हो रही है), दिनभर की सेहत और स्वाद की शायद भरपाई हो जाती थी। झा जी का पूरा नाम क्या है कभी मालूम नहीं हुआ , शायद जरूरत ही नहीं पड़ी ना उन्हें बताने की ना हमें पूछने की। बस उनकी बनाई चाय और मैगी से वास्ता बना रहा। एक दिन उनको भरोसे में लेकर उनकी रेसीपी जानने की कोशिश भी की, और फिर उनके बताए तरीके से खुद का हाथ आजमाया, लेकिन वो स्वाद नहीं आया। 
और ये कोशिश उस दिन तक जारी थी . . . 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

पेशेवर... एहसान-फरामोश

हर हर्फ़ चुप है
क्यूँ क़लम चुप है
नज़रें बेबस नहीं 
बेशर्म हैं...
और चुप हैं
पर्दे के पीछे विकृत से
गुनहगार हैं चेहरे 
ख़ामोश हैं
ये किन लोगों से इंसाफ़ चाहिए तुम्हें
ये कमज़र्फ हैं 
पेशे से एहसानफरामोश हैं ...

बुधवार, 6 नवंबर 2013

Delhi : You Suggest - दिल्ली समस्याएं और समाधान


एक कदम हम बढ़ाएं
एक कदम तुम
एक कदम हम बढ़ाएं
एक कदम तुम
गाएं खुशियों का तराना
गाएं खुशियों का तराना
साथी हाथ बढ़ाना ... 
साथी हाथ बढ़ाना ...


एक नुक्कड़ नाटक में इन पंक्तियों का इस्तेमाल किया था कॉलेज के दिनों में, आज भी प्रासंगिक है... हमेशा रहेंगी । क्योंकि बदलाव, सुधार या विकास तभी हो सकता है जब आपके परिवेश में एक से ज़्यादा आयाम उसे अपनाना चाहते हों। सरकार हो, विपक्ष या आम जनता ... जिम्मेदारी सभी की है। 

इससे पहले हम बात कर चुके हैं उन समस्याओं की, जिनसे आपकी दिल्ली, हमारी दिल्ली रोज़ाना जूझ रही है, हम बात कर चुके हैं उन मुद्दों की जो हमारी दिल्ली के इंटीग्रेटेड विकास के लिए अवश्यंभावी है। मुद्दे हमारे हैं तो रास्ता भी हमें ही सुझाना होगा। समस्याएं हमारी दिल्ली की हैं तो समाधान भी हमें ही सुझाना होगा ताकि इन तमाम समस्याओं से हमें जल्द से जल्द मुक्ति मिल सके।

अपराध और भयमुक्त दिल्ली
राजधानी दिल्ली को अपराध मुक्त और भयमुक्त बनाना होगा , जहां आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करें तो महिलाएं भी बिना किसी डर के जिएं।
दिल्ली पुलिस में खाली पड़े पदों को जल्द से जल्द भरा जाए, पुलिस को अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध कराए जाएं, उपयुक्त ट्रेनिंग दी जाए। 
राजधानी के बॉर्डर और महफूज़ किए जाएं। 
वीआईपी सुरक्षा में तैनात जवानों को आम लोगों की सुरक्षा में भी इस्तेमाल किया जाए। 
किसी भी देश की पुलिस का मॉडल आंख मूंदकर अपनाया ना जाए, पुलिसिंग का एक ऐसा मॉडल विकसित किया जाए जो हमारी दिल्ली की जरुरत है। 
दिल्ली जैसे शहर में जितनी विविधताएं हैं उतनी ही सुरक्षा की तरह-तरह की जरुरतें भी। 
पुलिस भले ही गृह मंत्रालय के अधीन हो या दिल्ली के , आम नागरिक का खुद को सुरक्षित महसूस करना बहुत जरुरी है।

महंगाई से मुक्ति
जिस तरह से महंगाई लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है, सरकार को ये देखना होगा कि महंगाई किसी भी तरह काबू से बाहर ना जाए। 
जमाखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, मिलावटखोरों, मुनाफाखोरों को ना बख्शा जाए।
सप्लाई और डिमांड का सामंजस्य बनाकर रखा जाए, नए नियम बनाने की शायद जरुरत ना पड़े लेकिन जो भी नियम हैं उनका कड़ाई से पालन किया जाए। 
करप्शन को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त ना किया जाए, महंगाई तभी काबू में रह पाएगी।

बिजली-पानी का अधिकार
निजीकऱण अगर समाधान है तो उसे समस्या ना बनने दिया जाए। उसे लाल-फीताशाही की भेंट ना चढ़ने दिया जाए।
निजी कंपनियों पर नज़र रखी जाए, औचक ऑडिट को प्राथमिकता दी जाए, लोगों से जुड़ा मुद्दा है, लिहाज़ा ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल किया जाए ताकि कहीं बिल ज्यादा है तो क्यों है ये पता किया जा सके। पारदर्शिता बहुत जरुरी है, इसके लिए सिस्टम में लोगों को शामिल करना बहुत जरुरी है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका उनसे सीधा सरोकार है।
साथ ही जो लोग कानून का पालन नहीं करते हैं उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, पानी-बिजली चोरों को ना बख्शा जाए।

विकास में सामंजस्य
विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है ये मैने पहले भी कहा था। सामंजस्यता के अभाव में विकास अपनी उपयोगिता खो बैठता है।
आबादी अगर 10,000 लोगों की है तो सुविधाएं भी उसी अनुपात में हो, अन्यथा विकास और सुविधाएं अपनी सार्थकता खो बैठते हैं।
या फिर दो बड़ी सड़कों को जोड़ने वाली सड़क बदहाल हो तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है।
एक फ्लाईओवर या अंडरपास बनता है तो उसके आसपास भी ध्यान देना होगा, विकास में सामंजस्य जरुरी है।

विकास की समग्रता
विकास की समग्रता होना बेहद जरुरी है, अगर आप कनॉट प्लेस को रेनोवेट करते हैं तो पुनर्वास कॉलोनियों के विकास का भी आपको ध्यान रखना होगा।
अगर नई दिल्ली की सड़कें चमचमाती हुई हों तो बाहरी दिल्ली के लोगों को भी सड़क का हक है।
बारिश में शहर तालाब ना बने ये प्लानिंग कौन करेगा।
टाउन प्लानिंग में ध्यान दिया जाए। मास्टर प्लान का विधिवत पालन किया जाए और उन चीज़ों को जगह दी जाए जो शहर की जरुरत हैं।
सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी तय की जाए।

मैंने पहले ही कहा है ... हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं !!!

प्रदूषण से निवारण
प्रदूषण शहर को धीरे-धीरे खा रहा है।
हमें सड़कों पर वाहनों की संख्या पर अंकुश लगाना होगा।
रात के वक्त दिल्ली शहर की सड़कों से गुजरने वाले भारी वाहनों की तादाद को काबू में करना होगा। हमें वैकल्पिक उपायों पर जल्द से जल्द काम करना होगा।
प्रदूषण फैलाने वाले बची-खुची फैक्ट्रियों को शहर से बाहर निकाल फेंकना होगा।
एक शहर को उसमें रहने वाले लोग ही बचा सकते हैं, लिहाज़ा हमें अपने शहर को खुद ही बचाना होगा।

बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा
शहर को एक इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है, मेट्रो को शहर के हर कोने तक पहुंचाया जाए।
जहां मेट्रो नहीं जा सकती वहां मोनो रेल या फिर कोई दूसरा उपयुक्त ट्रांसपोर्ट सिस्टम, जैसे दिल्ली परिवहन सेवा यानि डीटीसी की उपलब्धता दिन के 24 घंटों किसी ना किसी तरह बरकरार रखी जाए।
ग्रामीण सेवा , सारथी सेवा जैसी सेवाओं को रेग्युलेशंस के दायरों में चलाया जाए।
सार्वजनिक परिवहन सेवा को सस्ता रखा जाए साथ ही सुरक्षित भी।

बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात
एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम, सोचे-समझे और सिर्फ जरुरी डायवर्जन। 
वीआईपी मूवमेंट के समय बेहतर प्लानिंग।
लोगों को समय-समय पर ट्रैफिक नियमों की जानकारी देते रहना, अवेयरनेस कैंपेन चलाना। 
और साथ ही लोगों को गलती करने से रोकना प्राथमिकता रहे बजाय चालान काटने के।

शहर की हरियाली का ध्यान
पेड़ शहर को जिंदा रखते हैं। हमें जिंदा रहने के लिए अपने पेड़ों को जिंदा रखना होगा।
रिज इलाके को अतिक्रमण से बचाना होगा।
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे, और पेड़ों को कटने से बचाना होगा। कई बार पेड़ सरकारी एजेंसियों की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं तो कई बार लोग अपनी बेवकूफी के चलते जान-बूझकर भी पेड़ों को कटवा देते हैं।
जलस्तर को भी बरकरार रखना होगा।
ध्यान सरकार को भी रखना होगा, संस्थाओं को भी और हमें भी। 

साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखना जितना सरकार की जिम्मेदारी है उतनी ही यहां रहने वाले लोगों की भी।
अपने स्तर पर सभी को प्रयास करने होंगे।
हमें ध्यान रखना होगा कि हम अपने आस-पास गंदगी ना फैलाएं।
और उसके बाद सरकार को ये जिम्मेदारी लेनी होगी कि वो शहर को साफ सुथरा रखे और जिस सरकारी एजेंसी की भी जिम्मेदारी है वो पूरी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे, नहीं तो एक बार हालात काबू से बाहर जाने के बाद वापस ठीक करने में ज्यादा प्लानिंग, ज्यादा मेहनत और ज्यादा फंड्स की जरुरत होगी। शहर को कूड़ाघर बनने से रोकना होगा। 

अवैध क़ॉलोनियों का नियमन
अवैध कॉलोनियों का नियमन हो या ना हो ये भले ही बहस का मुद्दा रहा हो लेकिन अब ये इसी शहर का एक अभिन्न अंग बन चुकी हैं जहां एक शहर का आबादी का एक बड़ा हिस्सा रहता है।
अब ऐसे हालात में कोरे चुनावी वादों को छोड़कर इन कॉलोनियों के लिए एक उपयुक्त पॉलिसी की जरुरत है जो इनके अस्तित्व को विकास की समग्रता प्रदान करे। 

यमुना को बचाना होगा
एक नदी एक शहर को जीवन देती है जबकि दिल्ली एक ऐसा शहर बन गया है जो उस नदी का ही काल बन गया।
हज़ारों करोड़ों रुपए यमुना को साफ करने के नाम पर खर्च कर दिए गए लेकिन हालात जस के तस। कहां गए ये जांच का विषय है , ये बाद का विषय है... फिलहाल हमें हर हाल में यमुना हो बचाना होगा।
खादर इलाके में अतिक्रमण को रोकना होगा।
सरकारी या गैर-सरकारी हर तरीके के निर्माण पर नज़र रखनी होगी।
नदी में गिरने वाले नालों को जितना संभव हो साफ करना होगा, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की संख्या और क्षमता बढ़ानी होगी।
साथ ही नदी के बहाव को रोकने, बांधने की कोशिश करने से भी बचना होगा।

सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर के कई हिस्सों में सीवरेज सिस्टम सालों पुराना है, आउटडेटेड हो चुका है, ऐसे में हल्की सी बारिश भी झेल पाना उसके बूते से बाहर हो जाता है।
ऐसे में भुगतना वहां के लोगों को पड़ता है।
ऐसी जगहों की पहचान कर जल्द से जल्द इस सिस्टम को बदलना पड़ेगा।
साथ ही शहर के कई हिस्सों में सीवरेज सिस्टम है ही नहीं ऐसे में लोगों की इस बुनियादी जरुरत को वहां तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है, ये कोई कोरा चुनावी वायदा नहीं होना चाहिए।  

भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।
घूस लेने वालों के साथ साथ घूस देने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
हेल्पलाइन नंबर, पहचान गुप्त रखना, सही शिकायत पर कड़ी कार्रवाई और झूठी शिकायत पर सज़ा ... सिस्टम में सब कुछ है, सवाल सिर्फ मुकम्मल इस्तेमाल का है।
हमें जागरुक होना होगा, जहां जरुरत है वहां लोगों को जागरुक भी करना होगा ताकि भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली का सपना सिर्फ सपना बनकर ना रह जाए।

और अब बात सबसे जरुरी और अहम समाधान की ...

चुनावी वादों की सच्चाई
चुनावों के वक्त नेता वादे तो करते हैं
लेकिन क्या जीतने के बाद ये वादे पूरे भी किए जाते हैं,
क्या जीतने के बाद नेता पलटकर लोगों का रुख भी करते हैं।
जीतने के बाद नेता आम से खास हो जाते हैं या फिर जो खास हैं वो खास ही रहते हैं।
ऐसे में उन तक पहुंचा कैसे जाए, इस पहेली को आम जनता को ही सुलझाना होगा।
जनता और नेता के बीच के इस फासले को पारदर्शिता के उसी हथियार के जरिए मिटाना होगा जो लोकतंत्र ने हमें इस सिस्टम के हर स्तर पर प्रदान किया है। 

समस्याएं हैं तो समाधान भी है
लोग परेशान हैं तो अनजान भी हैं ...
जनता से जुड़े हर मुद्दे को उठाना होगा ...
सिस्टम में पारदर्शिता को हथियार बनाना होगा ...
दिल्ली को चलाने में बढ़े लोगों की भागीदारी
हर आवाज़ को हमें ...
जनता की आवाज़ बनाना होगा। 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

My Delhi Manifesto- क्या चाहती है दिल्ली !!!














" दिल्ली – सपनों का शहर ... खुशियों का शहर ... उम्मीदों का शहर ... आशाओं का शहर। कुछ यही सपने लिए जाने कितने लोग दिल्ली आते हैं ...और जाने कितने यहां रहते हैं। "

बात कॉलेज के दिनों की है ... जब ये चंद लाइनें अपनी एक डॉक्यूमेंट्री के लिए लिखी थी।

सपने अब भी वैसे ही हैं, खुशियां अभी भी उतनी ही प्यारी हैं, उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं... आशाएं अब भी हैं... और इन सब के बीच अपनी दिल्ली भी कितनी बदल चुकी है। दिल्ली की जरुरतें कितनी बदल चुकी हैं... दिल्ली की आबादी कितनी बढ़ चुकी है। लेकिन क्या बढ़ती आबादी, फैलती दिल्ली और बदलती दिल्ली ... जरुरतों और विकास के बीच किसी भी तरह का सामंजस्य हम स्थापित कर पाए हैं, बड़ा सवाल ये है।
सवाल किसी सरकार या पार्टी विशेष का नहीं है।
सवाल दिल्ली का है...दिल्ली की आबादी का है...दिल्ली की जरुरतों का है...दिल्ली के विकास का है। सवाल दिल्ली के लोगों का है।
अपनी उम्र के हिसाब से दिल्ली के बदलाव का करीब-करीब तीन दशकों तक का दौर अभी तक मैने भी जिया है। मुद्दे कमोबेश वही रहे हैं ...बस वक्त वक्त पर लोगों की प्राथमिकता बदलती रहती है।

अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली
दिल्ली देश की राजधानी है। अगर इसी राजधानी के लोग खुद को सुरक्षित महसूस ना करें तो हालात वाकई चिंताजनक हैं। उस पर महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ते अपराध...छीनाझपटी...छेड़छाड़ औऱ बलात्कार ... दिल्ली पुलिस केन्द्र के अधीन हो या राज्य के, दिल्लीवालों की मांग अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली की है जो उनका अधिकार है।
महंगाई – जी हां ... दिल्ली महंगाई से मुक्ति चाहती है।
देश के किसी भी हिस्से में कहीं भी कुछ भी होता है , उसका असर सीधा राजधानी दिल्ली के बाज़ारों ... घरों ... रसोईघरों पर पड़ता है। प्याज़ रसोईघरों से निकल कर चुनावी मुद्दा बन जाती है। और बात सिर्फ प्याज़ की नहीं है महंगाई की मार से आम आदमी सालों से बेहाल है । आखिर राजधानी में रहने की कीमत लोग चुकाएं ये कहां तक जायज़ है। जीना महंगा और लगातार महंगा होता जा रहा है।
बिजली-पानी का अधिकार 
 क्या निजीकरण हर समस्या का समाधान है। सवाल भी आपके सामने है और जवाब भी।  दिल्ली जैसे शहर को 24 घंटे बिजली- पानी की दरकार है। कहीं बढ़े बिल तो कहीं बिजली नहीं ... तो कहीं पानी की बूंद तक नहीं। मानो शहर का हर हिस्सा एक अलग जिंदगी जी रहा है।
विकास में सामंजस्य  
 राजधानी दिल्ली विकास चाहती है लेकिन विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है। आप एक फ्लाईओवर बनाते हैं लेकिन जहां वो फ्लाईओवर खत्म होता है वहां सड़क इतनी संकरी हो जाती है कि आपका फ्लाईओवर जाम का समाधान नहीं जाम का सबब बनता है।
शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से औऱ शहर के बढ़ते विस्तार के साथ साथ सुविधाओं का सामंजस्य बहुत जरुरी हो जाता है। 
विकास की समग्रता 
 विकास आबादी के हर हिस्से तक पहुंचे और शहर के हर कोने तक , ये भी सुनिश्चित करना होगा। एक बारिश में ही सरकारी एजेंसियों के दावों की पोल खुल जाती है। सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं, अंडरपास बसों को अपने आगोश में ले लेते हैं । जगह-जगह सड़कों पर गड्ढे ...

 हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं।

प्रदूषण से निवारण 
 प्रदूषण से छुटकारा पाने के तमाम उपाय जैसे नाकाफी साबित होते जा रहे हैं। सड़कों पर वाहनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, रात के वक्त राजधानी से गुजरने वाले भारी वाहन हवा को इतना ज़हरीला बना देते हैं कि दिन भर आपका दम घुटा सा रहता है।
बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा 
शहर की आबादी के हिसाब से लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए शहर को एक इंटीग्रेडेट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है। जो शहर के हर हिस्से तक पहुंचना आसान बनाए ... सुरक्षित बनाए और सस्ता भी। जरुरत मेट्रो की भी है तो बसों की भी। उपयोगी ग्रामीण सेवा भी है, जरुरत सिर्फ समुचित संचालन की है।
बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात 
दिल्ली को एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम की जरुरत है जो शहर में दौड़ने वाले ट्रैफिक पर काबू रखे साथ ही जगह-जगह लगने वाले जाम पर भी जो लोगों के वक्त के साथ साथ उनकी जेब पर भी भारी पड़ रहा है। अक्सर वीआईपी मूवमेंट भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। ध्यान इस बात का रखा जाना चाहिए कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें बजाय इसके कि ज़ोर उनका चालान काटने पर दिया जाए। 
शहर की हरियाली बरकरार रखनी होगी
हमें ध्यान रखना होगा कि विकास पर्यावरण की कीमत पर ना हो । शहर का कंक्रीट शहर की हरियाली को ना निगल जाए। दिल्ली का फेफड़ा माना जाने वाला रिज इलाका धीरे धीरे उपेक्षा का शिकार हो रहा है, अतिक्रमण दिल्ली की हरियाली को निगल रहा है। जो पेड़ सालों से नहीं गिरे सरकारी विभागों की लापरवाही की भेंट ना चढ़ें। दिल्ली अपने बाशिंदों को स्वस्थ रखे, इसके लिए जरुरी है दिल्ली खुद तंदरुस्त रहे, हरी- भरी रहे। साथ ही लगातार गिर रहे जलस्तर पर भी नज़र रखी जाए और इसके लिए जो नियम कानून बनाए गए हैं उनका सख्ती से पालन किया जाए।
साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखने की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों की है वो अपना काम ठीक से करें, दिल्ली ये गारंटी मांगती है। शहर गंदा ना दिखे, दिल्ली इसकी गारंटी भी मांगती है। दिल्ली का एक हिस्सा वो भी है जहां आप कूड़े के पहाड़ देखते है, जहां आसपास के निवासी और वहां से गुजरने वाले एक अजीब सी बू के आदी हो चले हैं। डंपिंग ग्राउंड्स और लैंड-फिल साइट्स शहर का दाग ना बन जाएं, हमें शहर चाहिए... कूड़ाघर नहीं।
अवैध कॉलोनियों का नियमन
राजधानी में जिस वक्त जगह-जगह अवैध कॉलोनियां कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं तब शायद अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि आज वो दिल्ली की इतनी बड़ी आबादी का पता बन जाएंगी। पीने के लिए पानी नहीं, कई जगह बिजली नहीं, ना सड़कें ना सीवर, विकास की वास्तव में जरुरत इन कॉलोनियों को है जहां विकास चाहिए , परस्पर समन्वय के साथ विकास। सिर्फ दावों और वादों से काम नहीं चलेगा, काम कर के दिखाना होगा क्योंकि आपके चाहते और ना चाहते हुए भी अब ये हमारे शहर का ही हिस्सा है।
यमुना को बचाना होगा 
दिल्लीवाले अपनी धरोहर यमुना को लेकर साल में कुछ ही दिन जागते हैं लेकिन हज़ारों करोड़ों रुपए फूंकने के बाद भी यमुना की हालत बद से बदतर ही हुई है। यमुना में गिरने वाले नाले तमाम सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। इससे पहले कि ये शहर अपनी नदी को हमेशा के लिए खो दे ... जरुरी कदम उठाने होंगे, सरकार को भी और इस शहर को भी।
सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर में कई जगह अभी भी सीवरेज सिस्टम पहुंचा नहीं है कई जगह अंतिम सांसे ले रहा है... और इसका नतीज़ा लोग हर साल भुगतते हैं। बदलाव और सुधार ...जरुरत यहां भी है।
भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
सरकार के लाख दावों के बावजूद राजधानी अब तक भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो पाई है। भ्रष्टाचार हमेशा से ही जनसाधारण का पसंदीदा दर्द और दर्दनिवारक मुद्दा रहा है (भ्रष्टाचार को कोस-कोसकर लोग शांत हो जाते हैं। भ्रष्टाचार से ना सिर्फ आम आदमी परेशान है बल्कि सरकारी खजाने को भी चपत लग रही है। दिल्ली सरकार के हर विभाग को भ्रष्टाचार मुक्त देखना हर दिल्लीवासी का सपना है।
औऱ अब सबसे जरुरी बात जोकि दिल्ली और दिल्ली के लोगों के लिए सबसे जरुरी है
चुनावी वादों की सच्चाई
जी हां ... चुनाव के वक्त नेता वादे तो कर जाते हैं लेकिन उन वादों की हकीकत क्या है ये अगले चुनाव आने पर ही पता चलता है जब जनता के सामने उन वादों पर हो रहे दावों की कलई खुलती है।

दिल्ली शिक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सुरक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सूचना का अधिकार चाहती है
दिल्ली ज्यादा कुछ नहीं चाहती है ... बस 
विकास का अधिकार चाहती है ... 
दिल्ली...
जीने का अधिकार चाहती है 
यही सब कुछ है जो अपनी गति से धीरे-धीरे हो गया होता तो शायद कुछ ऐसे नए मुद्दे आ गए होते जो वक्त के हिसाब से मुनासिब रहते... लेकिन मुद्दों का ये बैकलॉग सालों से है ... औऱ दिलवालों की ये दिल्ली इस बैकलॉग को कब तक बर्दाश्त कर पाती है , ये देखना होगा। ये दिल्ली अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी बखूबी जानती है , इंतज़ार कीजिए ...नतीजा आप खुद देखेंगे ... फर्क आप खुद महसूस करेंगे। 

दिल्ली की हालत फिलहाल कैसी है ये आपके सामने है ... हमें ऐसी दिल्ली चाहिए जहां विकास है तो विरासत भी । गूगल से साभार ली गई ये तस्वीर शायद यही कुछ बयां करती है। 
CTSY-GOOGLE

बुधवार, 25 सितंबर 2013

जाएं कहां ... पूछें किस से ...

पूछो तो ज़रा ...
पूछो तो ज़रा ...
उन गलियों से चौबारों से ...
सुनसान रही उन सड़कों से ...
तंग हुए दिलों ...  गलियारों से ...
हर राह वहीं जाती क्यों है
पूछो...
सड़कों से ... बाज़ारों से
क्यों शहर निगल गया लोगों को ....
ये कस्बा क्यों वीरान हुआ
पूछो तो ज़रा तुम मुर्दों से ...
तुम पूछ रहे हथियारों से ...
खून के छींटे सूख चुके हैं ...
मत पूछो ...
पत्थरों से... दीवारों से  ....
ना साथ के मेरे यारों से ...
क्यों उम्र भूल गई गुज़रा वक्त
क्या पूछें ... रक्त सनी तलवारों से ...
अब जाएं कहां ... पूछें किस से ...
चलो पूछें पहरेदारों से ...