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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

एक दरख़्त होने का मतलब


मैं एक दरख़्त हूं
शांत
स्थिरचित्त
ये मेरी इच्छा नहीं
नियति है
अब यही
स्वभाव,
ये रास्ता
ये कंकड़-पत्थर
ये माटी मेरे साथी
ये मुसाफिर
मेरे हमसफर,
बातें करता हूं
बातें सुनता हूं
वजूद से परे
रिश्ते जोड़ता हूं
लेकिन नियति क्रूर
और 
मुसाफिर मजबूर  ...
छांव तले 
छूट जाते हैं
रिश्ते अक्सर
दरख़्त हूं
संभल जाता हूं
ये इंसान कब समझेंगे
रिश्तों को छोड़ना
इच्छा है
नियति नहीं
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हेमन्त वशिष्ठ
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शनिवार, 30 नवंबर 2013

. . . . . . . ये रंग जिंदगी के . . .


ये हाथ कागज़ों से 
ये लफ्ज़ बादलों से
लिखते हुए किस्सा तेरा
हुआ ज़िक्र फासलों से . . .
पगडंडियों सी लिखावट
धुलती चली गई वो
हर शाम तुम्हें लिखा
बेताब बारिशों से . . .
हर रंग से लिपटकर
ख्वाबों ने जी समेटा
हुई धड़कनें मलंग सी
थामा जो हसरतों से . . .
उस धूप की इबारत
है वक्त के सफे पर
वो हाशिये पर लिखना
फिर रोज़ आदतों से . . .
दुआओं की ली स्याही
लिखा इबादतों से
है जिंदगी को बख्शा
खुद से ही ... ख्वाहिशों से . . . 
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हर राह पर भटक कर
सरे-राह खुद से मिलना
हर मोड़ पर हम उलझे
क्या पाया मंज़िलों से
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