मंगलवार, 6 अगस्त 2013
सावधान ... बयानों में गुम हैं समाधान
शुक्रवार, 26 जुलाई 2013
पांच रुपए की प्लेट...गरीब खाए भरपेट
तू क्यों खुद को गरीब बताता है
जब 5 रुपए में तेरा पेट भर जाता है
" आप हाईप क्रिएट करते हैं...
मैं तो बीमार हूं
मेरा काम तो 5 रुपए से भी कम में चल जाता है ... "
2 रुपए में तेरा खाना हो जाता है
फिर क्यों गरीब गरीब चिल्लाता है
" ये दिल्ली है दिल्ली ...
यहां हर चीज़ का जुगाड़ हो जाता है "
पेट तो 1 रुपए में भी भर लो
ना भरे तो 100 रुपया भी कम पड़ जाता है
" अपनी औकात से बाहर जाकर...
क्यों तू अपनी भूख बढ़ाता है "
सपनों का शहर है मुंबई
12 रुपए में मिलता है भरपेट भोजन
महंगे सपने और सस्ता खाना
" चौंको मत ... पेट की सोच "
तू अपना दिमाग क्यों चलाता है
33 रुपए तो बहुत होंगे तेरे गुजारे के लिए
अब इससे ज्यादा तू और क्या चाहता है
वो विरोधी दल का है
उसकी बातों में क्यों आता है
आटे-दाल का भाव पता है मुझे
तू गरीब है
" सिर्फ अपना घर चलाता है
नेता की भी जिम्मेदारी समझ
नेता तो पूरा देश चलाता है... "
और गरीब
वो तो कुछ समझ ही नहीं पाता है
" गरीब "
चुनावों के वक्त सबको याद आता है
वोट मांगने के वक्त
हर कोई गढ़ता है नई परिभाषा
हर कोई उसे अपना बताता है
लेकिन
गरीब जब भूखा होता है
तो उसे खाना खिलाने कोई नहीं जाता है
गरीब जब भूखा होता है
तो उसे खाना खिलाने कोई नहीं जाता है ...
शनिवार, 20 जुलाई 2013
अरसे से जैसे कुछ पता ही नहीं ...
अरसे से जैसे कुछ लिखा ही नहीं...
वक्त गुजरता रहा यूहीं बेसाख्ता...
अरसे से जैसे ...
... हमने जिया ही नहीं...
अखबार रद्दी बनते रहे...
धूल फांकती रहीं किताबें...
दोस्त फेसबुक पर मशगूल रहे...
कि ट्विटर,
थोड़ा सब्र कर ...
तुझे अभी समझा नहीं...
फिल्मों सरीखी चल रही है सांसें...
इंटरवल पता नहीं...
...है नहीं या हुआ नहीं...
मोबाइल पर मिलते रहते हैं
हर आम और खास के अपडेट
लेकिन
मेरा प्रोसेसर तो मेरे लैपटॉप सरीखा है...
आउटडेटेड हो गया...
और हमने अपडेट किया नहीं...
जिंदगी से निकलते जा रहे हैं इमोशंस
ताकि गैजेट्स और एप्स काबिल साबित हों
( मुझे तो ये MNC की साजिश लगती है)
खैर
" जिंदगी से निकलते / निकाले जा रहे हैं इमोशंस
ताकि गैजेट्स और एप्स काबिल साबित हों "
हम खर्च कर बैठें हैं सारे लम्हें...
कि हमारी जेबों में कुछ बचा ही नहीं...
खरीद लेता था कभी कभी
शौकिया कुछ पत्र-पत्रिकाएं
मजमून देखकर उसके स्टॉल से
एक अरसा हुआ
अपने अखबार वाले तक से मैं मिला नहीं ...
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
क्या लिखते हो ...
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है
चढ़ाता है वो चेहरे पर मुखौटे...
मुस्कान का मुलम्मा ...
हर रोज़ बदल जाता है
अफसोस ... ये सच है
वो इंसां तक नहीं रह पाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
मर जाता है आंखों का पानी ...
ज़मीर की बेपर्दगी...
वो नज़रअंदाज़ किए जाता है ...
बिना रीढ़ के वो घिसटता है...
अक्सर अपनी ही नज़रों में गिर जाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
बातों में राजनीति ...
हर पहलू में उसे शक नज़र आता है ...
हर आईना उसे धूर्त लगता है ...
वो खुद को पहले से ज़्यादा मक्कार पाता है ...
सोच की कंगाली मतलब क्या है ...
वो ये सोच ही नहीं पाता है...
एक घिसटने वाले जंतु के समान ...
वो तो बस लिजलिजा सा ... और घिनौना हुए जाता है ...
उसकी अप्रोच अब सैडिस्ट है ...
दूसरों के सुख ... अब वो बर्दाश्त नहीं कर पाता है ...
अब वो नौकरी को जीता नहीं है...
उसे जस्टीफाई करने में जुट जाता है ..
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
हां ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
कुछ की नियति ये कतई नहीं है ...
लेकिन जो निकृष्ट हैं...
आप गौर कीजिएगा ...
आदमी का इंसां ना रहना ...
उनकी किस्मत बन जाता है ...
मुझे अफसोस है ... मगर सच ...
वो कितना बेगैरत हो जाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...
आदमी पर जब ऑफिस हावी हो जाता है ...