मंगलवार, 6 अगस्त 2013

सावधान ... बयानों में गुम हैं समाधान

" लड़ाई बच्चों का खेल नहीं है " ...
 " उनसे पूछो की उनकी सरकार के वक्त ऐसे कितने मामले सामने आए थे " ...
 " सरकार को जरुरी कदम उटाना चाहिए " ...
" हम कबूतर उड़ाते रहते हैं और वो हमारी सीमा के अंदर आकर कत्लेआम मचाते रहते हैं " ...
 " भावनात्मक बातें हो रही हैं हमें मामले को समझने को जरुरत है " ... 
" पूरा देश शहीदों के परिजनों के साथ है " ...
 " टेलीविजन चैनलों पर युद्ध की बात करना आखिरी विकल्प" ... 
" जब कोई क्रिया होती है तो उसकी प्रतिक्रिया होती है "
 " ये युद्धविराम का उल्लंघन है "
 " हमारी विदेश नीति में बदलाव की जरुरत है "
 " आप विदेश नीति की बात करते है हमारी तो नीति ही नहीं है "
 " बातचीत बंद नहीं हो सकती ये तो चलती रहनी चाहिए लेकिन उसका तरीका बदलना होगा "
 " हमें इंटरनेशनल दबाव बनाने की जरुरत है " 
" बयान पर बयान लेकिन समाधान कब " 
***
--- पुंछ में पांच जवानों की हत्या ... 
सीमा में फिर घुसपैठ ... 
कुछ वक्त पहले काटे थे जवानों के सिर
हां ... याद तो है ... 
कारगिल से अब तक क्या सीखा हमने... 
जवानों की शहादत...
और शहादत पर होती सियासत ...
सब देखा है हमने  ....
आखिर क्या मायने रखती है एक जवान की जान ...
 शायद ... ' मेकअप ' के साथ ... चंद अदद बयान ...

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

पांच रुपए की प्लेट...गरीब खाए भरपेट


तू क्यों खुद को गरीब बताता है

जब 5 रुपए में तेरा पेट भर जाता है

 " आप हाईप क्रिएट करते हैं...

मैं तो बीमार हूं

मेरा काम तो 5 रुपए से भी कम में चल जाता है ... "

2 रुपए में तेरा खाना हो जाता है

फिर क्यों गरीब गरीब चिल्लाता है

" ये दिल्ली है दिल्ली ...

यहां हर चीज़ का जुगाड़ हो जाता है "

पेट तो 1 रुपए में भी भर लो

ना भरे तो 100 रुपया भी कम पड़ जाता है

 " अपनी औकात से बाहर जाकर...

क्यों तू अपनी भूख बढ़ाता है "

सपनों का शहर है मुंबई

12 रुपए में मिलता है भरपेट भोजन

महंगे सपने और सस्ता खाना

" चौंको मत ... पेट की सोच "

तू अपना दिमाग क्यों चलाता है

33 रुपए तो बहुत होंगे तेरे गुजारे के लिए

अब इससे ज्यादा तू और क्या चाहता है

वो विरोधी दल का है

उसकी बातों में क्यों आता है

वो जलता है तेरी खुशहाली से

उसे तो सिर्फ जले पर नमक छिड़कना आता है...

आटे-दाल का भाव पता है मुझे

तू गरीब है

" सिर्फ अपना घर चलाता है

नेता की भी जिम्मेदारी समझ

नेता तो पूरा देश चलाता है... "

और गरीब

वो तो कुछ समझ ही नहीं पाता है

" गरीब "

चुनावों के वक्त सबको याद आता है

वोट मांगने के वक्त

हर कोई गढ़ता है नई परिभाषा

हर कोई उसे अपना बताता है

लेकिन

गरीब जब भूखा होता है

तो उसे खाना खिलाने कोई  नहीं जाता है

गरीब जब भूखा होता है

तो उसे खाना खिलाने कोई  नहीं जाता है ...

शनिवार, 20 जुलाई 2013

अरसे से जैसे कुछ पता ही नहीं ...

अरसे से जैसे कुछ पढ़ा ही नहीं
अरसे से जैसे कुछ लिखा ही नहीं...
वक्त गुजरता रहा यूहीं बेसाख्ता...
अरसे से जैसे ...
... हमने जिया ही नहीं...
अखबार रद्दी बनते रहे...
धूल फांकती रहीं किताबें...
दोस्त फेसबुक पर मशगूल रहे...
कि ट्विटर,
थोड़ा सब्र कर ...
तुझे अभी समझा नहीं...
फिल्मों सरीखी चल रही है सांसें...
इंटरवल पता नहीं...
...है नहीं या हुआ नहीं...
मोबाइल पर मिलते रहते हैं
हर आम और खास के अपडेट
लेकिन
मेरा प्रोसेसर तो मेरे लैपटॉप सरीखा है...
आउटडेटेड हो गया...
और हमने अपडेट किया नहीं...
जिंदगी से निकलते जा रहे हैं इमोशंस
ताकि गैजेट्स और एप्स काबिल साबित हों
( मुझे तो ये MNC की साजिश लगती है)
खैर
 " जिंदगी से  निकलते / निकाले  जा रहे हैं इमोशंस
ताकि गैजेट्स और एप्स काबिल साबित हों "
हम खर्च कर बैठें हैं सारे लम्हें...
कि हमारी जेबों में कुछ बचा ही नहीं...
खरीद लेता था कभी कभी
शौकिया कुछ पत्र-पत्रिकाएं
मजमून देखकर उसके स्टॉल से
एक अरसा हुआ
अपने अखबार वाले तक से मैं मिला नहीं ...

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

क्या लिखते हो ...

सवाल - क्या लिखते हो ...
जवाब - कविताएं ...
बस फिर क्या ...
उधऱ एक दबी सी हंसी...
और इधर
बेशर्म हो चली बेबसी ...
वो हंसते चले गए...
और हम धंसते चले गए...
अपने ही आप में...
ना सवाल अपने आप उपजा था...
और ना ही जवाब...
मौका एक बुक लॉन्च का था...
जहां ये चीजें लाज़मी हो जाती हैं...
भले ही तर्कसंगत ना हो ...
खैर ... सवाल को हमने ...
तीन-चार गिलासों के हवाले किया....
औऱ कुछ ऐसा ही सुलूक मेरे सामने...
मेरे जवाब के साथ हो रहा था...
सवाल औऱ जवाब के बीच शीतयुद्ध...
अब खत्म होता दिख रहा था...
वोदका और व्हिस्की की दोस्ती रंग ला रही थी...
कहानी अभी बाकी है ....
लेकिन सारे सवाल अब तक जवाब बन चले थे....
और उन्हें बहुत मज़ा आ रहा था...
उनका मूड बन चुका था....
उन्हे शाम को हुई बैंड की परफॉर्मेंस से ज़्यादा...
उसकी लीड सिंगर याद थी....
लेखक/लेखिका के आख्यान से ज़्यादा...
उसका वस्त्र विन्यास ज्यादा याद था...
सवाल अब उस भीड़ से थे...
जो वहां जुटी थी...
सवाल उन देसी फिरंगों औऱ बेहूदों से थे...
जो असली वालों को टटोलने में लगे थे...
सवाल अपने आप से था...
कि जनाब आप खुद वहां क्या कर रहे थे...
बस्सससससससस....
बहुत हो गया....
इत्ती भी नहीं होनी चाहिए कि आदमी खुद से सवाल-जवाब करने लगे...
क्या लिखते हो' पर इतनी नौटंकी...
क्यों लिखते हो' पर तो पता नहीं क्या-क्या कर देते...
जवाब सोच कर रखते हैं ...
अगली मुलाकात के लिए...
तो साहब...
फिर मिलते हैं....
लड़खड़ाती ज़ुबान...
और डगमगाते कदमों के साथ....

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है

कलफ की तरह

चढ़ाता है वो चेहरे पर मुखौटे...

मुस्कान का मुलम्मा ...

हर रोज़ बदल जाता है

अफसोस ... ये सच है

वो इंसां तक नहीं रह पाता है ...

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...

मर जाता है आंखों का पानी ...

ज़मीर की बेपर्दगी...

वो नज़रअंदाज़ किए जाता है ...

बिना रीढ़ के वो घिसटता है...

अक्सर अपनी ही नज़रों में गिर जाता है ...

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...

बातों में राजनीति ...

हर पहलू में उसे शक नज़र आता है ...

हर आईना उसे धूर्त लगता है ...

वो खुद को पहले से ज़्यादा मक्कार पाता है ...

सोच की कंगाली मतलब क्या है ...

वो ये सोच ही नहीं पाता है...

एक घिसटने वाले जंतु के समान ...

वो तो बस लिजलिजा सा ... और घिनौना हुए जाता है ...

उसकी अप्रोच अब सैडिस्ट है ...

दूसरों के सुख ... अब वो बर्दाश्त नहीं कर पाता है ...

अब वो नौकरी को जीता नहीं है...

उसे जस्टीफाई करने में जुट जाता है ..

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...

हां ...

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...

कुछ की नियति ये कतई नहीं है ...

लेकिन जो निकृष्ट हैं...

आप गौर कीजिएगा ...

आदमी का इंसां ना रहना ...

उनकी किस्मत बन जाता है ...

मुझे अफसोस है ... मगर सच ...

वो कितना बेगैरत हो जाता है ...

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...

आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

प्लीज़ माइंड द गैप ...

"प्लीज़ माइंड द गैप "...
कृपया खाली जगह का ध्यान रखिए ...
"प्लीज़ माइंड द गैप " ...
मेट्रो की उद्घोषणा ...
और उद्घोषक पूरी कोशिश कर चुके थे ...
लेकिन वो जैसे किसी एयर बबल में कैद था ...
अपनी सोच का पुलिंदा ढोते हुए....
सावन के मेले सी भीड़ वाले ...
प्लेटफॉर्म पर भी अकेला खड़ा था...
मेट्रो के दरवाज़े के बीचोंबीच ...
जो बंद होने की कोशिश में था...
और बोगी का हर शख्स जैसे ...
यही रिपीट कर रहा था ...
"प्लीज़ माइंड द गैप" ...
और माइंड ना जाने किस उधेड़बुन में लगा था ...
वो अभी वहीं था ...
उसी जजमेंट की मीमांसा करने में लगा था...
और मन ही मन मुस्कुरा रहा था...
ठहाके लगा रहा था ...
बीच में कनखियों से आस पास देखता था ...
और फिर शून्य में ताकने लगता था...
उसे भी 3.30 का इंतज़ार था...
वो भी फैसले के इंतजार में था ...
लेकिन जब फैसला आया ...
तो वो हंस पड़ा ...
किसी चैनल पर उसने देखा और सुना...
अदालत ने रामलला के पक्ष में 2-1 से फैसला सुनाया है ...
बस वो तब से हंस ही रहा है ...
उसे लगा रामलला भी तभी से उसी के साथ चल रहे हैं...
वो दफ्तर की सीढ़ियों पर भी थे ...
रास्ते की भीड़ में भी ...
मेट्रो स्टेशन के एस्केलेटर पर भी ...
और इस बोगी में भी ,साथ ही हैं ...
अदालत के फैसले की उसी कॉपी के साथ ...
लेकिन अब भी वही आवाज़ गूंज रही है ...
"प्लीज़ माइंड द गैप "...
"प्लीज़ माइंड द गैप "...
औऱ वो देखता है ...
उसके जैसा एक और कोई है ...
जो इस वाले स्टेशन से ...
धक्का पेल भीतर घुसने की कोशिश में हैं ...
और उसके साथ भी रामलला हैं ...
फैसले की उसी कॉपी के साथ ...

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

ऐसे में कोई क्या करे ?

" नहीं यार मैं नहीं पूछूंगा ...
मेरा मन नहीं मानता ...
ये उस टाइप का लगता ही नहीं है "...
--- ' ये कैसे कह दिया आपने '...
"कभी बातें सुनी हैं आपने इसकी "...
' कभी ... हां कभी कभी ही तो बोलता है ...
जाने कौन घमंड पाले है ससुरा '...
" ये वो टाइप नहीं है यार... हम कह रहे हैं...
हम लोगों का क्लास अलग है "...
--- 'अरे टाइप-वाइप को छोड़ो गुरु ...
ई टाइप के चक्कर में हमारा हाईप बनते बनते रह गया '.....
(हा हा हा !!! ... पांच-छह लोगों के झुंड का सामूहिक अट्टहास)
सुनो बे !... यहां आओ !!!...
और फिर उन्होंने उसे धर दबोचा
और शुरु हुआ उसका पोस्टमॉर्टम...
--- सुनो जी बताओ तो ...क्या तुम लेनिन को मानते हो ?
क्या तुम कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों पर चलते हो ?
" बोलो जवाब दो "
क्या तुमने कभी कोशिश की है पिकासो को समझने की ?
मॉडर्न आर्ट के बारे में क्या सोचते हो तुम ?
एब्स्ट्रैक्ट आर्ट की समझ रखते हो तुम !!!
थिएटर हां ...हां !!!
... क्या जानते हो तुम रंगमंच के बारे में ?
क्या किसी संगोष्ठी में बुलाया गया है तुम्हें ?
--- बताओ...बताओ ...
किसी सेमिनार...परिचर्चा, परिसंवाद...
कभी इनसे साबका पड़ा है तुम्हारा ?
.... सवाल तीखे हो चले थे...
और सोच बेस्वाद...
दायरा बढ़ता जा रहा था...
और घेरा तंग होता जा रहा था...
वो अब झल्लाने लगा था...
और वे ...
औऱ बेतकल्लुफ होते जा रहे थे...
" चे "... हां तुम पर चे का असर साफ दिखलाई पड़ता है...
तुम्हारी ये टीशर्ट ... ये चे ही है ना ...
दो लोगों ने वो टी-शर्ट उतार ली ...
और बेहद करीब से उसका मुआयना किया...
लेकिन फैसला नहीं कर पाए...
कोई बात नहीं ...
' वैसे शक्ल से ही तुम ' अमुक कैंपस '
के ढाबा स्कॉलर लगते हो...
मैं पहले ही ना कहता था..
ये वहां उसी लेट-नाइट ढाबे पर खूब ठहाके लगाते देखा गया है '
बहुत खूब ...
एक फुसफुसाया...
--- " जनाब अकेले नहीं थे...
साथ में मैडम भी थी...
और दोनों वो कोने वाली झाड़ियों ...
के आसपास मृदा संरक्षण, संवर्धन के उपाय खोज रहे थे..
प्रकृति को काफी नजदीक से पढ़ रहे थे "
कईयों ने एक साथ खींसें निपोरी...
स्याले !!! ####****####
(कुछ बेहद भद्दे शब्द... और ध्वनियां ... )
"तभी तुम किसी को भाव नहीं देते हो " ...हां !!!
भाव से याद आया...
अभी उसी दिन ये किसी को
शेयर मार्केट के टिप्स भी दे रहा था...
बाज़ार भाव का भी ध्यान रखता है शायद
और कई सारे ' हूं '... अचानक से सुनाई दिए..
बाज़ार... शेयर मार्केट...
जरुर ये अमेरिका जाना चाहता है !!!
अब यहां अमेरिका कहां से आ गया ?
क्या तुम्हारी हमदर्दी रुस से है ?
वाह बेटा !!! वो मारा पापड़ वाले को ...
तभी तुम गूगल पर हां .... लगे रहते हो ओ हो हो हो !!!
ऐं ... उसने प्रतिवाद किया..
वो अब नीतियों पर उतर आए...
गाज़ा पट्टी ... उसका क्या ?
वियतनाम को तुम जायज ही ठहराते होंगे ?
इराक के वैपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन..
वो कहां रखे हैं ?
कुछ जानते भी हो ...
या कोरी हवाबाज़ी करते घूमते हो ?
अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति के क्या मायने हैं बंधु...
फिर विदेश नीति...सहमत हो ... इसकी नरमाई से,
क्या कश्मीर समस्या का हल है तुम्हारे पास ?
पत्थर फेंकने वाले चेहरों का सच जानते हो ना तुम ?
पाकिस्तान का ट्रीटमेंट ...जहन में रखे हो या नहीं ?
---बोलो---
रेड ड्रेगन... हा हां चीन...
है उसका तोड़ तुम्हारे पास ?
अजी हां... तोड़ !!!
ससुरे अभी गिरे पड़े जाएंगे ...
ड्रेगन की एक पुकार पर...
कब्जे पे कब्जा ... है किसी की हिम्मत जो चूं भी करे जाके ...
लेकिन कौन जाएगा ... मैने तो हामी भी नहीं भरी ?
फिर कौन और क्यों ?
--- न्यूज़ चैनल खबर कम दिखाते हैं..
यही कहते फिरते हो ना तुम...
वो क्या कहते हैं उनकी भाषा में...
पिल पड़े हैं उस खबर पर...
खेल जाओ प्यारे इससे पहले कोई दूसरा उस खबर को उठा ले...
कुछ जानते हो क्या होती है ,
ब्रेकिंग न्यूज ... या फिर कुछ भी चला दो ?
फुल स्क्रीन ...
हुंह... लोग आखिर यूंही सालों धूप में बाल सफेद कर पत्रकार नहीं बन जाते हैं..
समझे या नहीं...
निराला को पढ़ा है तुमने,
जानते हो अज्ञेय को,
प्रेमचंद... टैगोर ,
औऱ शेक्सपीयर को कैसे भूल गए आप,
की़ट्स की शैली ... उसकी कल्पना शक्ति... वो रस...
अरे तुमने क्या कभी सुना है इलियट का नाम ...उनकी ख्याति ?
हां .... हां ...
अब वो बोला ....
हां !!! मैं जानता हूं इन सबके बारे में ... शायद...
लेकिन उससे आपका क्या वास्ता ???
देखो तो जरा ...
वो झुंड धीमे से गुर्राया ...
---तेवर अब भी पेले पड़े हैं जनाब ...
बेटा ..." हम वो हैं जो सबकी नेकराय को एकराय बनाते हैं "
मतलब ... वो हैरान था !!!
*** झुंड अब थोड़ा सा इनफॉर्मल हुआ....
उसके कानों में फुसफुसियाते हुए बोला...
"शामिल हो जाओ इस झुंड में...
आ जाओ हमारे साथ....
आओ मिलकर रच डालें एक और क्रांति ...
आओ बौद्धिक विचारों का हवा दें...
दिशा दें... इन्हें इकट्ठा करें ... उन पर हावी हो जाएं ...
औऱ सब पर थोप डालें अपना मत ... अपनी सोच "
--- ज्ञान झाड़ना बंद कर झुंड अब ...
उसे पुचकारने के मोड में दिखा...
" राय रखना सीखो गुरु "....
हर मुद्दे पर ... हर अड्डे पर...
ये ससुरी राय रखना बहुत जरुरी हो गया है ...
पिछड़ जाओगे ... वर्ना ... समझे ...
चलो अभी चलते हैं... आज अभी के लिए इत्ता ही ...
(औऱ ठहाकों के साथ कदम भी धुंधले होते चले गए ...)
और वो
वो रुआंसा हो आया...
ये पहली बार नहीं हुआ था ...
उसे समझ ही नहीं आया
कि आखिर क्यों हर मामले में राय रखना...
आजकल का फैशन होता जा रहा है ? ? ?

शनिवार, 4 सितंबर 2010

वो सिर्फ एक शरीर है ...

एक अजीब सा गुनगुनाता हुआ सन्नाटा ...
सामान्य होने की कोशिश करती सांसें...
औऱ चेहरे पर जैसे उदासी की भाप लिए...
22 साल की वो ...
और उसका साथी ....
पुरानी ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मों सरीखा...
फुल स्पीड से लहराता सीलिंग फैन...
और नीचे लेटी उस लड़की के शरीर पर...
प्रकाश और छाया का अद्भुत खेल...
साथ ही समानांतर दौड़ते...
उमड़ते भाव ...
तभी सन्नाटे को चीरती एक उद्घोषणा ...
औऱ किसी शापित आत्मा सी वो खिंची चली गई...
उस दिशा में ...
जहां से पुकारा गया उसका नाम...
लेकिन वो अभी भी वहीं थी ...
बेसुध...बदहवास ... निरीह सी ...
कातर निगाहों से जहां वो ...
उस कमरे की ...माफ कीजिए...
ग्रीन रुम की दीवारों को ... छतों को ...
जाले लगे कोनों को ...
पपड़ाती सफेदी...
सस्ते फिनाइल से गंधाते फर्श को ...
साक्षी मान कर कुछ तय कर चुकी थी ...
जहां वो रिवाइंड मोड में थी ...
अचानक एक जाने पहचाने स्पर्श से ...
वो लौट आई...
वापस इस दुनिया में ...
स्पर्श रुखा था... बेजान... एकदम अजनबी सा...
लेकिन हाथ...
जरुर उस हाथ की रेखाओं को पहचानता था...
उसका दिल डूबने लगा...
लेकिन सिर को ज़ोर से झटक कर उसने...
एक लंबी सांस ली ...
विचारों को विराम देकर ...
अपने साथी को देखा... जो उसका हाथ थामे खड़ा था...
और फिर उसने सुनी पर्दे के पार से ...
वो आवाज़ें... जो कब से उसका इंतज़ार कर रही थी ...
फेड इन होते संगीत ...
और मद्धम-मद्धम प्रकाश की विविधताओं के साथ...
वो अब स्टेज पर थी ...
अब वो लहरा रही थी ...
चंद लम्हों पहले पहने पहियों वाले जूतों...
और उस हाथ के सहारे ...
जो अब भी एक दम बर्फ सरीखा था ...
और वो उससे लिपटा था एक मुर्दे के समान ...
उनके शरीर ... अब उनके नहीं थे...
तमाम हालात के बावजूद...
वो अब उस संगीत के सम्मोहन में थे...
वो उन तालियों के अधीन हो चले थे...
जो कुछ ना जानते हुए...
विस्मय से देख रही थी...
ध्वनि... प्रकाश ... संगीत और
मानवीय परिकल्पना के इस अद्भुत सम्मिश्रण को...
लेकिन लड़की का दिमाग अब भी ...
वहीं था ...
ग्रीन रुम के उसी
साथी के हाथों की कसक...
अब नहीं थी...
उसे सबकुछ एक मशीन सरीखा लग रहा था...
वो हाथ अब उसे कष्ट पहुंचा रहे थे ...
उसे याद आ रहा था ...
हर लिफ्ट पर जब वो उससे लिपट जाती थी ...
जब वो उसे दोनों हाथों से ...
अपने सिर से उपर उठा लिया करता था ...
स्टेज पर आखिर उनका साथ काफी पुराना था ...
लेकिन...
उसे डर लग रहा था...
कहीं वो जिंदगी की ही तरह...
यहां भी दगा ना दे दे ...
फिर भी...
नृत्य में लोच बरकरार थी ...
साथ ही...लोगों की उत्सुकता भी...
मन के भीतर चलता द्वंद्व...
औऱ उसकी अकुलाहट...
अब स्टेज पर भी दिखने लगी थी ...
क्योंकि स्टेज को पूरा कवर करने की बजाय...
अब वो बीच में ही
गोल-गोल घूम रहे थे...
स्पॉटलाइट की रोशनी में ...
लड़की के आंसू ...उसके मेकअप को ...
कभी का अपना बना चुके थे...
वो अब हसरतों के साथ...
अपने साथी के चेहरे को देख रही थी...
उसके दिमाग में क्या चल रहा है...
वो अब तक नहीं पढ़ पाई थी ...
उसे तो विश्वास भी नहीं हुआ...
जब उसके साथ ने उससे कहा ...
वहीं उसी ग्रीन रुम में ...
जिसे वो स्टेज तक खींच लाई थी ...
कि वो खो चुकी है अब...
उसका लगाव..
(और अपना शरीर ... मन ... और सारे अधूरे सपने )
वो नहीं है इंटेलेक्चुअली उतनी चैलेंजिंग...
जैसा उसने सोचा था ...
उसमें अब वो कशिश नहीं रही ...
आखिर रहती भी कैसे ...
आखिर कुछ भी उससे अछूता जो नहीं था ...
जाने उसका ही मन लड़की से अछूता कैसे रह गया...
गांव से आया एक लड़का ...
कैसे इतना प्रबुद्ध... इंटेलेक्चुअल ... बन गया
वो सब उसी रिवाइंड मोड में चलता चला गया ...
औऱ उसे पता नहीं चला ...
वो पीठ के बल स्टेज पर पड़ी थी ...
आंखों की पुतलियां एक तरफ घुमाईं..
तो उसे लोगों की तालियां दिखाई पड़ने लगी ...
वो संज्ञाशून्य सी ... कुछ नहीं सुन पा रही थी ...
दूसरी तरफ ... उसके जूतों के पहियें...
उसके पैरों का साथ छोड़ कर...
वहीं पास ही में पलटे हुए ... स्टेज को खरोंच रहे थे...
औऱ वो महसूस कर रही थी ...
दूर जाते हुए कदमों के कंपन को...
लोग मंत्रमुग्ध थे...
परफॉर्मेंस के इस पटाक्षेप पर ...
उनके लिए ये कुछ नया था ...
थोड़े से ड्रामे के साथ...
एक नया एंड...एक नए ट्रेंड की शुरुआत सा...
और लड़की की आंखें उस पर टिकी स्पॉटलाइट से जा मिली थी ...
उसकी आंखों की पुतलियां फैलती जा रही थी ...
और वो फिर से उसी ग्रीन रुम में जा पहुंची थी ...
प्रकाश औऱ छाया के उसी अद्भुत खेल के बीच...
जहां वो सालों से सिर्फ एक शरीर थी ...

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

बे-दिल दिल्ली ?

वो मर गई ...
पूरे चार दिन बाद ...
एक नवजात बच्ची को अकेला छोड़ कर...
शंकर मार्केट के एक फुटपाथ पर....
( हां वही शंकर मार्केट जो सीपी में है )
तो इसमें नया क्या है ?
हज़ारों मरते हैं ... फुटपाथ पर ....
कीड़े मकौड़ों की तरह ...
जीने के बाद ...
यूं ही बेचारगी की मौत ...
जिन पर मक्खियां भिनभिनाया करती हैं ...
इसका मरने का तरीका भी उतना ही घिनौना था ...
(लोग जाने क्यों ढंग से अब मर भी नहीं सकते )
जो कपड़ा इसने ओढ़ा था...
आदमी सूंघ ले तो बस ...
तस्वीर देख कर ही कईयों को उबकाई आ गई ...
हां ...
अखबार में इसकी फोटो छपी थी...
वो खुद उसे नहीं देख पाई ...
लेकिन मरते ही मशहूर हो गई ...
उसकी बच्ची ...
मां जिंदा रहती तो वो भी फुटपाथ पर ही रह जाती...
अब शायद कोई गोद ले ले ...
कई टीवी चैनलों पर खबर को जमकर ताना गया...
साथ ही...
जमकर कोसा गया ... बे-दिल दिल्ली को ...
(खबर जरा हट के थी भाई ... ह्यूमन एंगल ... भावनात्मक दोहन सरीखा कवरेज़ )
लेकिन दिल्ली वाले क्या करें...
क्योंकि ...
सड़क के दूसरी तरफ...
दिल्ली तैयार हो रही है...
सीपी के गलियारे चमकाए जा रहे है...
आईने सरीखी टाइलें लगाई जा रही हैं...
एकदम चकाचक ...
और जाने क्या क्या ...
इस तरफ की भिखारिन मरे या जिए ...
किसे परवाह है ...
वैसे भी,
कई दिन से फुटपाथ रोक कर पड़ी थी ...
वो जगह पानी से धो दी गई होगी ...
नहीं तो वापस लौटता मॉनसून...
दिल्ली वालों को निराश नहीं करेगा ...

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

बस यूं ही ...


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तू क्या लिखेगा कागज पर ..

उस बेबाकी से ... जो वक्त पर सिलवटें लिख गईं ...

वो क्या कहेंगे ...

तेरे बेजान लफ्ज ...

कांपते - हांफते...

जो बाजुओं पर यूहीं करवटें कह गई ...

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...एक अजीब सा सपना है ...

जो आजकल मैं देखता हूं...

हाथ की रेखाओं को अपनी...

बारिश के पानी में धुलते देखता हूं...

पर जाने क्यों अच्छा लगता है जब

वजूद को अपने..

बारिश की बूंदों में घुलते देखता हूं ...

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गर ख्वाबों में भी तुझे सताया...

तो तुझे क्या चाहा ...

तेरा दर्द ना अपना पाया ...

तो तुझे क्या पाया ...

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