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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

अलविदा ...डॉक्टर कलाम

मैं एक गहरा कुआं हूं इस ज़मीन पर...
बेशुमार लड़के-लड़कियों के लिए कि उनकी प्यास बुझाता रहूं।
उसकी बेपनाह रहमत उसी तरह ज़र्रे-ज़र्रे पर बरसती है...
जैसे कुआं सबकी प्यास बुझाता है।
इतनी सी कहानी है मेरी...
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मैं दूसरों के लिए मिसाल नहीं बनना चाहता, 
लेकिन शायद कुछ पढ़ने वालों को प्रेरणा मिले कि अंतिम सुख रूह और आत्मा की तस्कीन है...
खुदा की रहमत उनकी विरासत है।
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शब्द गुलज़ार साहब के हैं ...
जो बयां कर रहे हैं एक रूह की खूबसूरती को...
और ये खूबसूरत रूह ... डॉक्टर एपीेजे अब्दुल कलाम... 
औऱ उनकी कहानी...
कहानी उस लड़के की जो अखबारें बेचकर अपने भाई की मदद करता था... 
उसके बाद जिसकी ज़िंदगी सबके लिए एक मिसाल बन गई।
फिलहाल... रात के बारह बज चुके हैं ... एक नया दिन एक नया सूरज आपकी राह देख रहा है...
और सुबह की पहली किरण के साथ वो हमें वहां से देख रहे होंगे... 
वो ज़मीन...जहां सूरज सबसे पहले अपनी आंखें खोलता है, उगते सूरज की ज़मीन पर जहां पिछले दिन का ढलता हुआ सूरज ...  उन्हें अपने साथ उस वक्त ले गया जब वो अपना सबसे पसंदीदा काम कर रहे थे... जब वो छात्रों के बीच ज्ञान औऱ अनुभव बांट रहे थे... उनसे अपने सपने साझा कर रहे थे... उनके हौंसलों को एक नई उड़ान ...एक नई पहचान दे रहे थे।
देश के 11वें राष्ट्रपति भारत रत्न डॉक्टर अब्दुल कलाम ने छात्रों से संवाद के हर मौके का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल किया। डॉक्टर कलाम शिक्षा में रचनात्मकता के हमेशा पक्षधर रहे। एक अवसर पर छात्रों से बातचीत के दौरान किताबी ज्ञान के परे शिक्षा को रचनात्मक रूप देने पर ज़ोर दिया क्योंकि रचनात्मकता सोच की तरफ जाती है। सोच से ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान आपको महान बना देता है। 

ऐसे महान इंसान डॉक्टर कलाम के व्यक्तित्व और उनकी उपलब्धियों के सामने समूचा देश उनका ऋणी है। 

डॉक्टर कलाम सपनों पर भरोसा करते थे शायद तभी उन्होंने इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल की। उन्होंने ना सिर्फ बड़े सपने देखे बल्कि अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उन्हें पूरा भी किया। 
एक बार उन्होंने कहा था ...

मेरे पंख हैं और मैं उड़ जाउंगा, आप सब मेरे साथ उड़ान भरने के लिए तैयार हैं???

वास्तव में ... सपनों के पंख लगाकर वो सफलता की उड़ान भरते रहे और सभी को प्रेरित करते रहे खासकर बच्चों और युवाओं को... खुद में भरोसा रखने के लिए, सपने देखने के लिए... और उन्हें पूरा करने के लिए। 
अलविदा डॉक्टर कलाम ...

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

पेशेवर... एहसान-फरामोश

हर हर्फ़ चुप है
क्यूँ क़लम चुप है
नज़रें बेबस नहीं 
बेशर्म हैं...
और चुप हैं
पर्दे के पीछे विकृत से
गुनहगार हैं चेहरे 
ख़ामोश हैं
ये किन लोगों से इंसाफ़ चाहिए तुम्हें
ये कमज़र्फ हैं 
पेशे से एहसानफरामोश हैं ...

रविवार, 27 जुलाई 2014

झूठा बचपन ... रूठा बचपन


एक बचपन है झूठा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
दिन बहुत लंबा है, पेट है खाली...
ये बचपन है...
दिन भर के बोझ से टूटा सा...
सतरंगी हैं गुब्बारे,
और डोर से ज़ख्मी हथेलियां,
नींद में ही सही मचलती तो होगी...
कलम पकड़ने के लिए...
दोपहर के सूरज तले...
कलम बेचती नन्ही सी उंगलियां...
क्यूं बचपन की खुशियों से,
ये बचपन है छूटा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
रेड-लाइट पर भागता...
कातर निगाहों से ताकता...
भीड़ में चेहरे नहीं रोटी ढूंढता है ...
रोज़ सड़कों पर ...
ये बचपन भूखा सा...
अपनों से रूखा सा...
मढ़ी हुई है सूखी चमड़ी ...
मुट्ठी भर हाड़-मांस पर ...
ये बचपन है,
पसलियों तक सूखा सा ...
जिंदा शरीर...मुर्दा ख्वाब ...
बस उनके बोझ को ढोता सा ...
बुझे हुए अरमानों का बचपन...
ये बचपन,
जैसे एक धोखा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
सपनों से रूठा सा ...
लम्हों को सीता हुआ ...
खाली सा ...रीता सा...
जूठन को धोता वो,
खुरचन पर जीता सा...
सपनों से रूठा सा ...
एक बचपन है झूठा सा ...
  

शनिवार, 30 नवंबर 2013

. . . . . . . ये रंग जिंदगी के . . .


ये हाथ कागज़ों से 
ये लफ्ज़ बादलों से
लिखते हुए किस्सा तेरा
हुआ ज़िक्र फासलों से . . .
पगडंडियों सी लिखावट
धुलती चली गई वो
हर शाम तुम्हें लिखा
बेताब बारिशों से . . .
हर रंग से लिपटकर
ख्वाबों ने जी समेटा
हुई धड़कनें मलंग सी
थामा जो हसरतों से . . .
उस धूप की इबारत
है वक्त के सफे पर
वो हाशिये पर लिखना
फिर रोज़ आदतों से . . .
दुआओं की ली स्याही
लिखा इबादतों से
है जिंदगी को बख्शा
खुद से ही ... ख्वाहिशों से . . . 
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हर राह पर भटक कर
सरे-राह खुद से मिलना
हर मोड़ पर हम उलझे
क्या पाया मंज़िलों से
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रविवार, 24 नवंबर 2013

तुम एक सोच हो ...

क्यों ...
आखिर क्यों तुम बासी हो चली हो ...
ठंडी पड़ी उस चाय की तरह ....
जिसे नुक्कड़ का चायवाला बार बार गर्म कर परोस देता है ....
और सुड़क सुड़क कर तुम
पी जाते हो चुपचाप बिना किसी शिकायत के ...
उस चाय को जिसमें पत्ती से ज़्यादा ...
चाय के बर्तन का जंग महकता है ...
जिसमें चाय की पत्ती से ज़्यादा
उस पेड़ के पत्ते मिले हैं
जो ऊपर से सब कुछ देखता रहता है चुपचाप
औऱ मुस्कुराता है...
नीचे जुटी बुद्धि-परजीवियों की जमात
और उनकी फेसबुकिया जुगाली पर ...
क्यों ...
आखिर क्यों तुम पर असर डालने लगी हैं ...
इस नश्वर दुनिया की मायावी बातें ...
और घिनौनी लगने लगी हो तुम ...
आज जब चाय की इस दुकान पर अरसे बाद मिली हो ...
हां घिनौनी ...
बिल्कुल कांच के इस गिलास की तरह...
जिसे खरीदने के बाद कभी धोया नहीं गया ...
बस खंगाल दिया गया ...
जूठे बर्तनों से भरे एक बड़े से टब में ....
जो गंदला उठा है...
जमाने भर के लोगों की सोच से...
जो वो बची-खुची चाय के साथ
उसी गिलास में जमी
पपड़ाई मलाई की परत के साथ छोड़ गए
तभी रह रहकर स्वाद चाय से ज़्यादा ...
जग की झूठन का कौंचता है...
क्यों ...
आखिर क्यों...
फटे हुए दूध के उबाल सरीखे...
बेस्वाद ... अपने विचारों को समेटे हो...
हंसी ठठ्ठा करते चार लोगों का ओपिनियन पोल नहीं  ...
जो ऐसे किसी भी पेड़ के नीचे बैठकर ...
ज़माने भर को चार गालियां देकर ...
खीसें निपोरते हैं ...
टूटी चारपाईयों पर बैठने वाले ये लोग ...
बिना रीढ़ के ...
तुम इनसे परे हो ...
तुम एक सोच हो...
तुम्हें जिंदा रहना है ....
कहा है ना
फेसबुकिया जुगाली नहीं...
बुद्धि-परजीवियों की जमात से परे ...
ब्लॉगिक आत्म-मुग्धता से दूर ...
तुम एक सोच हो...
तुम्हें जिंदा रहना है ....