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रविवार, 7 अगस्त 2016

थाह लेते चेहरे ...



कुछ चेहरे आपकी स्मृति में दर्ज हो जाते हैं, . . 
सिर्फ अपनी छवि के साथ नहीं, बल्कि अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ... 
संदर्भ सिर्फ एक तस्वीर तक ही सीमित नहीं है...  जीवन रंग-बिरंगे परिधानों (बानों) ... सजीली पगड़ियों (साफों) ... रौबीली मूछों से आगे ... उन तमाम अनुभवों में अंकित होता है, जिसकी छाप गुज़रता वक्त गाहे-बगाहे आपके चेहरे पर दर्ज करता रहता है, आपकी आंखों में सहेजता रहता है... वो अनुभव उन आंखों में से आपको ताकता है... परखता है... आपकी थाह लेता है... कि आप ज़िंदगी से उस वक्त क्या चाहते हैं, बात सिर्फ aim...click n forget सरीखी है, या फिर ये वार्तालाप एक इंसान का एक दूसरे इंसान से है। आप एक इंसान को किसी वस्तु की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं (नहीं करना चाहिए) , लेकिन वर्तमान में वस्तुनिष्ठ होना ज़्यादा प्रोग्रेसिव (प्रगतिशीलता का द्योतक) है... व्यक्तिनिष्ठ होना... सत्यनिष्ठ होना... शायद थोड़ा पीेछे छूट गया है . . .

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

एक दरख़्त होने का मतलब


मैं एक दरख़्त हूं
शांत
स्थिरचित्त
ये मेरी इच्छा नहीं
नियति है
अब यही
स्वभाव,
ये रास्ता
ये कंकड़-पत्थर
ये माटी मेरे साथी
ये मुसाफिर
मेरे हमसफर,
बातें करता हूं
बातें सुनता हूं
वजूद से परे
रिश्ते जोड़ता हूं
लेकिन नियति क्रूर
और 
मुसाफिर मजबूर  ...
छांव तले 
छूट जाते हैं
रिश्ते अक्सर
दरख़्त हूं
संभल जाता हूं
ये इंसान कब समझेंगे
रिश्तों को छोड़ना
इच्छा है
नियति नहीं
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हेमन्त वशिष्ठ
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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

अलविदा ...डॉक्टर कलाम

मैं एक गहरा कुआं हूं इस ज़मीन पर...
बेशुमार लड़के-लड़कियों के लिए कि उनकी प्यास बुझाता रहूं।
उसकी बेपनाह रहमत उसी तरह ज़र्रे-ज़र्रे पर बरसती है...
जैसे कुआं सबकी प्यास बुझाता है।
इतनी सी कहानी है मेरी...
..............
.................
....................
मैं दूसरों के लिए मिसाल नहीं बनना चाहता, 
लेकिन शायद कुछ पढ़ने वालों को प्रेरणा मिले कि अंतिम सुख रूह और आत्मा की तस्कीन है...
खुदा की रहमत उनकी विरासत है।
......................................
शब्द गुलज़ार साहब के हैं ...
जो बयां कर रहे हैं एक रूह की खूबसूरती को...
और ये खूबसूरत रूह ... डॉक्टर एपीेजे अब्दुल कलाम... 
औऱ उनकी कहानी...
कहानी उस लड़के की जो अखबारें बेचकर अपने भाई की मदद करता था... 
उसके बाद जिसकी ज़िंदगी सबके लिए एक मिसाल बन गई।
फिलहाल... रात के बारह बज चुके हैं ... एक नया दिन एक नया सूरज आपकी राह देख रहा है...
और सुबह की पहली किरण के साथ वो हमें वहां से देख रहे होंगे... 
वो ज़मीन...जहां सूरज सबसे पहले अपनी आंखें खोलता है, उगते सूरज की ज़मीन पर जहां पिछले दिन का ढलता हुआ सूरज ...  उन्हें अपने साथ उस वक्त ले गया जब वो अपना सबसे पसंदीदा काम कर रहे थे... जब वो छात्रों के बीच ज्ञान औऱ अनुभव बांट रहे थे... उनसे अपने सपने साझा कर रहे थे... उनके हौंसलों को एक नई उड़ान ...एक नई पहचान दे रहे थे।
देश के 11वें राष्ट्रपति भारत रत्न डॉक्टर अब्दुल कलाम ने छात्रों से संवाद के हर मौके का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल किया। डॉक्टर कलाम शिक्षा में रचनात्मकता के हमेशा पक्षधर रहे। एक अवसर पर छात्रों से बातचीत के दौरान किताबी ज्ञान के परे शिक्षा को रचनात्मक रूप देने पर ज़ोर दिया क्योंकि रचनात्मकता सोच की तरफ जाती है। सोच से ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान आपको महान बना देता है। 

ऐसे महान इंसान डॉक्टर कलाम के व्यक्तित्व और उनकी उपलब्धियों के सामने समूचा देश उनका ऋणी है। 

डॉक्टर कलाम सपनों पर भरोसा करते थे शायद तभी उन्होंने इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल की। उन्होंने ना सिर्फ बड़े सपने देखे बल्कि अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उन्हें पूरा भी किया। 
एक बार उन्होंने कहा था ...

मेरे पंख हैं और मैं उड़ जाउंगा, आप सब मेरे साथ उड़ान भरने के लिए तैयार हैं???

वास्तव में ... सपनों के पंख लगाकर वो सफलता की उड़ान भरते रहे और सभी को प्रेरित करते रहे खासकर बच्चों और युवाओं को... खुद में भरोसा रखने के लिए, सपने देखने के लिए... और उन्हें पूरा करने के लिए। 
अलविदा डॉक्टर कलाम ...

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

भूख की विचारधारा


रोटी की भूख
सबको बराबर सताती है
लेफ्ट या राईट होने से
आप रोटियां कम नहीं खाते हैं...
उसे गरीबी कहते हैं,
विचारधारा नहीं ...

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

उजाले की ओर . . .



ये तस्वीर आपसे कुछ कहना चाहती है... 
ये बेफिक्री... कुछ कहना चाहती हैं...
कुछ कहना चाहते हैं ये चेहरे...
ये चेहरे... अनजाने से...
कुछ साफ कुछ धुंधले ...
लेकिन मुस्कुराहट... वही जानी-पहचानी... 
आशाओं वाली... उम्मीदों वाली... 
बिल्कुल वही...
उस ऐड फिल्म की तरह... 
उम्मीदों वाली धूप... 
sunshine वाली आशा... 

कैमरे में मैने इस पल को तो कैद कर लिया लेकिन और भी बहुत कुछ था इस पल के साथ जुड़ा हुआ जो मैं उस वक्त देख रहा था, महसूस कर रहा था। मैं उस पल को वास्तविकता में जी रहा था जो एक कैमरा आप तक पहुंचा तो सकता है लेकिन उसे एक इंसान की तरफ भावनात्मक तौर पर महसूस और बयां करने में अभी शायद समर्थ नहीं है।
कुछ वक्त पहले किसी काम के सिलसिले में गांव जाना हुआ। ये तभी था, जब गांव के स्कूल से लौटते इन बच्चों से मुलाकात हुई।
और यही कुछ ऐसे पल होते हैं जो आपको जाने-अनजाने बहुत कुछ दे जाते हैं।
सालों पहले एक शब्द से साबका हुआ,  जिजीविषा... शाब्दिक और संदर्भित अर्थ तो तत्काल उपयोगानुसार ग्रहण कर लिया गया लेकिन वास्तविक अर्थ... वास्तविकता का दर्शन... इसी जीवन दर्शन से हुआ। आखिर क्या होती है ये जिजीविषा। तमाम विषमताओं और तमाम अभावों के बीच ज़िंदगी कैसे पनपती है... हमारे शहरों से ज़िंदगी के कुछ सबक शायद अछूते रह जाते हैं।


स्कूल से लौटते इन बच्चों के चेहरे थकान से उतरे हुए नहीं बल्कि खुशी से दमक रहे थे, इन बच्चों के होठों पर कोई शिकायत नहीं थी बल्कि वो स्कूल में सीखा कोई गीत गुनगुना रहे थे और सिर्फ गुनगुना नहीं रहे थे बल्कि बुलंद आवाज़ में मास्टर जी द्वारा सिखाए गए पाठ को याद करते जा रहे थे।  इन बच्चों को घर जाकर ट्यूशन नहीं जाना था, ना किसी डांस क्लास में जाना था, ना कहीं म्यूज़िक क्लास में जाना था। घर पर टीवी तो शायद होगा ही लेकिन उस पर तमाम चैनल होंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं। शहर की सभी सुविधाओं की तुलना नहीं करूंगा, वो शायद तर्कसंगत नहीं होगा लेकिन इन बच्चों को घर जाकर आराम करने को भी मिलेगा ये भी तय नहीं था, और ये शायद इस तरफ ध्यान भी नहीं देते होंगे। लेकिन ये बच्चे खुश थे, स्कूल जाकर ... इनकी बातों में स्कूल ना जाने के बहाने नहीं थे... आज की बातें थी, कल की मुलाक़ातें थीं, सपने थे, बालसुलभ जिज्ञासा थी।
कुछ दिन पहले एबीपी न्यूज़ चैनल पर कार्यक्रम रामराज्य देखा। कार्यक्रम के बारे में बहुत चर्चा सुनी थी, इसलिए देखने की जिज्ञासा भी थी और उस दिन का वो कार्यक्रम देखना व्यर्थ नहीं था। रामराज्य के उस एपिसोड में फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली की बात की गई थी। कुछ ऐसा नहीं था जो इस धरती पर संभव ना हो, कुछ ऐसा नहीं था जो हमारे संसाधनों से परे हो। कुछ ऐसा नहीं था जो हमारे इतिहास से बढ़कर समृद्ध, सक्षम, समर्थ, विविधतापूर्ण और गौरवशाली हो।
क्या ऐसा हमारे अपने देश, हमारे अपने शहरों और हमारे अपने गांवों में नहीं हो सकता है। हालांकि ये सोच... बहुत पहले से हमारी व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन एक आदर्श के तौर पर इस सोच का साकार होना अभी बाकी है . . .

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

पेशेवर... एहसान-फरामोश

हर हर्फ़ चुप है
क्यूँ क़लम चुप है
नज़रें बेबस नहीं 
बेशर्म हैं...
और चुप हैं
पर्दे के पीछे विकृत से
गुनहगार हैं चेहरे 
ख़ामोश हैं
ये किन लोगों से इंसाफ़ चाहिए तुम्हें
ये कमज़र्फ हैं 
पेशे से एहसानफरामोश हैं ...

रविवार, 27 जुलाई 2014

झूठा बचपन ... रूठा बचपन


एक बचपन है झूठा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
दिन बहुत लंबा है, पेट है खाली...
ये बचपन है...
दिन भर के बोझ से टूटा सा...
सतरंगी हैं गुब्बारे,
और डोर से ज़ख्मी हथेलियां,
नींद में ही सही मचलती तो होगी...
कलम पकड़ने के लिए...
दोपहर के सूरज तले...
कलम बेचती नन्ही सी उंगलियां...
क्यूं बचपन की खुशियों से,
ये बचपन है छूटा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
रेड-लाइट पर भागता...
कातर निगाहों से ताकता...
भीड़ में चेहरे नहीं रोटी ढूंढता है ...
रोज़ सड़कों पर ...
ये बचपन भूखा सा...
अपनों से रूखा सा...
मढ़ी हुई है सूखी चमड़ी ...
मुट्ठी भर हाड़-मांस पर ...
ये बचपन है,
पसलियों तक सूखा सा ...
जिंदा शरीर...मुर्दा ख्वाब ...
बस उनके बोझ को ढोता सा ...
बुझे हुए अरमानों का बचपन...
ये बचपन,
जैसे एक धोखा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
लम्हों को सीता हुआ ...
खाली सा ...रीता सा...
जूठन को धोता वो,
खुरचन पर जीता सा...
सपनों से रूठा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
  

शनिवार, 30 नवंबर 2013

. . . . . . . ये रंग जिंदगी के . . .


ये हाथ कागज़ों से 
ये लफ्ज़ बादलों से
लिखते हुए किस्सा तेरा
हुआ ज़िक्र फासलों से . . .
पगडंडियों सी लिखावट
धुलती चली गई वो
हर शाम तुम्हें लिखा
बेताब बारिशों से . . .
हर रंग से लिपटकर
ख्वाबों ने जी समेटा
हुई धड़कनें मलंग सी
थामा जो हसरतों से . . .
उस धूप की इबारत
है वक्त के सफे पर
वो हाशिये पर लिखना
फिर रोज़ आदतों से . . .
दुआओं की ली स्याही
लिखा इबादतों से
है जिंदगी को बख्शा
खुद से ही ... ख्वाहिशों से . . . 
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हर राह पर भटक कर
सरे-राह खुद से मिलना
हर मोड़ पर हम उलझे
क्या पाया मंज़िलों से
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