शनिवार, 30 नवंबर 2013

. . . . . . . ये रंग जिंदगी के . . .


ये हाथ कागज़ों से 
ये लफ्ज़ बादलों से
लिखते हुए किस्सा तेरा
हुआ ज़िक्र फासलों से . . .
पगडंडियों सी लिखावट
धुलती चली गई वो
हर शाम तुम्हें लिखा
बेताब बारिशों से . . .
हर रंग से लिपटकर
ख्वाबों ने जी समेटा
हुई धड़कनें मलंग सी
थामा जो हसरतों से . . .
उस धूप की इबारत
है वक्त के सफे पर
वो हाशिये पर लिखना
फिर रोज़ आदतों से . . .
दुआओं की ली स्याही
लिखा इबादतों से
है जिंदगी को बख्शा
खुद से ही ... ख्वाहिशों से . . . 
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हर राह पर भटक कर
सरे-राह खुद से मिलना
हर मोड़ पर हम उलझे
क्या पाया मंज़िलों से
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रविवार, 24 नवंबर 2013

तुम एक सोच हो ...

क्यों ...
आखिर क्यों तुम बासी हो चली हो ...
ठंडी पड़ी उस चाय की तरह ....
जिसे नुक्कड़ का चायवाला बार बार गर्म कर परोस देता है ....
और सुड़क सुड़क कर तुम
पी जाते हो चुपचाप बिना किसी शिकायत के ...
उस चाय को जिसमें पत्ती से ज़्यादा ...
चाय के बर्तन का जंग महकता है ...
जिसमें चाय की पत्ती से ज़्यादा
उस पेड़ के पत्ते मिले हैं
जो ऊपर से सब कुछ देखता रहता है चुपचाप
औऱ मुस्कुराता है...
नीचे जुटी बुद्धि-परजीवियों की जमात
और उनकी फेसबुकिया जुगाली पर ...
क्यों ...
आखिर क्यों तुम पर असर डालने लगी हैं ...
इस नश्वर दुनिया की मायावी बातें ...
और घिनौनी लगने लगी हो तुम ...
आज जब चाय की इस दुकान पर अरसे बाद मिली हो ...
हां घिनौनी ...
बिल्कुल कांच के इस गिलास की तरह...
जिसे खरीदने के बाद कभी धोया नहीं गया ...
बस खंगाल दिया गया ...
जूठे बर्तनों से भरे एक बड़े से टब में ....
जो गंदला उठा है...
जमाने भर के लोगों की सोच से...
जो वो बची-खुची चाय के साथ
उसी गिलास में जमी
पपड़ाई मलाई की परत के साथ छोड़ गए
तभी रह रहकर स्वाद चाय से ज़्यादा ...
जग की झूठन का कौंचता है...
क्यों ...
आखिर क्यों...
फटे हुए दूध के उबाल सरीखे...
बेस्वाद ... अपने विचारों को समेटे हो...
हंसी ठठ्ठा करते चार लोगों का ओपिनियन पोल नहीं  ...
जो ऐसे किसी भी पेड़ के नीचे बैठकर ...
ज़माने भर को चार गालियां देकर ...
खीसें निपोरते हैं ...
टूटी चारपाईयों पर बैठने वाले ये लोग ...
बिना रीढ़ के ...
तुम इनसे परे हो ...
तुम एक सोच हो...
तुम्हें जिंदा रहना है ....
कहा है ना
फेसबुकिया जुगाली नहीं...
बुद्धि-परजीवियों की जमात से परे ...
ब्लॉगिक आत्म-मुग्धता से दूर ...
तुम एक सोच हो...
तुम्हें जिंदा रहना है ....

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

अस्पताल बदहाल... मरीज़ बेहाल

' अस्पताल ' ...  शब्द अपने आप में ही किसी को बीमार कर देने के काबिल है अगर इससे पहले ' सरकारी '  शब्द और जुड़ा हो
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 ... और ये आम धारणा नहीं है बल्कि अपने अनुभव से भी बता रहा हूं। 
( *** अगर आप किसी एमरजेंसी के शिकार नहीं हैं तो , भगवान ना करे आप कभी हों , अस्पताल चाहे जो भी हो)

बेशक सभी सरकारी अस्पताल ऐसे नहीं है, बेशक ये सिर्फ अस्पताल स्टाफ या सरकार की गलती नहीं है, बेशक मरीज़ों की तादाद ही इतनी है कि सरकारी अस्पतालों का सिस्टम खुद कराह रहा है, लेकिन हम सब कुछ देखकर आंखे मूंदकर तो नहीं रह सकते।

आप एम्स और सफदरजंग की बातें करते हैं लेकिन क्या राजधानी दिल्ली के कोने-कोने में जो अस्पताल हैं या डिस्पेंसरीज़ हैं,  कभी आपका वास्ता उनसे पड़ा है। ... अगर जवाब हां है तो आपसे माफी चाहता हूं कि आपको फिर से वो सब याद दिला रहा हूं ...लेकिन अगर जवाब ना में है तो दुआ करता हूं कि आपको कभी उन अस्पतालों की तरफ जाने की भी नौबत ना आए, जो आपका शरीर बेशक दुरुस्त कर दे लेकिन आपको ज़हनी तौर पर बीमार कर देते हैं।

हाल ही में एक अस्पताल में जाना हुआ जो सरकारी भी था और बीमार कर देने वाला भी । ग़ौरतलब बात ये है कि ये अस्पताल एक स्पेश्लाइज्ड अस्पताल है औऱ आंखों के इलाज के लिए जाना जाता है । ये कोई जनरल अस्पताल नहीं था जहां हर तरह की बीमारी के इलाज के लिए लोग पहुंचते हैं।

अनुभव ही ऐसा रहा कि आपसे जरुर शेयर करना चाहूंगा। 

शुरुआत अस्पताल के मेन गेट से ही हुई। जहां दो गार्ड वर्दी में तैनात थे और एक असिस्टेंट सादी वर्दी में । एक गाड़ी मुझसे पहले ही अदर जा रही थी और दूसरी गाड़ी देखते ही उन्होंने दरवाज़ा करीब-करीब गाड़ी के बोनट पर ही बंद कर दिया और ऊपर से शिकायत भी दर्ज कराई कि मैं उन्हें गाड़ी के बोनट पर बिठा कर ले जाना चाहता हूं । अपने एक परिचित का हवाला देने पर ही अंदर जाने दिया गया नहीं तो वीज़ा ना होने के चलते मुझे शायद वापस लौटा दिया जाता ।

प्राइवेट अस्पताल भले ही पैसे लेकर ... लेकिन पार्किंग की व्यवस्था करा देते हैं लेकिन सभी सरकारी अस्पतालों में ऐसी किसी सुविधा की अपेक्षा आप ना करें तो बेहतर होगा । अगर अपनी गाड़ी से जा रहे हैं तो मेरी सलाह यही है कि गाड़ी उपयुक्त पार्किंग में ही खड़ी करें इधर-उधर नहीं। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो अस्पताल के साथ-साथ आपको थाने के भी चक्कर काटने पड़ सकते हैं । यहां आपकी नज़रें हटीं और वहां आपकी गाड़ी। चोरी नहीं जनाब, एकदम खालिस सरकारी तरीके से सरकारी औऱ प्राइवेट स्टाफ मिलकर आपकी गाड़ी को एक अदद क्रेन की सहायता से ले जाते हैं ।

भले ही आपकी मजबूरी हो ...  "  लेकिण गलती तै गलती सै जनाब ... इब तै या तै थाणे तै अपणी गाडी छुड़ा लियो या फिर कोर्ट तै या फिर  ..." । जी हां ... यही तो होता है ना । 

खैर ... अपन एक बार ये सब बाहर होता देख चुके थे, जब मौके पर मौजूद जनाब ने मुझे भरोसा दिया कि वो मेरी गाड़ी को हाथ तक नहीं लगाएंगे लेकिन कोई दूसरी क्रेन वाला उनके इलाके में आकर गाड़ी ले जाए तो उस हालत में जनाब कुछ नहीं कर पाएंगे । और मेरे देखते ही देखते उन जनाब ने एक से दो चक्करों में वहां खड़ी सारी बाइक्स सुरक्षा के लिहाज़ से थाने में जमा करवा दी और एक गाड़ी के साथ तीसरे चक्कर में वो ऐसा ही कर रहे थे। मैने  कोशिश की औऱ गाड़ी अस्पताल के भीतर पार्क करने में कामयाब रहा ।

दरअसल जान-पहचान के एक सज्जन यहां कार्यरत हैं लिहाज़ा ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती है , काम जहां रुकता है जान-पहचान काम करा देती है , नहीं तो मेरे परिवार वालों के मुताबिक ऐसे किसी अस्पताल की तरफ रुख करना भी मुझे पसंद नहीं। लेकिन ये पसंद हर किसी की तो नहीं हो सकती है । जरुरत और मजबूरी ... पसंद से नहीं ... बेवक्त आते-जाते हैं।

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बाहर से अस्पताल जितना साफ-सुथरा लगा ( जी हां ... सरकारी औऱ साफ-सुथरा) ... भीतर उतनी ही भीड़ और रेलमपेल थी।
त्योहारों के दिनों में आप शायद कभी नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली या फिर निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन गए हों... वहां का हाल आपने देखा होगा ... दमघोंटू भीड़ ... कानों को बहरा कर देने वाला शोर ... बदबू ऐसी कि आप सांस लेने से परहेज़ करें।  कमोबेश यही हाल हर अस्पताल का है... सरकारी अस्पताल का है । होता है या फिर हो जाता है ।


आप अंदाज़ा ही नहीं लगा पाते हैं कि आखिर इतने लोग आते कहां से हैं ... चाहे वो सड़कें हों... रेलवे स्टेशन... बस अड्डे ... मेट्रो ... बसें ... बाज़ार या फिर बेशक अस्पताल ... आखिर इतने लोग ... वो भी इतनी तकलीफ में । ऐसे माहौल में उनका ठीक होना वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है। गलती डॉक्टरों की नहीं है वो भी इंसान हैं। काम का बोझ ही इतना ज्यादा हो कि कभी कभी वो झल्लाहट के रुप में दिखाई दे जाता है।

एक डॉक्टर ने एक मरीज़ को अपना नंबर दिया ताकि कभी जरुरत पड़ने पर वो फोन कर सके। और जितना उनके वार्तालाप से मैं समझ पाया ये एक दिन पहले की घटना थी और वो मरीज़ लगातार डॉक्टर साहब को फोन पर फोन किए जा रहा था। भले आदमी वो डॉक्टर है, आप खुशकिस्मत हैं कि आपको नंबर मिला ... बेजा इस्तेमाल तो ना करो। डॉक्टर साहब को परेशान तो ना करो। और डॉक्टर साहब मैने भी देखा था ... मरीज़ नासमझ था, आप तो समझदार हैं... भले आदमी क्या बातचीत का वो लहजा आपको या किसी भी डॉक्टर को शोभा देता है । 

ओपीडी ... हर अस्पताल की ओपीडी जैसी ही थी । भीड़ और शोर-शराबा ... मिन्नतें ... बदतमीजियां ... बदइंतजामी ... बेबसी ... अपने नाम की आवाज़ सुनने को आतुर कान और डॉक्टर की कुर्सी की तरफ टकटकी लगाकर देखती दसियों-बीसियों जोड़ी आंखें।

और इसी भीड़ के बीच एक बुजुर्ग आऱाम से खाना खा रहा था... भूख सब कुछ भुला देती है ।

 इसी शोर-शराबे के बीच एक महिला अपने पति के साथ बैठी थी, पति फर्श पर सो रहा था... शायद चेकअप के लिए ही आया था।

इसी चीख-चिल्लाहट के बीच कई जोड़ी बुजुर्ग आंखें चेहरे पर बिना किसी शिकायत के ... जहां जगह मिली वहीं बैठ कर ... अपना नंबर आने का इंतज़ार कर रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर कोई अकेला था तो कोई किसी अपने के साथ ... चेहरा सब बयां कर देता है ।

इसी भीड़भाड़ के बीच एक मां अपने बच्चे के साथ चली आ रही था... मां आगे - आगे और बच्चा पीछे पीछे... बच्चा आंखों के अलावा शायद किसी और बीमारी से भी पीड़ित था... उसको उस तरह से चलते हुए देखना तकलीफदेह था... चलना शायद उससे भी ज्यादा ... लेकिन वो चल रहा था ... अपने पैरों पर ....ठीक होने की उम्मीद के साथ....

शायद ऐसी ही किसी उम्मीद के साथ हम लोग भी जी रहे हैं ...

साथ ही यहां उन सैकड़ों, हज़ारों ...लाखों डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को भी नमन है जो तमाम उपलब्ध सुविधाओं के बीच अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं...

बेशक कई बार जिंदगी अपने ही तरीके से सभी को जीने का नज़रिया सिखाती है, जीने की राह दिखाती है , लेकिन जाने कितनी जिंदगियां ... इन्हीं अस्पतालों की बदौलत आज जि़ंदा हैं ... उनका वजूद कायम है। 
बेशक कई बार मायूसी होती है ... लेकिन उम्मीद ... उम्मीद हर मर्ज़ की दवा है ... और भरोसा हर दर्द का इलाज ।

बुधवार, 6 नवंबर 2013

Delhi : You Suggest - दिल्ली समस्याएं और समाधान


एक कदम हम बढ़ाएं
एक कदम तुम
एक कदम हम बढ़ाएं
एक कदम तुम
गाएं खुशियों का तराना
गाएं खुशियों का तराना
साथी हाथ बढ़ाना ... 
साथी हाथ बढ़ाना ...


एक नुक्कड़ नाटक में इन पंक्तियों का इस्तेमाल किया था कॉलेज के दिनों में, आज भी प्रासंगिक है... हमेशा रहेंगी । क्योंकि बदलाव, सुधार या विकास तभी हो सकता है जब आपके परिवेश में एक से ज़्यादा आयाम उसे अपनाना चाहते हों। सरकार हो, विपक्ष या आम जनता ... जिम्मेदारी सभी की है। 

इससे पहले हम बात कर चुके हैं उन समस्याओं की, जिनसे आपकी दिल्ली, हमारी दिल्ली रोज़ाना जूझ रही है, हम बात कर चुके हैं उन मुद्दों की जो हमारी दिल्ली के इंटीग्रेटेड विकास के लिए अवश्यंभावी है। मुद्दे हमारे हैं तो रास्ता भी हमें ही सुझाना होगा। समस्याएं हमारी दिल्ली की हैं तो समाधान भी हमें ही सुझाना होगा ताकि इन तमाम समस्याओं से हमें जल्द से जल्द मुक्ति मिल सके।

अपराध और भयमुक्त दिल्ली
राजधानी दिल्ली को अपराध मुक्त और भयमुक्त बनाना होगा , जहां आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करें तो महिलाएं भी बिना किसी डर के जिएं।
दिल्ली पुलिस में खाली पड़े पदों को जल्द से जल्द भरा जाए, पुलिस को अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध कराए जाएं, उपयुक्त ट्रेनिंग दी जाए। 
राजधानी के बॉर्डर और महफूज़ किए जाएं। 
वीआईपी सुरक्षा में तैनात जवानों को आम लोगों की सुरक्षा में भी इस्तेमाल किया जाए। 
किसी भी देश की पुलिस का मॉडल आंख मूंदकर अपनाया ना जाए, पुलिसिंग का एक ऐसा मॉडल विकसित किया जाए जो हमारी दिल्ली की जरुरत है। 
दिल्ली जैसे शहर में जितनी विविधताएं हैं उतनी ही सुरक्षा की तरह-तरह की जरुरतें भी। 
पुलिस भले ही गृह मंत्रालय के अधीन हो या दिल्ली के , आम नागरिक का खुद को सुरक्षित महसूस करना बहुत जरुरी है।

महंगाई से मुक्ति
जिस तरह से महंगाई लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है, सरकार को ये देखना होगा कि महंगाई किसी भी तरह काबू से बाहर ना जाए। 
जमाखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, मिलावटखोरों, मुनाफाखोरों को ना बख्शा जाए।
सप्लाई और डिमांड का सामंजस्य बनाकर रखा जाए, नए नियम बनाने की शायद जरुरत ना पड़े लेकिन जो भी नियम हैं उनका कड़ाई से पालन किया जाए। 
करप्शन को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त ना किया जाए, महंगाई तभी काबू में रह पाएगी।

बिजली-पानी का अधिकार
निजीकऱण अगर समाधान है तो उसे समस्या ना बनने दिया जाए। उसे लाल-फीताशाही की भेंट ना चढ़ने दिया जाए।
निजी कंपनियों पर नज़र रखी जाए, औचक ऑडिट को प्राथमिकता दी जाए, लोगों से जुड़ा मुद्दा है, लिहाज़ा ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल किया जाए ताकि कहीं बिल ज्यादा है तो क्यों है ये पता किया जा सके। पारदर्शिता बहुत जरुरी है, इसके लिए सिस्टम में लोगों को शामिल करना बहुत जरुरी है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका उनसे सीधा सरोकार है।
साथ ही जो लोग कानून का पालन नहीं करते हैं उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, पानी-बिजली चोरों को ना बख्शा जाए।

विकास में सामंजस्य
विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है ये मैने पहले भी कहा था। सामंजस्यता के अभाव में विकास अपनी उपयोगिता खो बैठता है।
आबादी अगर 10,000 लोगों की है तो सुविधाएं भी उसी अनुपात में हो, अन्यथा विकास और सुविधाएं अपनी सार्थकता खो बैठते हैं।
या फिर दो बड़ी सड़कों को जोड़ने वाली सड़क बदहाल हो तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है।
एक फ्लाईओवर या अंडरपास बनता है तो उसके आसपास भी ध्यान देना होगा, विकास में सामंजस्य जरुरी है।

विकास की समग्रता
विकास की समग्रता होना बेहद जरुरी है, अगर आप कनॉट प्लेस को रेनोवेट करते हैं तो पुनर्वास कॉलोनियों के विकास का भी आपको ध्यान रखना होगा।
अगर नई दिल्ली की सड़कें चमचमाती हुई हों तो बाहरी दिल्ली के लोगों को भी सड़क का हक है।
बारिश में शहर तालाब ना बने ये प्लानिंग कौन करेगा।
टाउन प्लानिंग में ध्यान दिया जाए। मास्टर प्लान का विधिवत पालन किया जाए और उन चीज़ों को जगह दी जाए जो शहर की जरुरत हैं।
सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी तय की जाए।

मैंने पहले ही कहा है ... हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं !!!

प्रदूषण से निवारण
प्रदूषण शहर को धीरे-धीरे खा रहा है।
हमें सड़कों पर वाहनों की संख्या पर अंकुश लगाना होगा।
रात के वक्त दिल्ली शहर की सड़कों से गुजरने वाले भारी वाहनों की तादाद को काबू में करना होगा। हमें वैकल्पिक उपायों पर जल्द से जल्द काम करना होगा।
प्रदूषण फैलाने वाले बची-खुची फैक्ट्रियों को शहर से बाहर निकाल फेंकना होगा।
एक शहर को उसमें रहने वाले लोग ही बचा सकते हैं, लिहाज़ा हमें अपने शहर को खुद ही बचाना होगा।

बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा
शहर को एक इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है, मेट्रो को शहर के हर कोने तक पहुंचाया जाए।
जहां मेट्रो नहीं जा सकती वहां मोनो रेल या फिर कोई दूसरा उपयुक्त ट्रांसपोर्ट सिस्टम, जैसे दिल्ली परिवहन सेवा यानि डीटीसी की उपलब्धता दिन के 24 घंटों किसी ना किसी तरह बरकरार रखी जाए।
ग्रामीण सेवा , सारथी सेवा जैसी सेवाओं को रेग्युलेशंस के दायरों में चलाया जाए।
सार्वजनिक परिवहन सेवा को सस्ता रखा जाए साथ ही सुरक्षित भी।

बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात
एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम, सोचे-समझे और सिर्फ जरुरी डायवर्जन। 
वीआईपी मूवमेंट के समय बेहतर प्लानिंग।
लोगों को समय-समय पर ट्रैफिक नियमों की जानकारी देते रहना, अवेयरनेस कैंपेन चलाना। 
और साथ ही लोगों को गलती करने से रोकना प्राथमिकता रहे बजाय चालान काटने के।

शहर की हरियाली का ध्यान
पेड़ शहर को जिंदा रखते हैं। हमें जिंदा रहने के लिए अपने पेड़ों को जिंदा रखना होगा।
रिज इलाके को अतिक्रमण से बचाना होगा।
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे, और पेड़ों को कटने से बचाना होगा। कई बार पेड़ सरकारी एजेंसियों की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं तो कई बार लोग अपनी बेवकूफी के चलते जान-बूझकर भी पेड़ों को कटवा देते हैं।
जलस्तर को भी बरकरार रखना होगा।
ध्यान सरकार को भी रखना होगा, संस्थाओं को भी और हमें भी। 

साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखना जितना सरकार की जिम्मेदारी है उतनी ही यहां रहने वाले लोगों की भी।
अपने स्तर पर सभी को प्रयास करने होंगे।
हमें ध्यान रखना होगा कि हम अपने आस-पास गंदगी ना फैलाएं।
और उसके बाद सरकार को ये जिम्मेदारी लेनी होगी कि वो शहर को साफ सुथरा रखे और जिस सरकारी एजेंसी की भी जिम्मेदारी है वो पूरी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे, नहीं तो एक बार हालात काबू से बाहर जाने के बाद वापस ठीक करने में ज्यादा प्लानिंग, ज्यादा मेहनत और ज्यादा फंड्स की जरुरत होगी। शहर को कूड़ाघर बनने से रोकना होगा। 

अवैध क़ॉलोनियों का नियमन
अवैध कॉलोनियों का नियमन हो या ना हो ये भले ही बहस का मुद्दा रहा हो लेकिन अब ये इसी शहर का एक अभिन्न अंग बन चुकी हैं जहां एक शहर का आबादी का एक बड़ा हिस्सा रहता है।
अब ऐसे हालात में कोरे चुनावी वादों को छोड़कर इन कॉलोनियों के लिए एक उपयुक्त पॉलिसी की जरुरत है जो इनके अस्तित्व को विकास की समग्रता प्रदान करे। 

यमुना को बचाना होगा
एक नदी एक शहर को जीवन देती है जबकि दिल्ली एक ऐसा शहर बन गया है जो उस नदी का ही काल बन गया।
हज़ारों करोड़ों रुपए यमुना को साफ करने के नाम पर खर्च कर दिए गए लेकिन हालात जस के तस। कहां गए ये जांच का विषय है , ये बाद का विषय है... फिलहाल हमें हर हाल में यमुना हो बचाना होगा।
खादर इलाके में अतिक्रमण को रोकना होगा।
सरकारी या गैर-सरकारी हर तरीके के निर्माण पर नज़र रखनी होगी।
नदी में गिरने वाले नालों को जितना संभव हो साफ करना होगा, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की संख्या और क्षमता बढ़ानी होगी।
साथ ही नदी के बहाव को रोकने, बांधने की कोशिश करने से भी बचना होगा।

सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर के कई हिस्सों में सीवरेज सिस्टम सालों पुराना है, आउटडेटेड हो चुका है, ऐसे में हल्की सी बारिश भी झेल पाना उसके बूते से बाहर हो जाता है।
ऐसे में भुगतना वहां के लोगों को पड़ता है।
ऐसी जगहों की पहचान कर जल्द से जल्द इस सिस्टम को बदलना पड़ेगा।
साथ ही शहर के कई हिस्सों में सीवरेज सिस्टम है ही नहीं ऐसे में लोगों की इस बुनियादी जरुरत को वहां तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है, ये कोई कोरा चुनावी वायदा नहीं होना चाहिए।  

भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।
घूस लेने वालों के साथ साथ घूस देने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
हेल्पलाइन नंबर, पहचान गुप्त रखना, सही शिकायत पर कड़ी कार्रवाई और झूठी शिकायत पर सज़ा ... सिस्टम में सब कुछ है, सवाल सिर्फ मुकम्मल इस्तेमाल का है।
हमें जागरुक होना होगा, जहां जरुरत है वहां लोगों को जागरुक भी करना होगा ताकि भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली का सपना सिर्फ सपना बनकर ना रह जाए।

और अब बात सबसे जरुरी और अहम समाधान की ...

चुनावी वादों की सच्चाई
चुनावों के वक्त नेता वादे तो करते हैं
लेकिन क्या जीतने के बाद ये वादे पूरे भी किए जाते हैं,
क्या जीतने के बाद नेता पलटकर लोगों का रुख भी करते हैं।
जीतने के बाद नेता आम से खास हो जाते हैं या फिर जो खास हैं वो खास ही रहते हैं।
ऐसे में उन तक पहुंचा कैसे जाए, इस पहेली को आम जनता को ही सुलझाना होगा।
जनता और नेता के बीच के इस फासले को पारदर्शिता के उसी हथियार के जरिए मिटाना होगा जो लोकतंत्र ने हमें इस सिस्टम के हर स्तर पर प्रदान किया है। 

समस्याएं हैं तो समाधान भी है
लोग परेशान हैं तो अनजान भी हैं ...
जनता से जुड़े हर मुद्दे को उठाना होगा ...
सिस्टम में पारदर्शिता को हथियार बनाना होगा ...
दिल्ली को चलाने में बढ़े लोगों की भागीदारी
हर आवाज़ को हमें ...
जनता की आवाज़ बनाना होगा। 

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

शुक्रिया ... आकाश के रचयिता ...

समर और प्रभा ... उस वक्त सिर्फ दो किरदार नहीं थे ...
वो एक बाल-मन की सोच का सच बन चुके थे।
साहित्य क्या होता है ?
यथार्थपरक... यथार्थपूरक या फिर इससे परे ... एक अलग ही दुनिया।

बचपन इस जद्दोजहद से परे था...
वो एक अलग ही जिंदगी जी रहा था। स्कूल की किताबों और कॉमिक्स की दुनिया से परे उसे जैसे एक खज़ाना हाथ लग गया था। कक्षा...साल , तारीख... महीना ... कुछ याद नहीं , हां लेकिन जो भी पढ़ा था वो अभी तक स्मृति में अंकित है ...

बात स्कूल के दिनों की है जब सालाना गर्मियों की छुट्टियां अक्सर ननिहाल में ही बीतती थीं, अपने पैतृक गांव भी शायद उतना जाना नहीं हो पाता था। लेकिन उस वक्त जो जिया वो अब एक किस्से सरीखा ही लगता है। हालांकि गांव की जिंदगी आज भी अपनी ही गति से चलती है, फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब आपकी जान-पहचान के ज़्यादातर लोग शहर चले गए हैं, लिहाज़ा या तो वो आपको गांव में मिलते नहीं या फिर जो हैं वो आपको बमुश्किल जानते हैं।

लेकिन तब आपके पास वक्त बहुत होता था, जिंदगी को जीने का वक्त। ऐसा वक्त जिसके बारे में अब आप सिर्फ सोच सकते हैं।

एक बार ऐसे ही फुर्सत के पलों में मैं पुरानी किताबें उलट-पुलट कर पढ़ने के लिए कुछ ढूंढ रहा था, कि सारा आकाश जैसे खुद ही मेरे सामने आ गया । साथ ही सूरज का सातवां घोड़ा भी तैयार था। हालांकि तब उस स्कूली बालक को अंदाज़ा नहीं था, लेकिन आज भी उस वक्त पढ़ा हुआ एक- एक शब्द एक अहसास की तरह उस जिज्ञासु पाठक के ज़हन में अंकित है।

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सारा आकाश ...
कितनी बार पढ़ी , याद नहीं...
 अपने कितने मित्रों को भेंट की
 ( ताकि वो अंजान ना रह जाएं) ये भी याद नहीं।
लेकिन ये सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।


एक सामाजिक बंधन की मजबूरी बहुत ही सहजतापूर्वक,  शब्दों के माध्यम से एक रेखाचित्र सरीखी याद बनकर रह गई। या फिर यूं कहें कि उस दौर की एडजस्टमेंट का वो खाका जिस तरह से खींचा गया शायद उसकी प्रासंगिकता आज भी कहीं ना कहीं बरकरार है, बस किरदार बदल जाते हैं, हालात बदल जाते हैं ...

एक अरसे तक पति-पत्नी के बीच की संवादहीनता और फिर बरसों बाद उस रिश्ते का अहसास और उस रिश्ते को नए सिरे से जीने की कोशिश और फिर एक नए परिप्रेक्ष्य में उस रिश्ते का अपने वजूद के लिए संघर्ष ... और परिणति ...

' हंस ' पढ़ने का मौका बहुत बाद में मिला हालांकि अज्ञानतावश उस वक्त  ' हंस ' और ' सारा आकाश ' को एक साथ रखकर नहीं देख पाया । आपकी कुछ कहानियां जरुर पढ़ी , फिर साबका हुआ एक कहानी से  ...  'एक कहानी यह भी ' ... उसके बाद 'आपका बंटी' और फिर ' एक इंच मुस्कान ' ।

खासकर ' एक इंच मुस्कान ' जैसा प्रयोग, मैं इस तरह की साहित्यिक प्रयोगधर्मिता के बारे में सुनकर ही उसे पढ़ने को लेकर बेहद उत्साहित था, और पढ़ने के बाद ...संतुष्ट। इसके साथ ही इधर एक और डेवलपमेंट हुआ, मैं अब खुद को बंटा हुआ महसूस करता था, उसके बाद कोशिश की दोनों को ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ने की ताकि दोनों को समझ सकूं, सुपात्र नहीं हूं लेकिन फिर भी दोनों का पक्ष ... दोनों का लेखन ... अपनी जानकारी के हिसाब, संदर्भित व्याख्या के साथ ग्रहण कर सकूं। सत्य क्या है, साहित्य क्या है ...  मन्नू भंडारी का लिखा पढ़ने के बाद राजेन्द्र यादव औऱ उनका लेखन दोनों मुझे वक्त वक्त पर अपनी तरफ खींचते रहे।

हम लिखते हैं क्योंकि हम महसूस करते हैं लेकिन क्या हम वो सब कुछ लिखते हैं जो हम महसूस करते हैं। यहां  महसूस करने को जिंदगी जीने के भाव के तौर पर देखना/समझना ज्यादा सार्थक रहेगा। और यही सार्थकता मेरे जीवन में एक पाठक के तौर पर मुझे ' सारा आकाश ' में महसूस होती है।

शब्दों में छिपी भावनाएं ... हालात बयां करते वाक्य ...
तमाम जिंदगियों को समेटे साहित्य ...
और साहित्य में बसा सच ...

अब तक जो भी कुछ पढ़ सका और आगे जो भी पढ़ पाया ... वो स्मृति है ... धरोहर है ... प्रेरणा है...

कुछ सार्थक लिख पाया तो वो समर्पित होगा ....

शुक्रिया ... शुक्रिया ... शुक्रिया ... आकाश के रचयिता !!! 

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

My Delhi Manifesto- क्या चाहती है दिल्ली !!!














" दिल्ली – सपनों का शहर ... खुशियों का शहर ... उम्मीदों का शहर ... आशाओं का शहर। कुछ यही सपने लिए जाने कितने लोग दिल्ली आते हैं ...और जाने कितने यहां रहते हैं। "

बात कॉलेज के दिनों की है ... जब ये चंद लाइनें अपनी एक डॉक्यूमेंट्री के लिए लिखी थी।

सपने अब भी वैसे ही हैं, खुशियां अभी भी उतनी ही प्यारी हैं, उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं... आशाएं अब भी हैं... और इन सब के बीच अपनी दिल्ली भी कितनी बदल चुकी है। दिल्ली की जरुरतें कितनी बदल चुकी हैं... दिल्ली की आबादी कितनी बढ़ चुकी है। लेकिन क्या बढ़ती आबादी, फैलती दिल्ली और बदलती दिल्ली ... जरुरतों और विकास के बीच किसी भी तरह का सामंजस्य हम स्थापित कर पाए हैं, बड़ा सवाल ये है।
सवाल किसी सरकार या पार्टी विशेष का नहीं है।
सवाल दिल्ली का है...दिल्ली की आबादी का है...दिल्ली की जरुरतों का है...दिल्ली के विकास का है। सवाल दिल्ली के लोगों का है।
अपनी उम्र के हिसाब से दिल्ली के बदलाव का करीब-करीब तीन दशकों तक का दौर अभी तक मैने भी जिया है। मुद्दे कमोबेश वही रहे हैं ...बस वक्त वक्त पर लोगों की प्राथमिकता बदलती रहती है।

अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली
दिल्ली देश की राजधानी है। अगर इसी राजधानी के लोग खुद को सुरक्षित महसूस ना करें तो हालात वाकई चिंताजनक हैं। उस पर महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ते अपराध...छीनाझपटी...छेड़छाड़ औऱ बलात्कार ... दिल्ली पुलिस केन्द्र के अधीन हो या राज्य के, दिल्लीवालों की मांग अपराध मुक्त और भयमुक्त दिल्ली की है जो उनका अधिकार है।
महंगाई – जी हां ... दिल्ली महंगाई से मुक्ति चाहती है।
देश के किसी भी हिस्से में कहीं भी कुछ भी होता है , उसका असर सीधा राजधानी दिल्ली के बाज़ारों ... घरों ... रसोईघरों पर पड़ता है। प्याज़ रसोईघरों से निकल कर चुनावी मुद्दा बन जाती है। और बात सिर्फ प्याज़ की नहीं है महंगाई की मार से आम आदमी सालों से बेहाल है । आखिर राजधानी में रहने की कीमत लोग चुकाएं ये कहां तक जायज़ है। जीना महंगा और लगातार महंगा होता जा रहा है।
बिजली-पानी का अधिकार 
 क्या निजीकरण हर समस्या का समाधान है। सवाल भी आपके सामने है और जवाब भी।  दिल्ली जैसे शहर को 24 घंटे बिजली- पानी की दरकार है। कहीं बढ़े बिल तो कहीं बिजली नहीं ... तो कहीं पानी की बूंद तक नहीं। मानो शहर का हर हिस्सा एक अलग जिंदगी जी रहा है।
विकास में सामंजस्य  
 राजधानी दिल्ली विकास चाहती है लेकिन विकास में सामंजस्य होना बहुत जरुरी है। आप एक फ्लाईओवर बनाते हैं लेकिन जहां वो फ्लाईओवर खत्म होता है वहां सड़क इतनी संकरी हो जाती है कि आपका फ्लाईओवर जाम का समाधान नहीं जाम का सबब बनता है।
शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से औऱ शहर के बढ़ते विस्तार के साथ साथ सुविधाओं का सामंजस्य बहुत जरुरी हो जाता है। 
विकास की समग्रता 
 विकास आबादी के हर हिस्से तक पहुंचे और शहर के हर कोने तक , ये भी सुनिश्चित करना होगा। एक बारिश में ही सरकारी एजेंसियों के दावों की पोल खुल जाती है। सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं, अंडरपास बसों को अपने आगोश में ले लेते हैं । जगह-जगह सड़कों पर गड्ढे ...

 हमें वर्ल्ड क्लास दिल्ली चाहिए थर्ड क्लास नहीं।

प्रदूषण से निवारण 
 प्रदूषण से छुटकारा पाने के तमाम उपाय जैसे नाकाफी साबित होते जा रहे हैं। सड़कों पर वाहनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, रात के वक्त राजधानी से गुजरने वाले भारी वाहन हवा को इतना ज़हरीला बना देते हैं कि दिन भर आपका दम घुटा सा रहता है।
बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा 
शहर की आबादी के हिसाब से लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए शहर को एक इंटीग्रेडेट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार है। जो शहर के हर हिस्से तक पहुंचना आसान बनाए ... सुरक्षित बनाए और सस्ता भी। जरुरत मेट्रो की भी है तो बसों की भी। उपयोगी ग्रामीण सेवा भी है, जरुरत सिर्फ समुचित संचालन की है।
बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था और जाम से निजात 
दिल्ली को एक बेहतर ट्रैफिक सिस्टम की जरुरत है जो शहर में दौड़ने वाले ट्रैफिक पर काबू रखे साथ ही जगह-जगह लगने वाले जाम पर भी जो लोगों के वक्त के साथ साथ उनकी जेब पर भी भारी पड़ रहा है। अक्सर वीआईपी मूवमेंट भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। ध्यान इस बात का रखा जाना चाहिए कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें बजाय इसके कि ज़ोर उनका चालान काटने पर दिया जाए। 
शहर की हरियाली बरकरार रखनी होगी
हमें ध्यान रखना होगा कि विकास पर्यावरण की कीमत पर ना हो । शहर का कंक्रीट शहर की हरियाली को ना निगल जाए। दिल्ली का फेफड़ा माना जाने वाला रिज इलाका धीरे धीरे उपेक्षा का शिकार हो रहा है, अतिक्रमण दिल्ली की हरियाली को निगल रहा है। जो पेड़ सालों से नहीं गिरे सरकारी विभागों की लापरवाही की भेंट ना चढ़ें। दिल्ली अपने बाशिंदों को स्वस्थ रखे, इसके लिए जरुरी है दिल्ली खुद तंदरुस्त रहे, हरी- भरी रहे। साथ ही लगातार गिर रहे जलस्तर पर भी नज़र रखी जाए और इसके लिए जो नियम कानून बनाए गए हैं उनका सख्ती से पालन किया जाए।
साफ-सुथरा शहर और गंदगी से छुटकारा
शहर को साफ सुथरा रखने की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों की है वो अपना काम ठीक से करें, दिल्ली ये गारंटी मांगती है। शहर गंदा ना दिखे, दिल्ली इसकी गारंटी भी मांगती है। दिल्ली का एक हिस्सा वो भी है जहां आप कूड़े के पहाड़ देखते है, जहां आसपास के निवासी और वहां से गुजरने वाले एक अजीब सी बू के आदी हो चले हैं। डंपिंग ग्राउंड्स और लैंड-फिल साइट्स शहर का दाग ना बन जाएं, हमें शहर चाहिए... कूड़ाघर नहीं।
अवैध कॉलोनियों का नियमन
राजधानी में जिस वक्त जगह-जगह अवैध कॉलोनियां कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं तब शायद अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि आज वो दिल्ली की इतनी बड़ी आबादी का पता बन जाएंगी। पीने के लिए पानी नहीं, कई जगह बिजली नहीं, ना सड़कें ना सीवर, विकास की वास्तव में जरुरत इन कॉलोनियों को है जहां विकास चाहिए , परस्पर समन्वय के साथ विकास। सिर्फ दावों और वादों से काम नहीं चलेगा, काम कर के दिखाना होगा क्योंकि आपके चाहते और ना चाहते हुए भी अब ये हमारे शहर का ही हिस्सा है।
यमुना को बचाना होगा 
दिल्लीवाले अपनी धरोहर यमुना को लेकर साल में कुछ ही दिन जागते हैं लेकिन हज़ारों करोड़ों रुपए फूंकने के बाद भी यमुना की हालत बद से बदतर ही हुई है। यमुना में गिरने वाले नाले तमाम सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। इससे पहले कि ये शहर अपनी नदी को हमेशा के लिए खो दे ... जरुरी कदम उठाने होंगे, सरकार को भी और इस शहर को भी।
सीवरेज सिस्टम में सुधार
शहर में कई जगह अभी भी सीवरेज सिस्टम पहुंचा नहीं है कई जगह अंतिम सांसे ले रहा है... और इसका नतीज़ा लोग हर साल भुगतते हैं। बदलाव और सुधार ...जरुरत यहां भी है।
भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली
सरकार के लाख दावों के बावजूद राजधानी अब तक भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो पाई है। भ्रष्टाचार हमेशा से ही जनसाधारण का पसंदीदा दर्द और दर्दनिवारक मुद्दा रहा है (भ्रष्टाचार को कोस-कोसकर लोग शांत हो जाते हैं। भ्रष्टाचार से ना सिर्फ आम आदमी परेशान है बल्कि सरकारी खजाने को भी चपत लग रही है। दिल्ली सरकार के हर विभाग को भ्रष्टाचार मुक्त देखना हर दिल्लीवासी का सपना है।
औऱ अब सबसे जरुरी बात जोकि दिल्ली और दिल्ली के लोगों के लिए सबसे जरुरी है
चुनावी वादों की सच्चाई
जी हां ... चुनाव के वक्त नेता वादे तो कर जाते हैं लेकिन उन वादों की हकीकत क्या है ये अगले चुनाव आने पर ही पता चलता है जब जनता के सामने उन वादों पर हो रहे दावों की कलई खुलती है।

दिल्ली शिक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सुरक्षा का अधिकार चाहती है
दिल्ली सूचना का अधिकार चाहती है
दिल्ली ज्यादा कुछ नहीं चाहती है ... बस 
विकास का अधिकार चाहती है ... 
दिल्ली...
जीने का अधिकार चाहती है 
यही सब कुछ है जो अपनी गति से धीरे-धीरे हो गया होता तो शायद कुछ ऐसे नए मुद्दे आ गए होते जो वक्त के हिसाब से मुनासिब रहते... लेकिन मुद्दों का ये बैकलॉग सालों से है ... औऱ दिलवालों की ये दिल्ली इस बैकलॉग को कब तक बर्दाश्त कर पाती है , ये देखना होगा। ये दिल्ली अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी बखूबी जानती है , इंतज़ार कीजिए ...नतीजा आप खुद देखेंगे ... फर्क आप खुद महसूस करेंगे। 

दिल्ली की हालत फिलहाल कैसी है ये आपके सामने है ... हमें ऐसी दिल्ली चाहिए जहां विकास है तो विरासत भी । गूगल से साभार ली गई ये तस्वीर शायद यही कुछ बयां करती है। 
CTSY-GOOGLE

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

गली गली गुलज़ार ...इस शहर का हाल यही है

सुना था ...
कुछ लफ्ज़ छूट गए थे वहां ...
जहां आपके लबों पर पहली बार हमारा नाम आया था...
वो जगह ...
रास्ते का वो किनारा  ...
खोद डाला है ...
सुना है सीवर लाइन की मरम्मत होनी है ....
अब वो लफ्ज़ किसी दरिया की नज़र होंगे ...
मलबे का पहाड़
राह देख रहा है रोज़ ...
कब उसे दफ्न किया जाएगा ...
अब उसे भी बारिशों का इंतज़ार है ...
रोज़ रोज़ राहगीरों की ठोकरें ...
औऱ गालियों का स्वाद ...
उसकी तबियत से मेल नहीं खाता ...
मलबा है तो क्या हुआ...
दिल तो उसका भी धड़कता है ...
बारिशों में बह निकलेगा कहीं...
या फिर बन जाएगा रास्ते की कीचड़...
और लिपटा करेगा लोगों के पैरों से ...
गोया ...कोई तो माफी दिला देगा ...
ज़िल्लत से ... जहन्नुम से ...
वहीं कुछ दूर ... सुना था ...
कुछ महीनों पहले ही सड़क बिछाई गई थी ...
उस पर भी पैबंद लगने हैं ...
कई जगहों से उधड़ गया है ...
वो जो भी कुछ पहना था उसने ...
इन बारिशों से पहले ...
डामर ... हफ्तों पहले आ चुका है ...
ड्रमों से रिस रहा है ...
शायद उससे भी सड़क की बदहाली देखी नहीं जाती ...
किनारे एक उफान सा पड़ा है ...
तो कहीं एक मखमली चादर की तरह जा लिपटा है ...
सड़क से ... आखिर कब तक इंतज़ार होगा ...
जगह-जगह बोर्ड लगे हैं ...

 " आदमी काम पर है ... असुविधा के लिए खेद है "
याद है मुझे ...
ऐसे हर बोर्ड की तस्वीर खींचने के लिए ...
बच्चे की तरह मचल जाती थी तुम ...
ऐसी जाने कितनी अनगिनत तस्वीरें ...
सालों से सहेज कर रखी थी तुमने ...
उस एल्बम का वज़न अब तुमसे संभलेगा नहीं ...




वहीं सड़क किनारे ...
खुले हैं टेलीफोन के बक्से ...
अरसे से सुधारे जाने की हसरत लिए ...
और तेरे बालों की लटों की तरह ...
फैले हैं बिजली के तार ...
और उनको फुर्सत ही नहीं ....
इन लटों को सुलझा दें...
इन तारों को हटा दें ...
किस्मत की लकीरों की तरह ....
आड़ी तिरछी हो चली हैं ....
सड़कों पर खींची गई रास्ता दिखाती वो रेखाएं ...
तुम्हारी ज़िंदगी की ही तरह ...
समतल नहीं रहा उसका धरातल भी ...
फुटपाथ-डिवाइडर पर रखे गमले ...
शायद किसी के घर की अमानत बन गए हैं ...
कुछ टुकड़ों में जी रहे हैं ....
सुना है कुछ पौधे अभी भी जिंदा हैं ...
उन्हें पानी देते आना ग़र मुलाक़ात हो तो ...
वो बेंच ...
CTSY - Self

वहीं सामने वाले पार्क में...
जहां तुम बैठा करती थी ...
अब आओगी ... तो दो फूल लेते आना ...
उस बेंच की अब यादें बची हैं ...
शरीर रात के अंधेरे में किसी ने बेच खाया ...




वहीं पार्क के पास
कूड़ा फेंकने  जाना ... तुम्हें अच्छा नहीं लगता था ना ...
अब कूड़े के लिए सुबह रोज़ गाड़ी आती है ...
लेकिन जब वो आए ...
तो सारी खिड़कियां - दरवाज़े बंद कर लेना ...
गाड़ी चली जाती है ... लेकिन
कूड़ा जैसे हवा में घुला हुआ वहीं छूट जाता है ...
सुना है अंधेरे से अब भी डर लगता है तुम्हें ...
उम्र बिल्कुल भी नहीं बदल पाई तुम्हें ...
अंधेरे का डर निकाल दो ...
हां अलबत्ता बिजली के बिल से शायद तुम्हें डर लगे ...
तुम्हें नहाना बहुत पसंद था ना ...
अब आकर आदत बदल लेना ...
पीने का पानी भी ... हिचकियों की तरह आता है ...
और हां ...
जब आना हो तो ... फोन से इत्तला करना ...
वो खत जो तुमने जाने के बाद लिखा था ...
महीने बाद गैराज में पड़ा मिला था ...
कुछ खत और कागज़ात...
अक्सर वहां मिल जाया करते हैं ...
एक पूरा दिन खत समझने में लगा था ...
और तुमको अभी तक नहीं समझ पाए ...
औऱ शहर ...
शहर अब भी नहीं बदला है ...
चुनावों का मौसम जरुर है ...
शायद कुछ दिनों के लिए चमक जाए ...
वैसे शहर भर का हाल यही है ...
हर शहर का हाल यही है ...
तुम आओ तो बदल जाए ...
तुम आओ ... तो शायद संभल जाए ...
बस वो लकीरें नहीं बदलेंगी ...
जो तुमने हर दरवाज़े के पीछे बनाई थी ...
एक पूरा शहर बसा दिया था तुमने
चंद रोज़ में ...
वहां अब जाले लगे हैं ...
इस शहर की ही तरह
उस घर का भी हाल यही है ...
शायद इस शहर के  ... हर घर का हाल यही है ...
तुम आओ तो बदल जाए ...
तुम आओ ... तो शायद संभल जाए ...

बुधवार, 25 सितंबर 2013

जाएं कहां ... पूछें किस से ...

पूछो तो ज़रा ...
पूछो तो ज़रा ...
उन गलियों से चौबारों से ...
सुनसान रही उन सड़कों से ...
तंग हुए दिलों ...  गलियारों से ...
हर राह वहीं जाती क्यों है
पूछो...
सड़कों से ... बाज़ारों से
क्यों शहर निगल गया लोगों को ....
ये कस्बा क्यों वीरान हुआ
पूछो तो ज़रा तुम मुर्दों से ...
तुम पूछ रहे हथियारों से ...
खून के छींटे सूख चुके हैं ...
मत पूछो ...
पत्थरों से... दीवारों से  ....
ना साथ के मेरे यारों से ...
क्यों उम्र भूल गई गुज़रा वक्त
क्या पूछें ... रक्त सनी तलवारों से ...
अब जाएं कहां ... पूछें किस से ...
चलो पूछें पहरेदारों से ...

शनिवार, 31 अगस्त 2013

Onion & D प्याज़ Politics : D Definition D Evolution & Revolution



प्याज़ !!!

इस शब्द से डरिए मत... ये अब हमारी,  आपकी और सबकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है साथ ही इसकी महत्ता और महत्वाकांक्षा लगातार बढ़ती जा रही है  *** काश शेयर मार्केट प्याज़ से कुछ टिप्स ले पाता ***  जितना शेयर बाज़ार मेरी पहुंच में है प्याज़ भी करीब-करीब मेरे करीब होकर भी उतना ही दूर होता जा रहा है। दोनों पर मेरा कोई बस नहीं लेकिन फिर भी मेरी कोशिश है कि मैं प्याज़हित में जनसाधारण के ज्ञान में थोड़ा योगदान दूं और अपने विकसित हो रहे ज्ञान का प्रमाण दूं। इसी कड़ी में सबसे पहले मैं आपको प्याज़ की परिभाषा से अवगत कराता हूं।

गूगल पर सर्च करने के दौरान  इन तस्वीरों और विकिपीडिया पर मैने प्याज़ की परिभाषा को जैसा पाया वो ज्यों की त्यों आपके सम्मुख प्रस्तुत है।


प्याज़ (Onion) एक वनस्पति है जिसका कन्द सब्ज़ी के रूप में प्रयोग किया जाता है । भारत में महाराष्ट्र में प्याज़ की खेती सबसे ज्यादा होती है। यहाँ साल मे दो बार प्याज़ की फ़सल होती है - एक नवम्बर में और दूसरी मई के महीने के क़रीब होती है। प्याज़ भारत से कई देशों में निर्यात होता है, जैसे कि नेपालपाकिस्तानश्रीलंकाबांग्लादेश, इत्यादि। प्याज़ की फ़सल कर्नाटकगुजरातराजस्थानउत्तर प्रदेशबिहारपश्चिम बंगाल मध्य प्रदेश जैसी जगहों पर अलग-अलग समय पर तैयार होती है।
( मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से )


परिभाषा तो आपने जान ली लेकिन अब बात उपयोगिता की आती है।

जैसा कि अक्सर होता आया है जनहित में सरकार तो बाद में करेगी मैं ' हेमन्त वशिष्ठ ' अपनी जबरदस्त औऱ जबरदस्ती की दूरदर्शिता का प्रमाण देते हुए भारत देश के अलग-अलग राज्यों के सभी स्कूलों में हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में सुधार के मद्देनज़र प्याज को एक विषय या सब्जेक्ट के तौर पर नहीं तो कम से कम ऑब्जेक्ट ...एक लेख,निबंध के तौर पर शामिल किए जाने की अनिवार्यता का अनुमोदन करता हूं।

सुविधानुसार ये बदलाव बाकी विषयों में भी किया जा सकता है। जैसे बायोलॉजी में प्याज़ की चीरफाड़ ... थोड़ी महंगी पड़ेगी लेकिन अत्यंत ज्ञानवर्धक सिद्ध होगी। इंसान के दिलोदिमाग पर प्याज का कितना प्रभुत्व है इसका सही प्रमाण हमें इन्हीं शोधकार्यों से प्राप्त होगा। प्याज़ की विभिन्न परतों के बीच हमें प्याज़ के अलग अलग दामों पर इंसानों के अलग अलग रिस्पॉन्स की झलक या फिर इम्प्रिन्ट साफ नज़र आएगा।

जो काम अंग्रेजी के सब्जेक्ट में कीट्स...इलियट...शेक्सपीयर...वर्ड्सवर्थ... मिल्टन नहीं कर पाए वो प्याज़ जरुर करने में सफल साबित होगी। छात्रों को सिर्फ एक प्याज दे दीजिए फिर देखिए उनकी कल्पना शक्ति कहां तक उड़ान भरती है। किस्से... कहानियां ... कविताएं ... शब्दार्थ ... भावार्थ ... सब कुछ आपको प्याज़मय प्रतीत होगा ।

फीजिक्स के सारे सिद्धांत फिर से लिखे जाएंगे। सेब का नीचे गिरना अगर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव है तो फिर ये प्याज पर लागू क्यों नहीं होता है । आखिर क्यों प्याज़ की कीमतें इसे आम आदमी की पहुंच से लगातार ऊपर ...  और ऊपर ले जा रही है।

सेब गिरा था तो प्याज़ का गिरना भी बनता है ना लेकिन यहां तो प्याज़ के नाम पर सरकारें बनने और गिरने की बातें होती हैं । लोगों को प्याज़ के सपने दिखाए जा रहे हैं ... भले ही वो सरकार हो ... विपक्ष या फिर हमारे बीच के ही ... कुछ लोग। सरकारी प्याज़ के स्टॉल लग रहे हैं। हर कोई सस्ती प्याज़ बेचने का दावा कर रहा है।

नफे-नुकसान को दांव पर रखकर जनता की सेवा की जा रही है आखिर कैसे कोई महंगे दामों पर प्याज़ खरीद कर इतनी भारी मात्रा में जनता को उपलब्ध करा सकता है ... इसके पीछे के गणित को स्टडी करने के उपरांत हम इसके जरिए इकोनॉमिक्स विषय को भी भलीभांति समझने का सफल-असफल प्रयास कर सकते हैं ।

प्याज़ की खेती...फसल...पैदावार से लेकर उसके मंडियों तक आने का सफर । किसान को नाममात्र के भुगतान के साथ ही प्याज़ की जमाखोरी और उससे मुनाफाखोरी का ये पूरा तंत्र आपको एक सिस्टम के तहत चलने का आदी बनाता है । अगर आप चाहते हैं कि आगे निकट भविष्य में कोई आपकी एडमिनिस्ट्रेटिव समझ पर सवाल ना उठाए तो आप इस पूरे तंत्र का गहन अध्ययन अपने उपयोग या दुरुपयोग में सुविधानुसार ला सकते हैं।

इसके जरिए आप मौसम के भी एक्सपर्ट बन सकते हैं। कई बार मौसम के चलते प्याज़ की फसल पर उसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। प्याज की फसल कभी खराब हो जाती हो तो कभी खराब मौसम के चलते मंडियों तक पहुंच नहीं पाती और नतीजा प्याज़ आपको बादलों के साथ साथ दिन में तारे दिखाने लगती है।

देश की अर्थव्यवस्था से भी प्याज़ सीधे तौर पर जुड़ी हुई है । शुरुआत आपके हमारे घरों के बजट से ही हो जाती है । आप ये ना समझिए कि प्याज़ सिर्फ आपकी आंख में आंसू ही ला सकती है प्याज़ अपने पर आ जाए तो बड़ी बड़ी सरकारें घुटनों के बल चलने पर मजबूर दो जाती हैं। इस तरह से प्याज देश की राजनीति को समझने और राजनीति शास्त्र के अध्ययन का भी एक अनूठा लेकिन सशक्त माध्यम है।

उदाहरण के तौर पर ... यदि रसोई से निकल कर महिलाएं अगर सत्ता और सरकार चला सकती हैं ( चाहे वो किसी भी स्तर पर हो ) तो फिर उसी रसोई से निकला प्याज़ सरकार बना क्यों नहीं सकता भाई । बताओ ज़रा ... ये भेदभाव आखिर क्यों ... 

साम्राज्यवाद... समाजवाद ... इन  सब के बाद ये दौर अब प्याज़वाद का है। प्याज़ एक स्टेट्स सिंबल के साथ साथ राष्ट्र की पहचान भी बन सकता है। प्याज़ पर डाक टिकटें जारी होंगी, सड़कों...मोहल्लों...गलियों के नाम वहां खाई... पाई और उगाई जाने वाली प्याज़ के नाम पर तय होंगे। प्याज़वाद के इस दौर में तमाम तरह के सामाजिक और उसके समानांतर आपके लाइफ स्टाइल में बदलाव की भी आप उम्मीद कर सकते हैं।

बहुत संभव है कि  ' onion rings ' आपकी प्लेट से गायब हो जाएं और आपकी उंगलियों की शोभा बढ़ाएं, और आप  ' platinum rings ' को भूल जाएं । बैंक अपने लॉकर्स में ज्यादा से ज्यादा प्याज़ रखने वालों को प्रोत्साहित करने के नाम पर कम दरों में कर्ज मुहैया कराए और ज्यादा इंट्रेस्ट रेट भी दे।

प्याज़ आपको अपराध करने पर भी मजबूर कर सकती है । ऐसी ही एक खबर सुनने को मिली , टनों प्याज़ से भरा एक ट्रक लूट लिया गया। लूटी गई प्याज़ की कीमत लाखों में थी ऐसे में ब्लैक में बेचने पर यकीनन लुटेरों ने अपनी सात पुश्तें सुधार ली होंगी।

ये तो टनों प्याज़ थी जो लूटी गई और रिपोर्ट की गई जिससे बात हमारे संज्ञान में आई। लेकिन प्याज़ के नाम पर हमें कब तक लूटा जाता रहेगा ये आपको और हमें शायद पता भी नहीं चलता है।

लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि Dollar अगर Rupee के पीछे पड़ा है तो प्याज़ रुपए का बदला डॉलर से ले रहा है। 

Democracy है भाई जब Oil economics या फिर Oil politics काम कर सकता है तो बदलती हुई world economy में प्याज़ पॉलिटिक्स भी जरुर अपनी जगह बनाने में सफल होगा। Sensex... wall street ... nasdaq ... nifti ... euro markets ... swiss accounts ... best exotic holiday destinations हर जगह प्याज़ का बोलबाला। जो भी देश प्याज़ के export-import पर control रखेगा वहीं अगला सुपरपावर ... ooopppsss ... प्याज़पावर देश होगा ।

जस्ट इमेजिन !!!

सब्जी को स्वाद बनाने वाली प्याज कब सरकारें बनाने लगी ...
शायद उसे खुद भी पता नहीं चला।
प्याज़ के आंसू कब कसैले ...और कसैले होते चले गए ...
पता ही नहीं चला।
प्याज़ कब घर का बजट बिगाड़ने लगी ...
पता ही नहीं चला।
प्याज़ के लिए कब हम दूसरे मुल्कों के सामने हाथ फैलाने लगे ...
पता ही नहीं चला।
प्याज़ के लिए नेता कब आम जनता को ही छलने लगे ...
पता ही नहीं चला ।

प्याज़ ... प्याज़ ही तो थी ... माफ कीजिएगा ... कब वो कोढ़ में खाज बन गई ... 
पता ही नहीं चला

ये लो ... 
मैं भी तो सिर्फ प्याज़ पर निबंध लिखने चला था। 
( *** सिलेबस बदलना है ना सर *** )
कब इमोशनल हो गया ...
पता ही नहीं चला . . . 



गुरुवार, 29 अगस्त 2013

राजनीति की प्याज़


ऐ ऐ... सुनो सुनो कहां जा रहे हो ...
यहां आओ ....
हमारे यहां जो माल है वो कहीं नहीं मिलेगा ...
दिल्ली में सबसे सस्ती प्याज़ ...
सरकारी प्याज़ के स्टॉल पर मिलेगी ...
ले जाओ चुपचाप ... दो किलो के नाम पर...
डेढ़ किलो की थैली है ...
हां हां ... इसमें भी घोटाला है ...
तू क्या कर लेगा ...
हुंह ... 
खबरदार जो चूं तक की ...
जरा खाकर देखना ...
मज़ा आ जाएगा ....
तेरे ही खून पसीने की कमाई से खरीदी है ...
अब तू हमसे खरीद ले ...

अरे अरे रुको तुम जरा वहीं....
ये क्या अंधेरगर्दी है ...
हमारी प्याज सरकारी प्याज से सस्ती और अच्छी है ...
हम विपक्ष हैं ...
हम हमेशा अच्छा विकल्प ही बन कर रहते हैं ...
तो क्या हुआ जो हमारे पास खुद कोई विकल्प नहीं
बिल्ली के भाग्य से कभी तो छींका फूटेगा ...
खैर
जनता की उम्मीदों को बेच कर...
हम ये प्याज लाएं हैं ...
ले जाओ ... खरीद लो थोक के भाव ....
खुद को बेच कर मंडियों में ...
तुमने हम पर भरोसा किया था...
खा जाओ उसी भरोसे को अब मजे से फ्राई कर के ...

ओ हो ...हो हो  ....
किसने कहा है आपको इन लोगों के पास जाने को ...
हम आप लोगों में से ही हैं ...
हमने देखा आपको प्याज चाहिए...
तो हम आम आदमी के लिए प्याज भी ले आए...
बस आपके सपने बेचने पड़े...
वही सपने जो हम आपको लगातार दिखा रहे हैं ...
और ये दुकान भी सिर्फ आजभर लगेगी...
आम आदमी के सपनों का कोई मोल ही नहीं है ...
स्याला  !!! मंडी में ऐसे पिट रहे हैं ...
जैसे डॉलर के आगे रुपया पनाह मांग रहा है ...

चारों तरफ बस यही शोर
ले लो ... मेरी प्याज ले लो ....
लाल प्याज ले लो ... सफेद प्याज ले लो ... 
तुम्हारी प्याज ले लो...
हमारी प्याज़ ले लो ....
करप्शन में डूबी तुम काली प्याज़ ले लो ...
घर ले जाओगे तो पड़ोसी जलेंगे ...
बीवी प्यार करेगी ...
ऑफिस में सब्जी देख ...साथी रश्क करेंगे...
ले लो प्याज ...ले लो.............................................................................................................
.....................................................................

तभी... अचानक पसीना-पसीना होकर मेरी नींद खुल गई...
हांफता हुआ मैं रसोई की तरफ दौड़ा...
20 रुपए में दो प्याज़ खरीद कर लाया था...
फ्रीजर में संभाल कर रखे थे...
दोनों को सही सलामत पाकर....
रात के 2 बजे मैं प्याज के आंसू रो पड़ा ...

शनिवार, 24 अगस्त 2013

" तू क्या करेगा "

"  तू क्या करेगा  " ... तीन शब्द हैं । बड़े साधारण से, रोज़ाना की बातचीत में धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाते हैं बिना किसी हिचक ... झिझक... बेरोकटोक... अमूमन बिना किसी निहित स्वार्थ... भावार्थ और परमार्थ के । 
लेकिन प्रयोग यदि किसी विशेष संदर्भ में हो तो साधारण से लगने वाले शब्द... रोजाना के वाक्य और वाकये भी सोचने पर मजबूर कर देते हैं। 
उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ। आमतौर पर दोपहर के वक्त... औऱ वो भी छुट्टी वाले दिन , मैं दिनभर सोने में विश्वास रखता हूं। लेकिन उस दिन किसी कारणवश मैं जागा हुआ था, कुछ काम से कहीं जाना था लिहाजा हफ्ते भर की नींद और उतनी ही बेतरतीब दाढ़ी लिए अपने इलाके के सबसे हैपेनिंग सलून पर जा पहुंचा ।
 नाम एकदम मॉडर्न ... दाम एकदम मॉडर्न ... और काम ... खैर छोड़िए, इसके अलावा बाकी चीज़ों में सुधार की काफी गुंजाइश थी, इसके अलावा दूसरे ऑप्शन गौर फरमाने लायक भी नहीं है। लेकिन भीड़ वहां भी कम नहीं रहती है।
खैर ... हमें इनका बिजनेस मॉडल या पैटर्न स्टडी नहीं करना है, बल्कि उस दिन यहां कुछ ऐसा हुआ जिससे मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया । 
अरसे से मुझे लगने लगा था कि इंसानियत... अपनापन औऱ आत्मीयता जैसी मानवीय भावनाएं हमारे ऑफिस ( कृप्या बहुवचन संदर्भ लें) या फिर परिवेश से गायब हो चुकी हैं और इनकी जगह कदाचित ऐसी मशीनी भावनाओं ने ले ली है जो अभी खुद अपने अस्तित्व से अनजान हैं, लिहाजा इंसानों का वजूद उनके लिए कोई औचित्य नहीं रखता है । 
लेकिन मशीनी भावनाओं या फिर सीधे-सपाट शब्दों में इंसानियत के अभाव का ये वायरस हर जगह अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहा है।
हम हकीकत से रुबरु कराते इस किस्से के उस हिस्से पर सीधा पहुंचते हैं जहां इसकी शुरुआत हुई।
आज काफी दिनों के बाद मिस्टर ए से मुलाकात हुई। मिस्टर  ' ए ' एकदम खुशमिजाज किस्म के मस्तमौला उस्ताद हैं। उस्ताद इसलिए क्योंकि उस मॉडर्न शेव शॉप पर वो सबसे पुराने मुलाजिम हैं ( कायदे से पीएफ, ग्रेच्युटी वगैरह वगैरह के हकदार, लेकिन हिस्से में क्या आता है ... कम गल्ला होने पर सबके हिस्से की गालियां ... शराब का ठेका बंद होने से पहले रोज़ाना मालिक के लिए शराब और चखना लाने की जिम्मेदारी और कभी-कभी मालिक के मूड में होने पर एक-दो पैग भी गटकने को मिल जाते हैं  ) । 
उस्ताद बिना गाना सुने शेव नहीं बनाते हैं औऱ कटिंग तो बिल्कुल नहीं । उनकी बातें कुछ इस किस्म की होती हैं कि लोगों के बाल सुनते सुनते पक जाएं लिहाजा वो कलरिंग भी पूरे शौक से करते हैं। 
.........................औऱ उनकी दुकान पर छंटनी नहीं होती है जैसा कि बड़ी बड़ी कई तरह की दुकानों में बड़ी ही बेशर्मी से कर दी जाती है । .........................
खैर... जल्दी थी तो हमने उस्ताद जी से इल्तजा की, कि थोड़ा जल्दी फारिग कर दिया जाए, तो उस्ताद जी भी एकदम मौके की नजाकत को समझते हुए फौरन काम में जुट गए। मोबाइल पर गोविंदा का एक तड़कता-फड़कता सा गाना लगाया और उस्ताद का उस्तरा सटासट चालू । 
इस बीच वहीं बैठे आराम फरमा रहे एक चेले ' ई ' का फोन बजता है। चेला कुछ नया सा जान पड़ रहा था , फोन बजने से पहले तक ये नया चेला उस्ताद जी से प्रवचन सुन रहा था उसकी काहिली को लेकर । और वो सिर्फ मिमिया रहा था। फोन घर से था और मामला सीरियस जान पड़ रहा था, लिहाजा उस्ताद जी शेव बनाने में जुट गए तो चेला फोन सुनने में । 
चेले ने फोन रखा तो आंखों में आंसू थे और गला रुंधा हुआ था। उस्ताद जी ने फौरन हाथ रोका और चेले से पूछा सब खैरियत ... चेला रोने लगा । साथ के बाकी चेले ... बी , सी और डी उसे चुप कराने लगे । सुबकियों के बीच उसने बताया कि उसके चाचा की लड़की ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली है , वजह .. जाहिर सी बात है पता नहीं ...  या बताई नहीं गई, लेकिन चेले को फौरन घर बुलाया है। 
चेले ने उस्ताद जी से घर जाने की इजाजत मांगी तो उस्ताद जी ने सलून के मालिक को फोन करने की सलाह दी। आखिर उस्ताद जी भी तो लाला की चाकरी करते हैं, कैसे खुद से चेले को घर जाने के लिए बोल देते , दुकान पर तो एक अदद हैंड कम हो जाता ना , उसकी जिम्मेदारी कौन लेता। 
चेला नया था, डरते-डरते आंखों में आंसू लिए मालिक को फोन किया। दोपहर का वक्त था, मालिक आराम फरमा रहे थे लिहाजा सास-बहू सीरियल देख रही मालकिन ने फोन उठाया और परेशान करने का सबब पूछा। चेले ने डरते-डरते... रोते-रोते ... पूरी बात उन्हें बताई ।  
मालकिन जाहिर तौर पर एक महिला हीं थी, लिहाजा इनसे एक महिला सा व्यवहार ही अपेक्षित था... लेकिन वो तो मालिक से भी दो कदम आगे निकली । मालिक हो सकता है शराब के नशे में इन लोगों के साथ बदतमीजी से पेश आता हो ... वो भी शायद ... लेकिन मालकिन का जवाब चौंकाने वाला था...
मालकिन का जवाब --- जैसा बताया गया  --- " मरने वाली तो मर गई है, अब तेरे जाने से क्या हो जाएगा। बता ... तू क्या करेगा । " ...
पूरी दुकान में हर तरफ बस यहीं गूंज रहा था... 
तू क्या करेगा । वो तो मर गई है , अब तेरे जाने से क्या होगा । 
चेला रुकने की हालत में नहीं था लिहाजा उस्ताद जी ने अपने रिस्क पर उसे घर रवाना कर दिया । इंसानियत अभी घिसट-घिसट कर ही सही लेकिन जिंदा दिखाई दी। 
मैं भी शेवोपरांत घर की तरफ चल पड़ा ... लेकिन सामने रास्ता दिखाई देना बंद हो चला था... दिमाग शून्य था और मैं संज्ञाशून्य ... बस यही शब्द बार-बार सुनाई दे रहे थे ... तू क्या करेगा  ... 
" मरने वाली तो मर गई है, अब तेरे जाने से क्या हो जाएगा। 
बता ...
" तू क्या करेगा  " ...

सोमवार, 19 अगस्त 2013

........................ रिपोर्ट का इंतज़ार है ........................


**************************** DISCLAIMER ****************************

एक छोटी सी कहानी है जो हम बचपन से सुनते हुए आए हैं लेकिन कमबख्त पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं लेती है ...
हर बार एक नए कलेवर और एक नए फ्लेवर के साथ सामने आ जाती है इतराती हुई ...
चाहे मामला कितना ही संजीदा क्यों ना हो  ।
इस कहानी की मासूमियत और मार्मिकता बरकरार रहती है , पात्रों,सुपात्रों या कुपात्रों से नहीं इसकी ये विशेषताएं  तथाकथित संलिग्न भावों से उपजी हैं ।
बरसों पुरानी कहानी का ये रेट्रो- रीमिक्स एक खरपतवारी सोच का नतीजा है और लेखक के मानसिक दीवालिएपन का द्योतक है लिहाजा इसे ' जैसा है वैसा है ' की श्रेणी में रखा जाए ।
(अरे जैसा नीलामियों में होता है मानसिक - आर्थिक कंगलों ) ...
और इस कपोल कल्पना को अन्यथा तो कतई ना लिया जाए और इसका किसी भी धर्म-संप्रदाय या फिर किसी व्यवसाय से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है ।

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ये कहानी एक शहरीकृत जंगल की है , जिसकी पृष्ठभूमि में बहुत से सवाल, घटनाएं, किरदार और इन किरदारों के कहे-अनकहे किस्से जुड़े हुए हैं लेकिन हम अपना वक्त बर्बाद ना करते हुए सीधा अपने रंगमंच की तरफ लौटते हैं जहां बहुत कुछ घटित हो रहा था । 
जंगल में अमूमन जंगलराज होता है... ये सर्वविदित है , इसके लिए हमें किसी प्रकार के अनुसंधान की जरुरत नहीं है  , लिहाजा फिर भी पाठकों की उत्सुकता को बनाए रखने के लिए और लेखन की तार्किकता बरकरार रखने के लिए हमने खुद जंगल में जाकर कई प्रकार के प्रयोग किए तो पाया कि तमाम दावों के बावजूद , औद्योगिकीकरण के इस दौर में भी हम इस जंगल को किसी तरह बचाए रखने में सफल रहे , हालांकि अब जाकर जंगल में तमाम तरह के बदलाव दस्तक देने लगे थे ।
जंगल में अब लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी... पाठक यहां ध्यान दे कि जंगल यहां एकवचन नहीं बल्कि बहुवचन में इस्तेमाल किया जा रहा है । बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के चलते इंसान प्रकृति के इतना नजदीक जा पहुंचा था कि जेनेवा कन्वेशन के एक स्पेशल सेशन में पूरे ब्रह्मांड को जंगल घोषित किया जा चुका था और जंगल को अपने आप में ब्रह्मांड की संज्ञा दे दी गई थी। और इस जंगल  में जीने का तंत्र अब लोकतंत्र था, शासन का तंत्र अब लोकतंत्र था। यानि कोई अपना शासन खुलेआम किसी पर नहीं थोप सकता था, बिना लाठी के भी अब लोग भैंस लेकर घूम सकते थे। लेकिन इन सब परिवर्तनों से अगर कुछ अछूता रहा था तो वो थी जंगल के राजा शेर की हुकूमत ।
शेर बहादुर की शानो-शौकत पहले जैसी ही बरकरार थी । वही रौब-वही रुतबा ... जीने का वही अंदाज़ । अब आप वजह भी जानना चाहेंगे , और आपको जानकर ये कतई आश्चर्य नहीं होगा कि लोकतंत्र में एक तंत्र के मुताबिक हुए चुनावों में जनाब शेर अब निर्विरोध जंगल के मुखिया चुन लिए गए थे।
हालांकि चुनाव पूरे नियम कायदों के अनुसार हुए थे, जंगल में गठित चुनाव आयोग की सरपरस्ती में सैकड़ों गौरैयों का झुंड चुनाव पर्यवेक्षक बना इठला रहा था । पुराने जमाने के एक रीछ ने जरुर बालहठ में महाराजा शेर के सामने चुनाव मैदान में अंत तक डटे रहने का फैसला किया था लेकिन सठियाने की उम्र में वो वो अपनी जमानत जब्त करा बैठे थे । बाकी सभी कैंडिडेट्स को शुरु में ही मैनेज कर लिया गया था ।
शेर के चमचे सियार और गीदड़ पहले से रही आस-पास के मानवीकृत गांवों से चुनावों को मैनेज करने की सारी डीटेल जुटा चुके थे। जमकर बूथ-कैप्चरिंग हुई... चुनाव जीतने के तमाम हथकंडे अपनाए गए ... हर संभव वादे जंगल की जनता के साथ किए गए । और इसका नतीजा ये निकला कि महाराज शेर लोकतांत्रिक तरीके से भी जंगल के राजा बन गए । सर शेर बहादुर की गिनती अच्छे नेताओं में की जाती थी, एक कुशल शासक बनने के तमाम गुण उनमें सकुशल विद्यमान थे लेकिन ना जाने क्यों चुनाव होते ही सत्ता संभालने के बाद उन्होंने इस प्रकार के सभी दुर्व्यसनों से किनारा कर लिया ।
अब हर तरह के सौदों ... डील्स ... टेंडर्स के रास्ते उनके दीवान-ए-खास वाले ड्राइंगरुम से निकलते थे तो उनके दुश्मनों के लिए रास्ते... उनके किचन से । अरे भाई शेर आखिर शेर ही होता है ना और जंगल का राजा शेर भूखा मर जाएगा लेकिन घास नहीं खाएगा। 
वैसे किसी भी सत्ता प्रणाली की ही तरह पावर का असली मजा महाराज शेर बहादुर के प्यादे यानि कि ... गीदड़, सियार, लोमड़ी वगैरह वगैरह किस्म के जीव कर रहे थे। कुछ ने तमाम तरह की संस्थाएं दानस्वरुप हथिया ली थीं तो कुछ अपने बिजनेस को नए आयाम देने में लग गए थे। हमारी कहानी का बिजनेस इसी से जुड़ा हुआ है...जैसा कि पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है कि वक्त की कमी से आजकल सभी जूझ रहे हैं फिर चाहे वो लेखक हो ... पाठक हो या फिर खुद किसी किस्से-कहानी के पात्र या फिर उनके बुझते परिवेश औऱ संवाद ... इसलिए हम निहायत ही कम शब्दों में आपकी विचारशीलता को वापस आपके बचपन में लिए चलते हैं जहां किस्से-कहानियों के लिए बहुत सारी जगह थी और बहुत सारा वक्त भी।
हुआ यूं कि जब जंगल में लोकतंत्र की स्थापना हुई तो सारे सेटअप का गहन अध्ययन किया गया और उसे ज्यों का त्यों अपनी सहजता और स्वभाव के अनुरुप अपना लिया गया । अब सबके लिए समान अवसर थे, सहूलियत के साथ भी और सहूलियत के बाद भी।  लिहाजा कहीं बिल्ली बाबू बनी तो बकरी अफसर। कुत्ता कहीं सिक्योरिटी गार्ड था तो तोता डॉक्टर बना । हाथी को जंगल के म्यूनिसिपल डिपार्टमेंट में बुलडोज़र की नौकरी मिल गई थी । तो ऊंट फायर डिपार्टमेंट के चीफ थे, क्यों... पता नहीं । खरगोश डाक विभाग में लगा दिए गए थे। जंगल की देखभाल का जिम्मा चील-कौवों के हवाले था तो ट्रैफिक विभाग हिरण ने संभाला हुआ था। चील, बाज़ और कौवे क्रमश: पुलिस, इंटेलिजेंस और होमगार्ड में शामिल कर लिए गए थे।

जंगल में समयानुरुप सुशासन की बयार बह रही थी  और जंगल  की जनता ने भी जीने के इसी खांचे में खुद को ढाल लिया था ।

सब कुछ एक दम शांति से चल रहा था जैसा कि व्यवस्था के अनुरुप चलना चाहिए लेकिन तभी अचानक से जंगल की शांति को जैसे किसी की नज़र लग गई । जनाब शेर बहादुर के एक अत्यंत खास चमचे सियार के बिजनेस तक कानून के लंबे हाथ जा पहुंचे और बहादुर अफसर बकरी ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए जंगल को सुधारने का बीड़ा उठा लिया ।
बकरी बहादुर जरुर थी लेकिन उसमें व्यवहारिकता का घोर अभाव था, बकरी के कर्तव्य निर्वाहन की हर संभव मंच पर मीमांसा की गई और उसे प्रशासनिक तौर पर अक्षम घोषित कर दिया गया । हालांकि जंगल का एक तबका बकरी के साथ भी था लेकिन बकरी को सबक सिखाना अब जरुरी हो चला था ताकि भविष्य में कोई इस तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था का गलत इस्तेमाल कर नाहक ही जंगल समाज के सम्मानित लोगों को परेशान ना कर सके ।

*** बकरी पर शाही नदी के पानी को गंदा करने का आरोप लगाया गया , जो बाद में गलत साबित हुआ क्योंकि बकरी को शाही नदी के महल वाले हिस्से तक जाने की अनुमति ही नहीं थी और हमेशा की ही तरह बकरी का घर नदी के निचले हिस्से पर था और महल ऊंचाई पर ।

*** फिर एक और कमेटी बनाई गई जो बकरी पर शाही बगीचे की घास चरने के इल्जाम की जांच कर रही थी... वहां भी पाया गया कि बकरी कंटीली तारों के बीच में से जनता जनार्दन के लिए प्रतिबंधित उस हिस्से तक पहुंच ही नहीं सकती ।

*** बकरी पर ये भी आरोप लगाया गया कि वेजीटेरियन जनता भी बकरी को देखने के बाद अब नॉन-वेज खाना चाहती है, इससे जंगलराज के पुराने दिन लौट सकते हैं ।

***  बकरी पर ये आरोप भी लगाया गया कि उसने सियार के साथ हाथापाई की और उसे बाद में देख लेने की धमकी भी दी । सियार के साथ उस वक्त मौजूद रहे 10 लोगों में से 9 इस मामले में चश्मदीद गवाह हैं जिनमें दो नेत्रहीन भी शामिल है और एक गवाह अफसर बकरी के डर से जान बचाकर कहीं छुपा बैठा है ।

*** आरोप है कि बकरी ने अफसर होने के नाते अपने कट की भी मांग की और मांग के पूरा ना होने पर बदले की भावना से इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया जिससे ... गलत धंधों के सही बंदे ...  बेहद परेशान हुए।

*** बकरी पर आरोप है कि उन्होंने मामले में कार्रवाई करने से पहले आला अधिकारियों से सलाह लेना उचित नहीं समझा और हेडक्वार्टर से आदेश मिलते ही तुरंत कार्रवाई को अंजाम दे डाला।

*** साथ ही बकरी पर ये भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने सिस्टम के खिलाफ जाकर पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया। ये सारा काम एक सिस्टम के तहत पहले सुचारु रुप से होता था लेकिन बकरी ने अमानवीय एवं गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए सिस्टम का पूरा बैलेंस चौपट कर ही डाला जिससे कई बैंक बैलेंस बिगड़ गए।

*** लिहाजा आरोपों का एक मोटा पुलिंदा तैयार कर बकरी मामले पर  दर्जन भर जांच कमेटियां बैठा दी गईं हैं।

इस बीच जंगल की जनता ये जानना चाहती है कि आखिर बकरी की गलती क्या है ।
अगर है तो क्या है ?
मसला व्यक्ति का है या व्यवस्था का ...
अब ये तो साहब आपको जांच रिपोर्ट के आने तक इंतज़ार करना पड़ेगा कि सच क्या है और उस सच के आधार पर क्या फैसला होता है ...
अब सिस्टम में रहेंगे तो सिस्टम को तो मानना पड़ता है ना बॉस ...
इंतज़ार कीजिए ...
हमें भी है ... आप भी कीजिए ...

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

आज़ादी का अहसास

15 अगस्त 2013 . . .

सुबह जाने क्यों आज अलसाई सी थी, कमबख्त नींद को भी पता था कि आज छुट्टी का दिन है । छुट्टी का दिन...  तमाम रस्मों - रिवाज़ों , तमाम औपचारिकताओं के साथ लोगों की मानसिकता एक छुट्टी के दिन सरीखी हो गई है ।

15 अगस्त 1947 ... जाने कितनी आंखों ने इस दिन का इंतज़ार किया होगा... कितनी आंखें इस दिन के दीदार की ख्वाहिश लिए ही बंद हो गई होंगी... जाने कितनी आंखों ने इस दिन का सपना देखा होगा । और फिर कितनी ही आंखों ने इस सपने को पूरा होते हुए देखा होगा  । उस सपने को जिसे आज हम जी रहे हैं, मना रहे हैं... आज़ादी के इस दिन को।

ना ना ... घबराइए नहीं, मैं एक्सट्रा इमोशनल नहीं हूं ... इस पर मैं अपना स्टैंड पहले ही क्लीयर कर चुका हूं ।

इस राष्ट्रीय पर्व के दिन जब बाकी तमाम लोग अलसा रहे हैं, और मैं... मैं तैयार हो रहा हूं ऑफिस जाने के लिए।

जी ... मेरी छुट्टी नहीं है... मुझे ऑफिस जाना है । क्यों, ये मत पूछिए। बता नहीं पाउंगा, इसलिए कोशिश भी मत कीजिएगा और फेस टू फेस तो कतई नहीं ।  और इस वक्त घड़ी में क्या बजा है ये पूछने की भूल बिल्कुल मत कीजिएगा, क्यों !!! सर जी ,  " जाके पैर ना फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई " ।

खैर... घर से बाहर पहला कदम रखते ही कुछ बूंदों ने हौले से स्वागत किया, याद आया बचपन से ही तो सुनते आएं हैं...15 अगस्त को बारिश जरुर होती है। आज़ादी का दिन... इतनी खूबसूरत शुरुआत... और ऑफिस तक का सफर उससे भी ज्यादा खूबसूरत। साफ-सुथरी , बारिश से धुली हुई लगभग खाली सी सड़कें । जगह-जगह तैनात जवान... कहीं बैरिकेडिंग, कहीं पैदल गश्त... कहीं मोटरसाइकिल से पैट्रोलिंग, तो कहीं सायरन बजानी पुलिस की गाड़ियां। कार सिर्फ बैरिकेड्स पर रुक रही थी या फिर सिग्नल्स पर, इसके अलावा तो लगा जैसे सालों पुरानी दिल्ली वापस से लड़कों पर लौट आई हो ( सड़कें हालांकि बेहतर , लेकिन भीड़ नदारद) 

हां यमुना बाज़ार पर जरुर ब्रेक लगाने पड़े ... कुछ सज्जन वहां रोज़ की ही तरह दीन-दुनिया से बेखबर सड़क पार कर रहे थे, आप वक्त रहते देख पाएं तो आपकी किस्मत नहीं तो  ... 
आज कोई रॉन्ग साइड से गाड़ी नहीं चला रहा था... बीच फ्लाई ओवर  पर कहीं भी ट्रक-टैम्पो रोक कर कागज़ों की जांच-पड़ताल  नहीं हो रही थी ।  
आज सभी लोग ट्रैफिक सिग्नल्स को फॉलो कर रहे थे। हैरानी हुई ना सुनकर , आज़ादी का दिन औऱ लोग नियम-कायदों से चल रहे थे । 
आपने वो टैम्पो जरुर देखे होंगे ... ( रिंग रोड पर या फिर वो शहर का कोई भी हिस्सा हो सकता है) जो सुबह-सुबह तेज़ रफ्तार से आपके सामने से निकल जाते हैं , जिनमें ठूंस-ठूंसकर मुर्गे भरे होते हैं, पिंजरे में कैद मुर्गे रोज़ मिलते जरुर थे लेकिन बताते नहीं थे कि मंजिल कहां हैं ।  रुटीन में बदलाव था, आज शायद वो भी आज़ाद थे,  वो टैम्पो कहीं नहीं थे और ना ही वो स्कूल वैन्स जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी कुछ उसी तरह से ठूंसे गए होते हैं। पीले रंग वाली वो स्कूल बसें भी नहीं थी जो पूरी सड़क के किसी भी हिस्से पर उसी रफ्तार से चलती है जो ड्राइवर की मर्जी होती है और जिनके पीछे बड़े करीने से लिखा होता है कि " अगर मैं गलत या खतरनाक तरीके से गाड़ी चला रहा हूं तो इस नंबर पर फोन कर बताएं " । जाने कितने ड्राइवर सही ड्राइविंग करते होंगे, कितने लोग फोन करते होंगे और कितने नंबर सही होंगे। टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन की तरह हवा से बातें और स्टंट करते वो बाइक सवार कहीं नहीं थे ।  

आज छुट्टी होती है, लिहाजा ऑफिस में बॉस लोग अमूमन नहीं आते हैं, बाकी उनकी मर्जी , अरे बॉस हैं भई। 
आज़ादी का दिन है वो मना सकते हैं तो हम भी मना सकते हैं । कैसे और कितना ??? ये भी मत पूछिए और फेस टू फेस तो बिल्कुल नहीं । 

इन सब के बीच लाल किले पर शान से लहराता तिरंगा... और स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल हज़ारों लोग। आसमान से छलकती ओस सी बूंदों सी बारिश की फुहारें और और बादलों के पार जाते सैकड़ों-हज़ारों रंग बिरंगे गुब्बारे। चप्पे-चप्पे पर मुस्तैद जवान ... औऱ संगीनों के साए में मनाया जाता आज़ादी का ये दिन। पुरानी दिल्ली इलाके में  ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार करती हर रंग हर आकार प्रकार की पतंगें और उड़ने को बेताब बैठे मुंडेरों पर सफेद रंग के कबूतर। 

सच ! कुछ खास ही होता है आज के दिन का अहसास...
आज़ादी का अहसास... 
सुरक्षा का अहसास ... 
हवाओं में घुला खुलापन...
भीगी-भीगी सुबह की नमी का अहसास...
और हां...
दिल्ली में रहने का अहसास ...
देश की राजधानी ... 
हमारी दिल्ली, साफ-सुथरी दिल्ली, स्वच्छ दिल्ली... सुरक्षित दिल्ली

काश ये सभी अहसास एक साथ हमेशा के लिए रह पाते । किसी अहसास पर कभी कोई अलर्ट हावी हो जाता है, तो कुछ अहसास रोज़ाना की भीड़भाड़ में कहीं खो जाते हैं ... हम से ज़्यादा हमारा ये शहर इन सब का आदी हो चुका है , इन अहसासों के खो जाने का ... लेकिन आज़ादी का दिन है, और इससे बड़ा अहसास क्या आप सुझा सकते हैं... इस अहसास की कीमत हम चाहकर भी नहीं चुका सकते लेकिन हां इसे संजो कर रख सकते हैं, सहेज कर रख सकते हैं... हमेशा के लिए... हर कीमत पर ...

बुधवार, 7 अगस्त 2013

. . . मैं एक्सट्रा इमोशनल नहीं हूं . . .

 " याचना नहीं अब रण होगा ... जीवन जय या कि मरण होगा "
आदरणीय दिनकर जी ने किस परिप्रेक्ष्य और किस मनोस्थिति में जाने अपनी कौन सी मनोदशा इस रचना के माध्यम से कागज पर उतारी होगी... लेकिन पढ़ने के बाद अक्सर इसकी जरुरत जिंदगी में महसूस जरुर होती रही है । कम पढ़ा लिखा हूं... हिंदी पढ़ने का सौभाग्य दसवीं तक ही मिला, इन पंक्तियों को शायद तभी पढ़ा होगा लेकिन खून आज भी खौल उठता है ... क्यों ??? क्योंकि वो किसी नीति , कुनीति , विदेश नीति, राजनीति या दलगत सुभीति का मोहताज नहीं है ... खून देखकर कनपटी की नसें तमतमा उठती है .... रुधिर प्रवाह दुगने वेग के साथ इमोशंस को अपने साथ अपने चरम तक ले जाता है ....
लेकिन आखिर कब तक हम इन्हें सिर्फ रुटीन ट्रीटमेंट देते रहेंगे ...  सीमा पर पांच जवान शहीद हो गए ... बॉर्डर पर अलर्ट ... संसद में चर्चा...हंगामा... नेताओं के बयान... पब्लिक की प्रतिक्रिया ... गली-सड़कों -मोहल्लों-घरों में बातें ... बसों-मेट्रो-ट्रेनों में बहस ... अखबारों में एक बड़ी खबर ... हेडलाइन स्टोरी ... बैनर ... और टेलीविजन ... ब्रेकिंग न्यूज़.... लगातार लाइव.... स्टूडियो गेस्ट, डिस्कशन .... ये खबर है, बहुत बड़ी खबर ... लेकिन कब तक जब तक कोई इससे बड़ी खबर नहीं आ जाती है  ... लेकिन ये सिर्फ खबर नहीं है... बयान नहीं है ... नारे नहीं हैं ... कोई मौका नहीं है अपनी राजनीति चमकाने का ... ये हकीकत उन जवानों की है जो जान हथेली पर रखकर दिन-रात हमारी हिफाजत करते हैं । चाहे वो देश की सीमा हो या देश के भीतरी हिस्से , आपकी और हमारी हिफाजत की यही हकीकत है । 
बात हम आंकड़ों और उदाहरणों की नहीं करेंगे, उनमें तो आम आदमी उलझ कर रह जाएगा ... आंकड़े हर काम की चीज़ की ही तरह दो ही काम आते हैं या तो वास्तव में इस्तेमाल में लाने के या फिर लोगों को बरगलाने के ।  आज़ादी के बाद से ऐसा कितनी बार हो चुका है और किसने क्या कदम उठाए, ये सर्वविदित है ... हमारा काम नहीं है , हमें बात नीतियों पर करनी होगी, कड़े फैसले लेने होंगे, सरकार जिसकी भी हो , सत्ता जिस किसी भी दल के हाथ में हो, किसी जवान की शहादत पर सियासत राजनीति नहीं है ... पतन है । बयान लगातार आ रहे हैं ... नेता हो ... अभिनेता हो ! रक्षा विशेषज्ञ हो ... या फिर स्वयंभू एक्सपर्ट । मेरे जैसे अस्तित्वहीन पात्र तो बस सार्थकता और बौधिक्ता के अभाव में मूकदर्शक बने बैठे हैं ... कि हां अब ऐसे कदम उठाए जाएंगे कि कोई हमारे देश की तरफ आंख उठाकर देखने का दुस्साहस तक नहीं करेगा ।
दिल्ली में रहता हूं ... नौकरी नोएडा में है ... तो कुछ चीजें शेयर करना चाहता हूं , सीपी में हर साल की तरह इस साल भी सेल लगी हुई है । दिल्ली-एनसीआर के हर बड़े मॉल में हर छोटे-बड़े ब्रांड पर 50-60 % तक का डिस्काउंट चल रहा है। अट्टा मार्केट में भी भीड़ कम नहीं है तो राजौरी गार्डन, तिलक नगर , रोहिणी, साउथ एक्स, जीके ... हर जगह यही हाल है । लोग मोमोज़-नूडल्स उसी चाव से खा रहे हैं तो छोले भठूरे , गाल गप्पे, डोसा-उत्तपम भी तमाम इटैलियन फैंच क्विजीन के आगे ही चलते नज़र आएंगे ।
हम लोग बाते चाहें जैसी भी कर लें ... जिंदगी करीब करीब यही जी रहे हैं, अपने अपने घरों में ...अपने अपने दड़बों में ... अपने अपने महलों में ...अपने अपने दायरों में ... अपने अपने परिवेश में ... अपने अपने कम्फर्ट ज़ोन में ...
लेकिन सीमा पर जो जवान तैनात हैं या देश के भीतर भी दुर्गम औऱ खतरनाक इलाकों में जिनकी पोस्टिंग है, वो ऐसी कितनी सेल, सैर-सपाटे का मज़ा ले पाते हैं ... ऐसे कितने स्वाद, ज़ायके, चटखारे उनको याद रहते हैं ... कुछ किस्मत वाले होते हैं तो वो ऐसे हर लम्हे को सालों तक यादों में सहेज कर रखते हैं , तब तक जब तक कोई और खूबसूरत लम्हा उसकी जगह नहीं ले लेता । उन्हें चोट लगती है तो छोटी-मोटी चोट, बीमारी का ज़िक्र तो वो घर पर करते भी नहीं हैं, घरवाले नाहक ही परेशान होंगे । बस एक मैसेज ... कुछ दिन बात नहीं हो पाएगी, या फिर कभी कभी तो वो भी नहीं । घरवाले या तो सिर्फ इंतज़ार करते रहते हैं या फिर कयास लगाते रहते हैं ।  लोग कहते हैं फौज को उसी हिसाब से सुविधाएं भी तो मिलती हैं... जी हां मिलती हैं, लेकिन जितनी मिलनी चाहिए शायद उतनी नहीं मिलती । एक फौजी ... फिर चाहे वो एक जवान हो या ऑफिसर ... जब वो घर आता है तो हर एक लम्हे को एक पूरी जिंदगी सरीखा जी लेना चाहता है । इन लम्हों को मैने देखा है ... महसूस किया है ... जिया है ... 
एक बार एनडीए के लिए मैने भी कोशिश की थी, क्लीयर नहीं हुआ... इलाहाबाद... लास्ट अटेम्ट था, बस कुछ दिन वहां जीने को जरुर मिले, औऱ कुछ यादें मिलीं जिंदगी भर के लिए। 
मुझे अफसोस है कि मै एनडीए क्लीयर ना कर सका ... लेकिन किसी माता-पिता को ये अफसोस नहीं होना चाहिए कि उनका बेटा फौज में क्यों गया । किसकी गलती की सज़ा उनके बेटे या बेटी ने भुगती । आखिर क्यों पड़ौसी मुल्क जब चाहे ऐसे घिनौने कृत्य को अंजाम देते हैं और हम लोग चंद दिन बातें करके खामोश बैठ जाते हैं ... बात यहां देश की संप्रभुता और अखंडता के साथ साथ देशवासियों की भी है ... शहादत पर सियासत हमें नहीं चाहिए ... इंटेलेक्चुअल जुगाली की एक किस्म खरपतवार की तरह फली फूली है ... हमें वो भी नहीं चाहिए ... समस्या क्या है हम सभी जानते हैं ... सालों से जानते हैं ... हमें व्याख्यान नहीं चाहिए ... कोरे बयान नहीं चाहिए... हमें इस समस्या का समाधान चाहिए ।